सिंचाई के लिए कमाल का जुगाड़ : ग्लूकोज की बोतलों से बनाइए देसी ड्रिप सिस्टम

सिंचाई के लिए कमाल का जुगाड़ : ग्लूकोज की बोतलों से बनाइए देसी ड्रिप सिस्टमदेसी ड्रिप सिंचाई। फोटो- साभार बूंद-बूंद पानी।

बीते कुछ वर्षों से सिंचाई की नई-नई तकनीकों (ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकल सिंचाई विधि आदि) के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है, जिससे कम पानी में फसल की सिंचाई कि जा सके। सरकार भी इसमें मदद कर रही है। लेकिन इसके अलावा अगर आप चाहें तो अपने हांथ से घर में आप ड्रिप सिस्टम तैयार कर सकते हैं।

घर पर ड्रिप सिस्टम तैयार करने के लिए आपको ग्लूकोज की बोतलों की जरूरत होगी और उसके साथ ड्रिप की ज़रूरत होती है। उसके बाद डंडी की सहायता से बोतलों को लटका दिया जाता है और उनसे ड्रिप जोड़ के पौधों की जड़ों से जोड़ दिया जाता है। और फिर बोतल में पानी भर दिया जाता है, जिससे धीरे-धीरे पौधों की सिंचाई होती रहती है। इस तरीके से किसान को पैसे खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती है और बिना पैसे ही देसी ड्रिप सिस्टम तैयार करके सिंचाई कर सकते हैं।

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ऐसे भी हो सकती है ग्लूकोज की बोतलों से सिंचाई।

ग्लूकोज की बोतलों से ऐसे सिंचाई करता है ये किसान

झाबुआ (मध्य प्रदेश)। मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के एक किसान ने सिंचाई के लिए कम पानी का ऐसा हल खोजा कि इसे जानकर आपको हैरत हो। मध्य प्रदेश का झाबुआ जिला आदिवासी बाहुल्य पिछड़ा क्षेत्र है। यहां लहराती ऊबड़-खाबड़ भूमि, खंडित जोत, वर्षा आधारित खेती, सतही और क्षरीय मिट्टी है, जिसके चलते उत्पादन कम होता है। किसान अक्सर नुकसान उठाते हैं। जिले में सिंचाई के बहुत अच्छे इंतजाम नहीं है। किसानों को बरसात के पानी पर भी ज्यादा निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन इसी झाबुआ जिले के निवासी रमेश बारिया (58 वर्ष) नाम के एक किसान ने इस समस्या का बहुत ही नायाब तरीका खोज निकाला। तरीका भी ऐसा कि खर्चा नाम मात्र का।

रमेश बताते हैं, "बड़े किसान और टीवी-अखबारों में ड्रिप इरीगेशन यानी बूंद-बूंद सिंचाई की बाते कर रहे थे। इसमें फायदा भी दिख रहा था लेकिन मेरे पास इसके लिए पैसे नहीं थे।” वो आगे बताते हैं, "इस बीच मेरी मुलाकात कुछ कृषि वैज्ञानिकों से हुई। वैज्ञानिकों ने मेरे समस्या सुनी और उन्होंने आइडिया दिया कि ग्लूकोज की बेकार बोतलों में पानी भरकर फसल को पानी दें। इससे कम पानी में उनका काम हो जाएगा और लागत भी ना के बराबर आएगी। बस फिर क्या था। मैंने छह किलो ग्लूकोज की बेकार बोतलें 20 रुपए प्रति किलो के हिसाब से खरीदीं। जो कुल 350 बोतलें थीं।"

लेकिन अब समस्या इन बोलतों में पानी भरने की थी। इतने मजदूर लगाना और भी खर्चीला सौदा था। ऐसे में रमेश की जुगत फिर काम आई। उन्होंने परिवार को ये जिम्मेदारी दी। वो फोन पर बताते हैं, "फिर मैंने अपने बच्चों को जिम्मेदारी थी की वो रोजाना स्कूल जाने से पहले सुबह-सुबह इन बोतलों में पानी भरकर जाएं।"सिंचाई के नए तरीके इस्तेमाल के लिए रमेश बारिया को कई सम्मान भी मिल चुके हैं। इस तरह रमेश ने करीब सवा बीघा खेत में कद्दू और करेले की फसल को पानी दिया और देरी से आए मानसून के नुकसान के असर उनकी फसल का काफी कम हुआ था। रमेश के पास सवा बीघा ही खेती है लेकिन अपनी मेहनत और सूझबूझ के चलते अच्छी कमाई करते हैं। पहली साल कद्दू और करेले से उन्हें 15000 से ज्चादा की आमदनी हुई थी।

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