भारत में जलवायु परिवर्तन: पिघलेंगे ग्लेशियर, सेहत होगी और खराब, बढ़ेंगे रिफ्यूजी होगा टकराव

वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट "टर्न डाउन द हीट" 2013 में इस बात पर शोध किया गया था कि अगर दुनिया का तापमान 2 से 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है तो दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्वी एशिया और सब-सहारा अफ्रीका इलाकों पर उसके क्या परिणाम होंगे। भारत के बारे में उनके अनुमान कुछ इस तरह थे …

भारत में जलवायु परिवर्तन: पिघलेंगे ग्लेशियर, सेहत होगी और खराब, बढ़ेंगे रिफ्यूजी होगा टकराव

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की छठी रिपोर्ट हाल ही में लीक हो गई। इस रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि अगर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन और जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल रोकने में तेजी नहीं दिखाई गई तो 2040 तक दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री तक बढ़ने की आशंका है। तापमान में इस बढ़ोतरी से मौसम में जो बदलाव आएगा उसका सामना कर पाना पूरी दुनिया के लिए मुश्किल होगा, खासकर भारत जैसे विकासशील देशों के लिए।

जलवायु परिवर्तन के जोखिम को समझने के लिए वर्ल्ड बैंक ने पोस्टडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च एंड क्लाइमेट एनालिटिक्स को नियुक्त किया था। इसकी रिपोर्ट "टर्न डाउन द हीट" 2013 में जारी हुई। इसमें इस बात पर शोध किया गया था कि अगर दुनिया का तापमान 2 से 4 डिग्री तक बढ़ता है तो दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्वी एशिया और सब-सहारा अफ्रीका इलाकों पर उसके क्या परिणाम होंगे। हम इस रिपोर्ट के आधार पर पहले प्रकाशित लेख में चर्चा कर चुके हैं कि इसका भारत में गर्मी के मौसम, सूखों, बारिश के पैटर्न, भूजल स्तर, कृषि और खाद्य सुरक्षा पर क्या असर होगा। चर्चा की अगली कड़ी में हम ग्लेशियरों के पिघलने, समुद्र का जल स्तर बढ़ने, ऊर्जा सुरक्षा, जल सुरक्षा, सेहत, जनसंख्या का संकटग्रस्त इलाकों से पलायन और उससे पैदा होने वाले टकराव को भारत के संदर्भों में देखने की कोशिश करेंगे।

ग्लेशियरों के पिघलने का असर



वर्तमान स्थिति: उत्तर पश्चिमी हिमालय और कराकोरम श्रेणी के ग्लेशियर पश्चिम से आने वाली सर्द हवाओं से नमी पाते हैं इसलिए वे अभी तक टिके हुए हैं। वहीं हिमालय के दूसरे ग्लेशियरों को नमी का बड़ा हिस्सा हर साल आने वाले मॉनसून से मिलता है। पिछले 100 बरसों में यही ग्लेशियर पिघल रहे हैं।

भविष्य की आशंका: अगर तापमान 2.5 डिग्री बढ़ता है तो हिमालय की बर्फ और ग्लेशियर पिघलने लगेंगे। इससे ग्लेशियरों पर निर्भर उत्तर भारत की नदियों का स्थायित्व खतरे में पढ़ जाएगा, खासकर सिंधु और ब्रह्मपुत्र का। ऐसे में मॉनसून के सीजन में होने वाली भारी बरसात की वजह से गंगा की निर्भरता पिघली हुई बर्फ से मिलने वाले पानी पर खत्म हो जाएगी।

वसंत के मौसम में जब बर्फ पिघलती है तब सिंधु और ब्रह्मपुत्र का बहाव तेज हो जाएगा, जबकि गमिर्यों में यह काफी कम होगा।

सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र के बहाव में होने वाले परिवर्तन से इनके बेसिन वाले इलाकों में सिंचाई पर बुरा असर पड़ेगा। यह इस क्षेत्र में होने वाले खाद्यान्न उत्पादन और यहां रहने वाले करोड़ों लोगों की रोजीरोटी को भी प्रभावित करेगा।

क्या तैयारी कर सकते हैं: इस इलाके में पानी की संग्रहण क्षमता बढ़ाने पर ध्यान देना होगा ताकि जब नदियों में पानी ज्यादा हो तो उसे स्टोर कर लिया जाए और जब पानी कम हो तो उसका इस्तेमाल कर लिया जाए।

समुद्र के जल स्तर में वृद्धि



वर्तमान स्थिति: समुद्री बाढ़ से प्रभावित होने वाली दुनिया की सबसे बड़ी आबादी मुंबई में रहती है। मुंबई का अधिकांश हिस्सा ऐसी जगह पर बसा है जो कभी समुद्र या तटीय नदी के इलाके में पड़ता था। इसी वजह से यह इलाका उच्च ज्वार के निशान से नीचे है। अनियोजित शहरीकरण ने समुद्री पानी के शहर में घुस आने के खतरे को और बढ़ा दिया है।

भविष्य की आशंका: चूंकि भारत भौगोलिक रूप से इक्वेटर या भूमध्यरेखा के पास स्थित है इसलिए यहां समुद्र के स्तर में और जगहों से ज्यादा बढ़ोतरी होगी।

समुद्र के स्तर में वृद्धि, तेज तूफानों के चलते तटीय इलाकों में खारा पानी भर जाएगा। इसका असर खेती पर पड़ेगा, भूजल की गुणवत्ता प्रभावित होगी, पीने का पानी प्रदूषित हो जाएगा, डायरिया और कोलेरा जैसी बीमारियां बढ़ेंगी। (कोलेरा का बैक्टीरिया खारे पानी में ज्यादा दिन तक जिंदा रह सकता है) इस लिहाज से कोलकाता और मुंबई को सबसे ज्यादा जोखिम का सामना करना पड़ेगा।

क्या तैयारी कर सकते हैं: इमारत बनाने संबंधी नियमों को जलवायु परिवर्तन के अनुसार सख्ती से लागू करने की जरूरत है। जहां जरूरी हों वहां तटबंध बनाए जाएं।

खतरे में ऊर्जा सुरक्षा

वर्तमान स्थिति: जलवायु परिवर्तन के पानी पर पड़ने वाले असर की वजह से भारत में ऊर्जा उत्पादन के दो तरीकों : जल विद्युत और तापीय ऊर्जा प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि इन दोनों ही के लिए बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत होती है।

भविष्य की आशंका: नदी बहाव में कमी की वजह से जलविद्युत आधारित पावर प्लांट में बिजली उत्पादन प्रभावित होगा इसके अलावा बाढ़, भूस्खलन, किसी ग्लेशियर झील के टूटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं से इन प्लांट्स को नुकसान भी पहुंच सकता है। इसी तरह तापीय ऊर्जा वाले प्लांट्स में अगर सही मात्रा में पानी की सप्लाई नहीं हुई तो अधिक गर्मी बढ़ने से कोई दुर्घटना भी हो सकती है।

क्या तैयारी कर सकते हैं: ऊर्जा परियोजनाओं को जलवायु परिवर्तन के तहत संभावित जोखिमों को ध्यान में रखकर बनाया जाना चाहिए।

जल सुरक्षा में सेंध

वर्तमान स्थिति: भारत के बहुत से इलाकों में पानी संकट साफ दिखाई दे रहा है। अगर जलवायु परिवर्तन के असर को नजरअंदाज करें तब भी भविष्य की मांग की पूर्ति करना एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।

शहरीकरण, जनसंख्या वृद्धि, आर्थिंक विकास, खेती और उद्योग क्षेत्र की पानी उपभोग की बढ़ती मांग ये सब वे कारक हैं जो हालात को और विकट बना देंगे।

भविष्य की आशंका : आने वाले समय में मॉनसूनी वर्षा की अनिश्चितता की वजह से कुछ इलाकों में पानी की किल्लत बढ़ेगी। जानकारों की रिसर्च से पता चला है कि मध्य भारत, पश्चिमी घाट की पर्वत श्रंखला और उत्तरपूर्वी राज्यों में जल सुरक्षा को भारी खतरा है।

क्या तैयारी कर सकते हैं: हमें सिंचाई व्यवस्था में सुधार करना होगा, जल संचयन या वॉटर हार्वेस्टिंग तकनीक भी सुधारनी होगी इसके अलावा खेती में पानी के उपयोग का प्रबंधन भी और प्रभावी बनाना होगा।

सेहत होगी और खराब



वर्तमान स्थिति: भारत में क्लाइमेट चेंज या जलवायु परिवर्तन का यहां के रहने वालों की सेहत पर व्यापक असर पड़ रहा है।

भविष्य की आशंका: दूसरी बीमारियों के साथ-साथ कुपोषण बढ़ेगा, इससे खासकर गरीब तबका प्रभावित होगा। बच्चों का शारीरिक विकास ठीक से नहीं हो पाएगा, अनुमान है कि 2050 तक इसमें 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी।

डायरिया इन्फेक्शन और मलेरिया जैसे संक्रामक रोग उन इलाकों में भी फैलेंगे जहां पहले कम तापमान होने की वजह से नहीं फैल पाते थे। ये दोनों आज भी शिशु मृत्यु के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं।

भीषण गर्मी या हीट वेव की वजह से होने वाली मौतों की तादाद बढ़ेगी। कड़ाके की ठंड या भयानक गर्मी जैसी घटनाएं बढ़ेंगी जिनमें मौसम चरम रूप ले लेता है।

क्या तैयारी कर सकते हैं: हमें बीमारियों के गढ़ बन चुके इलाकों को पहचानना होगा और वहां स्वास्थ्य सुविधाओं को और मजबूत करना होगा।

पलायन और टकराव

वर्तमान स्थिति: आपदाओं से बचने के लिए शरणार्थी हमेशा से दक्षिण एशिया का रुख करते रहे हें। सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र इस क्षेत्र के कई देशों से होकर गुजरती है पानी के अधिक इस्तेमाल और बंटवारे को लेकर अक्सर ये नदियां तनाव को जन्म देती रही हैं।

भविष्य की आशंका: खेती और दूसरे रोजगारों पर पड़ने वाले जलवायु परिवर्तन के असर से शरणार्थियों की संख्या में औ बढ़ोतरी होगी।

क्या कर सकते हैं: पानी के मसले पर टकराव की जगह क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देना होगा।

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