जल लुप्तप्राय हो रहा है, नासा ने दी चेतावनी

हमने 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया, चर्चाएं हुईं और खतरे की घंटी बजाई, बस हो गया पर्यावरण संरक्षण और धरती, पानी, पावक, गगन और वायु की रक्षा। हम जानते सब हैं, लेकिन मानते नहीं।

जल लुप्तप्राय हो रहा है, नासा ने दी चेतावनी

हम किसी विषय की गम्भीरता को तभी समझते हैं जब अंग्रेज लोग बोल देते हैं, और आखिरकार अंतरिक्ष विज्ञान सम्बन्धी जानी मानी संस्था नासा ने कह ही दिया कि भारत में 2025 के बाद जल समाप्त होने लगेगा, अब तो गम्भीरता से लेना चाहिए। हमने 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया, चर्चाएं हुईं और खतरे की घंटी बजाई, बस हो गया पर्यावरण संरक्षण और धरती, पानी, पावक, गगन और वायु की रक्षा। हम जानते सब हैं, लेकिन मानते नहीं।

चालीस के दशक में कुएं से पानी निकालने में पांच हाथ की रस्सी लगती थी, बरसात में तो रस्सी की जरूरत हीं नहीं पड़ती थी। अब कुएं बहुत कम बचे हैं इसलिए पता नहीं चलता। लेकिन अब जलस्तर इतनी तेजी से नीचे चला गया है कि रस्सी की लम्बाई पांच से दस गुनी हो गई है। हम विदेशी मुद्रा भंडार और खाद्य भंडार की चिन्ता तो करते हैं, उन्हें बढ़ाने की कोशिश भी करते हैं, लेकिन इनसे कहीं अधिक जरूरी है जल भंडार जो प्रकृति ने हमारे लिए भूमि की सतह पर और भूजल के रूप में दिया है, उसकी चिन्ता नहीं। भूजल जो पेय जल का प्रमुख श्रोत है, विविध कामों के लिए बेहिसाब प्रयोग हो रहा है क्योंकि खैरात की बिजली से बोर वेल और ट्यूब वेल बन रहे हैं, मनरेगा से बने तालाब भरे जा रहे हैं, मछली पालन हो रहा है, उद्योग धंधों में प्रयोग हो रहा है और जलस्तर नीचे गिरता जा रहा है। पुराने लोगों को याद होगा प्रकृति द्वारा संचित इसी भूजल ने 1967-68 में अकाल से बिहार को बचाया था। विदर्भ को नहीं बचा पा रहा हैं क्योंकि वहां संचित भूजल की कमीं है।

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संचित भूजल को बचाने का एक ही तरीका है कि भूतल पर उपलब्ध पानी का अधिकाधिक उपयोग किया जाए और भूजल काफी मितव्ययिता से खर्च किया जाए। भारत की नदियों को आपस में जोड़ने की बात बहुत दिन से चल रही है, अब टालना घातक होगा। तालाबों और झीलों में अधिकाधिक पानी संचित करना होगा और सिंचाई में पानी का किफायती उपयोग करना होगा। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि नदियों को जोड़ने की एक जीवन रक्षक योजना राजनीति का फुटबॉल बनकर रह गई है। जल उपलब्धता की विसंगति से निपटने और भूजल बचाने के लिए नदियों का जाल बिछाना एक अपरिहार्य विकल्प है।

हमें ध्यान रखना होगा कि पृथ्वी पर जल का बजट निश्चित है, जो ठोस, द्रव तथा भाप तीनों अवस्थाओं में पाया जाता है, रूप बदलता रहता है। पहाड़ों पर ठोस अर्थात बर्फ की अवस्था में, मैदानों में द्रव रूप में और समुद्र की सतह से भाप बनकर पानी आसमान में जाता है, जहां पर ठंडा होकर फिर द्रव बनकर धरती पर गिरता है। वर्षाजल का कुछ भाग पहाड़ों पर रह जाता है, कुछ धरती के अन्दर भूजल के रूप में चला जाता है और बाकी सब वापस समुद्र में जाता है। यह जलचक्र हमेशा चलता रहता है, लेकिन जल बजट बना रहता है।

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भूजल शुद्ध होता है क्योंकि जमीन के अन्दर जाते हुए छन-छन कर जाता है। मनुष्य के पीने के लिए पानी का यह अच्छा श्रोत है। समुद्र का पानी खारा है और नदियों का पानी प्रदूषित हो रहा है, इसलिए भूजल का दुरुपयोग करने से बूंद-बूंद पेय जल के लिए मनुष्य तरस जाएगा। भूजल के संचय और प्रदूषण रहित बनाए रखने का सतत प्रयास होना चाहिए। आवश्यक है कि भूजल को प्रदूषण से बचाया जाए क्योंकि एक बार प्रदूषित हो जाने के बाद इसे शुद्ध करना सम्भव नहीं।


भारत में पानी की कमी नहीं है, यहां की धरती को प्रतिवर्ष लगभग 4000 घन किलोमीटर वर्षाजल मिलता है, जिससे विशाल बफर स्टाक बनाया जा सकता है, फिर भी यह विडम्बना है कि देश पर जल संकट की काली छाया मंडरा रही है। अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा या नहीं, परन्तु अगले कुछ वर्ष जल प्रबन्धन को समर्पित करने होंगे। भारत के उत्तरी भाग में बालू की मोटी परत है, जिसमें प्रचुर मात्रा में जल संग्रह सम्भव है, जबकि दक्षिण भारत के चट्टानी जमीन में पानी कम प्रवेश कर सकता है इसलिए सतह पर ही जल संग्रह करना होता है।

भारत के बड़े भाग को सिंचित करने के लिए नहरों का जाल बना है, लेकिन नहरों के पानी की बर्बादी भी होती है। खेतों में पानी खोलकर किसान घर में सो जाता है और खेत भर जाते हैं तो मिट्टी में क्षारीयता बढ़ती है। सिंचाई में ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर विधि द्वारा सिंचाई करने से पानी का कम खर्चा होगा और खेतों की मिट्टी में क्षारीयता़ भी नहीं बढ़ेगी। वास्तव में जल संकट इसलिए है कि हम पानी की बेकदरी करते हैं, उसे संभालते नहीं। जलसंग्रह के लिए तालाबों की कमी नहीं है, परन्तु उनमें काई, कुम्भी, घास और मिट्टी भर गई है, मनरेगा भी इन्हें पूनर्जीवित नहीं कर सका।जल प्रदूषण से जल को बचाना बहुत महत्वपूर्ण है। नदियों के किनारे बसे शहरों में चल रहे उद्योग धंधों का औद्योगिक कचरा और मानव जनित प्रदूषक पदार्थ सब नदियों में ही जाते हैं। केवल गंगा और यमुना को प्रदूषण मुक्त करने से काम नहीं चलेगा, सभी नदियों, झीलों, तालाबों और जलाशयों को प्रदूषित होने से बचाना है। तालाबों का पानी, जो पशु-पक्षियों के पीने के काम आता था, प्रदूषण के कारण पशुओं तक के काम का नहीं रहा। मछलियां और दूसरे जलजीव पानी की शुद्धता बनाए रखते थे, परन्तु प्रदूषण के कारण मर रहे हैं।

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तालाबों में संचित पानी किसान के लिए नहरों की अपेक्षा अधिक उपयोगी हो सकता है। तालाबों का पानी स्थायी संसाधन होता है और इसमें जैविक खाद भी रहती है। पचास के दशक तक तालाबों से बेड़ी द्वारा पानी निकाल कर किसान अपने खेतों की सिंचाई करते थे। साठ के दशक में किसानों ने पानी का इंजिन पम्पसेट खरीद कर उससे तालाबों का पानी निकालने लगे, लेकिन अब तालाबों के या तो खेत बन गए हैं या फिर उनमें पानी नहीं बचा। अन्य जलाशयों में सिल्टिंग के कारण जलधारक क्षमता बहुत घट गई है।

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शहरों में वाटर हार्वेस्टिंग की बातें होती हैं, लेकिन किसान के इलाकों में जहां सैकड़ों साल से प्राकृतिक ढंग से वाटर हार्वेस्टिंग होती आई है, वहां इस पर जोर नहीं दिया जाता। शायद ही किसी पंचायत के पास आंकड़े होंगे कि मनरेगा में तालाबों की खुदाई आरम्भ होने के पहले तालाबों की जलधारक क्षमता कितनी थी अर्थात उनमें कितने पानी संचित हो सकता था और उनकी सफाई करने के बाद जलधारक क्षमता कितनी हो गई। यदि तालाबों की क्षमता बढ़ेगी और वनस्पति खूब होगी तो धरती पर वर्षाजल का प्रवाह धीमी गति से होगा और भूजल भंडारण के लिए प्रकृति को समय मिलेगा, भूजल का भंडारण अधिक होगा।आंकड़े रहने चाहिए कि प्रत्येक पंचायत में भूतल पर जल संग्रह की कितनी क्षमता उपलब्ध है। पूरे प्रदेश अथवा देश का आंकलन भी हो सकता है और मांग तथा आपूर्ति का अन्तर पता लग सकेगा। ऐसे भी आंकड़े तैयार किए जा सकते हैं, जिनमें साल भर जल से भरे रहने वाले और मौसमी तालाब होंगे। मौसमी तालाबों को वर्षभर जल से भरे रहने वाले तालाबों में बदलने का प्रयास होना चाहिए। दूसरा पक्ष है पानी का खर्चा।

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हरित क्रान्ति की बौनी प्रजातियों ने पैदावार तो खूब बढ़ाई, लेकिन पानी और खाद की खपत भी बढ़ा दी। इसलिए जल संकट के लिए इसे कुछ हद तक जिम्मेदार मानना होगा। हरित क्रान्ति ने खेती को जीवन यापन का जरिया के बजाय व्यवसाय बना दिया। सत्तर के दशक में किसानों को लगा हम जितना यूरिया डालते जाएंगे, पैदावार बढ़ती जाएगी, लेकिन यह ज्यादा समय नहीं चला।बाद में पता चला कि यूरिया तो पौधे को केवल नाइट्रोजन देती है, उसे फास्फोरस और पोटाश भी चाहिए। तब किसानों ने एनपीके अर्थात नाइट्रोजन-फास्फोरस-पोटाश डालने लगे। खाद के साथ ही पानी की खपत भी बढ़ती गई। अब वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया है कि खादों के साथ ही पौधों को उसी अनुपात में विविध सूक्ष्म तत्व या खनिज पदार्थों जैसे लोहा, तांबा, कैल्शियम, सल्फर, जस्ता, मैग्नीशियम आदि की जरूरत भी बढ़ जाती है और पौधा जमीन से इन तत्वों को घसीटता है जिनकी आपूर्ति किसान नहीं कर पाता।

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पैदावार बढ़ाने के लालच में से मिट्टी का स्वास्थ्य बिगड़ता गया और फसलों में बीमारियां भी बढ़ीं। बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए कीटनाशक, फफूंद नाशक और ना जाने कितने प्रकार के इन्सेक्टीसाइड और पेस्टीसाइड प्रयोग होने लगे। दवाइयां छिड़कते रहने से उनका असर घटता गया और जलप्रदूषण बढ़ा। दवाइयों के अधिक प्रयोग से जीव जन्तुओं में वनस्पति के माध्यम से विष फैलने लगा, रासायनिक विकिरण से हवा जहरीली होने लगी, यहां तक कि मनुष्यों में कैंसर की बीमारी फैलने लगी। बैक्टीरिया, फफूंद और वायरस पर ही नहीं, कीड़े मकोड़ों पर दवाइयों का पहले जैसा असर नहीं रहा। कहना कठिन है कि धरती को धीरे-धीरे बांझ और पर्यावरण को विषैला बनाने में हरित क्रान्ति को दोषी माना जाए या फिर लालची किसान को।निर्वनीकरण के कारण धरती पर वनस्पति की चादर आधी रह गई है तथा सड़कें और मकान बनने से मिट्टी की रन्ध्रता घट गई है। बढ़ती आबादी, शहरीकरण और औद्योगीकरण और खेतों की पैदावार बढ़ाने के लिए पानी की मांग बढ़़ी है। भंडारित पानी को बर्बाद होने और प्रदूषण से बचाने की आवश्यकता है। भूमिगत पानी से सिंचाई का क्षेत्र न बढे इसकी चिन्ता भी करनी होगी। ऐसे उपाय खोजने की आवश्यकता है, जिससे खर्च किए गए भूमिगत पानी की भरपाई (रीचार्ज) होती रहे।


भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 4300 वर्ग किलोमीटर जमीन जलभराव से और लगभग 11500 वर्ग किलोमीटर मिट्टी की क्षारीयता से प्रभावित है। साथ ही कई जिलों में सतह से 3-4 फीट की गहराई पर कंकर की परत के कारण भूजल रीचार्ज में बाधा पड़ती है। यह परत भूतलीय पानी और भूमिगत पानी के बीच में बाधा बनती है, जिससे बरसात का पानी धरती के अन्दर नहीं जा पाता और जल भराव हो जाता है और गर्मी के दिनों में धरती के नीचे की नमी इसी कंकर की परत के कारण पौधों को नहीं मिल पाती है। खेतों में बार-बार पानी भरने के बजाय पत्तियों पर पानी छिड़कने (स्प्रिंकलर द्वारा) से कम पानी लगेगा और अधिक लाभ मिलेगा। वर्तमान में सिंचाई के पानी से पौधों के उपयोग में केवल 30 प्रतिशत पानी आता है। अतः केवल सिंचाई में पानी की किफायत करके बिना पैदावार घटाए ही पानी की बहुत बड़ी बचत संभव है।

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बढ़ती आबादी और औद्योगिक विकास के कारण नदियों के जल प्रदूषण आज की बहुत बड़ी समस्या है। यहां तक कि भूमिगत पानी भी प्रदूषित हो रहा है। धरती की सतह पर मौजूद पानी के प्रदूषण को तो एक सीमा तक दूर किया जा सकता है, परन्तु यदि भूमिगत पानी प्रदूषित हो गया तो उसे शुद्ध नहीं किया जा सकता।जल उपयोग के लिए जलनीति बनाने की आवश्यकता है। अमेरिका जैसे देशों में जल संसाधन नियंत्रण बोर्ड (वाटर रिसोर्स कन्ट्रोल बोर्ड) और जल अधिकार विभाग (वाटर राइट्स डिवीजन) बने हैं, जिनमें जिला परिषद, कृषक मंडल, उद्योगपति और स्वयंसेवी संस्थाओं का प्रतिनिधित्व रहता है। हमारे देश में कुछ स्थानों पर पानी पंचायत के रूप में थोड़ा नियंत्रण है, परन्तु उसे कानूनी रूप देने की आवश्यकता है। मोटे तौर पर धरती के अन्दर का मीठा पानी पीने के लिए सुरक्षित रखना चाहिए और धरातल पर मौजूद नदियों, झीलों और तालाबों का पानी सिंचाई, बागबानी, मछलीपालन, पशु-उपयोग और उद्योगों के लिए उपयोग में लाना चाहिए अन्यथा जल संकट से बच नहीं पाएंगे।

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