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परम धर्म संसद: "अयोध्या की धर्म सभा को राम मंदिर पर फैसला लेने का अधिकार नहीं"

आखिर क्यों वाराणसी की परम धर्म संसद से बीजेपी ने बनाई दूरी और क्यों अयोध्या की धर्म सभा से आने वाले लोगों को वाराणसी की धर्म संसद में जाने से रोका जा रहा है?

Vartika TomarVartika Tomar   28 Nov 2018 5:59 AM GMT

वाराणसी (उत्तर प्रदेश)। बनारस में चल रही परम धर्म संसद में जुटे धर्म गुरुओं का कहना है कि राम मंदिर और अन्य हिन्दू धार्मिक मामलों पर फैसला लेने का अधिकार केवल शंकरचार्य को है। अयोध्या धर्म सभा में केवल राजनैतिक हितों को साधने वाले लोग पहुंचे है। इतना ही नहीं, शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती की अध्यक्षता में हुई परम धर्म संसद में अयोध्या से आने वाले साधुओं और आम जनता को रास्ते में ही रोका गया।

पुलिस को चकमा देकर बनारस पहुंचे साधुओं ने इसकी पुष्टि की। परम धर्म संसद के दूसरे दिन देर छिपते-छिपाते पहुंचे स्वामी जन्मेजय शरण ने बताया, "अयोध्या से बनारस के रास्ते में मुझे पुलिस ने रोका और जब मैंने आश्वासन दिया कि मैं परम धर्म संसद में नहीं जाऊंगा, तब जाकर छोड़ा गया।" स्वामी जन्मेजय के मुताबिक वो राम मंदिर के अनशन भी कर चुके हैं।

भाजपा को रजिस्टर्ड डाक से आमंत्रण पत्र भेजा गया था। संघ प्रमुख मोहन भागवत के पास न्योते के लिए प्रति निधि मंडल भेजा गया, लेकिन उन्होंने मिलने से इंकार कर दिया। - स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, प्रतिनिधि शंकराचार्य

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पहले दिन का हाल- परम धर्म संसद: पढ़िए राम मंदिर, गंगा और केंद्र सरकार पर क्या बोले साधु-संत

बनारस में आयोजित धर्म संसद के संयोजक स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद हैं, इस धार्मिक संसद में सनातन धर्म, गंगा और मंदिरों के तोड़े जाने पर चर्चा हुई, जबकि अयोध्या में विहिप ने धर्मसभा आयोजित की है,जिसमें मुख्य एजेंडा राम मंदिर का निर्माण था। काशी की धर्म संसद को शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती समेत अनेक संत, समाजसेवी, सामाजिक कार्यकर्ता, अधिवक्ताओं आदि का समर्थन प्राप्त है, जबकि अयोध्या में आयोजित धर्मसभा को आरएसएस से जुड़े संगठनों व शिवसेना का समर्थन प्राप्त था।

भाजपा को वाराणसी की परम धर्म संसद में बुलाया नहीं गया।- अशोक पांडेय, प्रदेश प्रवक्ता, भाजपा

परम धर्म संसद में शंकराचार्य, उनके प्रतिनिधि 534 संसदीय क्षेत्रों के प्रतिनिधि सनातन धर्म के 281 संतों के साथ ही 184 धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि और विशिष्ट लोग भागीदारी कर रहे हैं।

भाजपा ने अपने को अयोध्या की धर्मसभा से अलग रखा, लेकिन अयोध्या से जो खबरें मिलीं, उसके मुताबिक भाजपा के कुछ सांसद व विधायक धर्मसभा में बाहर से आने वाले लोगों के स्वागत में सड़क के किनारे पोस्टर व होर्डिंग लगाए खड़े थे। जबकि बनारस परम धर्म संसद के भीतर और बाहर से भाजपा नदारद रही।

इस बारे में जब उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता अशोक पांडेय से बात की तो उन्होंने कहा, "भाजपा को बुलाया ही नहीं गया।" लेकिन शंकराचार्य के प्रतिनिधि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जब बात हुई तो उनका कहना था कि भाजपा को रजिस्टर्ड डाक से पत्र भेजा गया था। यही नहीं, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के पास न्योते के लिए प्रतिनिधि मंडल भी भेजा गया लेकिन उन्होंने मिलने से इंकार कर दिया। भाजपा अयोध्या में आयोजित धर्मसभा को बाहरी समर्थन दे रही है और नहीं भी है और यह उसकी रणनीति का हिस्सा समझा जा रहा है।

काशी की धर्म संसद में पहले दिन यानी 25 नवम्बर के पहले सत्र में बनारस के पक्कामहल में विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर के लिए मंदिर व घर तोड़ने का मुद्दा छाया रहा। धर्म संसद की शुरूआत ही इस मुद्दे पर चर्चा से हुई। दूसरे सत्र में विमर्श के केन्द्र में गंगा की अविरलता का मुद्दा रहा। उसके बाद गोरक्षा और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पर बहस हुई। कुछ प्रतिनिधियों ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि 2014 के बाद मीट निर्यात में लगातार वृद्धि हुई है। भारत दुनिया का अब सबसे बड़ा मीट निर्यातक देश बन गया है।

उधर, अयोध्या में 25 नवंबर को शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की उपस्थिति ने मीडिया की सारी सुर्खियां बटोर ली। ठाकरे ने सभा शुरू होने से एक दिन पहले ही यह कहकर राजनीतिक हलके में हलचल मचा दी कि हम अयोध्या कुम्भकरणी नींद में सोए और सत्ता सुख का आनन्द ले रहे महारथी को जगाने और मंदिर निर्माण की तारीख पूछने आए हैं। कहा, संसद में मंदिर निर्माण के लिए कानून लाओ।

ठाकरे ने तीन-चार माह पहले ही 25 नवम्बर को अयोध्या आने की घोषण कर दी थी। इससे भाजपा को लगा कि कहीं राममंदिर मुद्दा उनके हाथ से निकल न जाए। और यही कारण है कि आरएसएस ने विहिप को आगे करके 25 से 27 नवम्बर तक अयोध्या में धर्मसभा आयोजित करने की घोषणा कर दी थी। बनारस परम धर्म संसद में गंगा के लिए जान देने वाले प्रोफेसर प्रोफेसर जीडी अग्रवाल (स्वामी सानंद) की मौत का मामला भी ज़ोर शोर से उठा।

लखनऊ में एक कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बात करते हुए उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने कहा, "सभी चाहते हैं कि राम जन्मभूमि के मुद्दे पर जल्द हल निकले बीजेपी अपने संकल्प पत्र में अपने विचार रख चुकी है। किन्हीं कारणों से माननीय न्यायायल से निर्णय आने में देरी हुई? इसलिए जनता के मन में सवाल है।' इससे पहले डिप्टी सीएम 25 को वाराणसी भी पहुंचे थे, उन्होंने काशी विश्वनाथ के दर्शन किए थे उन्होंने वहां भी ऐसा ही बयान दिया था। लेकिन वो परम धर्म संसद में शामिल नहीं हुए थे।

गांव कनेक्शन से बातचीत के दौरान भाजपा प्रवक्ता अशोक पांडेय ने एक प्रश्न के जवाब में कहा कि परम धर्म संसद को वामी और कांग्रेसियों का समर्थन प्राप्त है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसके जवाब में कहा कि भाजपा के नेता भी शंकराचार्य के शिष्य हैं और वह पार्टी के आधार पर धार्मिक उपदेश नहीं देते। बनारस परम धर्म संसद में आए धर्म गुरुओं ने अयोध्या धर्म सभा को पर्यटन बताया।

वाराणसी की तीन दिवसीय परम धर्म संसद की खास बात ये है कि इसमें देश भी सभी संसदीय क्षेत्रों के प्रतिनिधि, चारों शंकराचार्य के प्रतिनिधि, धार्मिक गुरु, संत और 36 राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि शामिल हुए। परमधर्म संसद की कार्यवाही संसद की चली। हिंदू धर्म, गंगा और राम मंदिर पर चर्चा हुई। इस तीन दिवसीय परम धर्म संसद में शंकराचार्य, उनके प्रतिनिधि, 534 संसदीय क्षेत्रों के प्रतिनिधि, सनातन धर्म के 281 संतों के साथ ही 184 धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि और विशिष्ट लोग शामिल हुए।

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