आखिरी सांसे गिन रहा चुनार का पॉटरी उद्योग, बंद हो गए आधे से ज्यादा कारखाने

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   4 Dec 2017 5:43 PM GMT

आखिरी सांसे गिन रहा चुनार का पॉटरी उद्योग, बंद हो गए आधे से ज्यादा कारखानेपॉटरी उत्पाद काफी लोकप्रिय हैं।

मिर्जापुर (चुनार)। काशी और संगम के बीच स्थित उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर जिला वैसे तो अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन यहां चीनी मिट्टी से बनी आकर्षक कलाकृति किसी को भी आकर्षित कर लेती हैं। वाराणसी से लगभग 40 किमी दूरी पर बसा चुनार कभी पूरी दुनिया में अपने पॉटरी उद्योग के लिए प्रसिद्ध था। लेकिन समय के साथ-साथ ये कला अपनी पहचान खोती जा रही है। और अब तो हालात ये है कि ये उद्योग खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है।

मिर्जापुर के चुनार ब्लॉक में चीनी मिट्टी या पॉटरी जैसे उद्योग 1948 से ही स्थापित हो चुके थे। चीनी मिट्टी से ही पूरी दुनिया में प्रसिद्ध चुनार का किला भी बना था। यहां गंगा किनारे की लाल मिट्टी का उपयोग विभिन्न प्रकार की आकृतियां, खिलौने, प्लेट आदि बनाने में होता रहा है। इनके कारीगरी की अलग पहचान इनकी चमकदार ग्लासी फिनिशिंग से हैं जो चावल उगाने वाले मैदानों के से बने अनोखे पावडर (कबिज) से आती है। चीनी मिट्टी के बने बर्तनों, खिलौनों आदि को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने के लिए 1952 में सरकार ने 'राजकीय चीनी पात्र प्राधिकरण' की स्थापना की जिसका मूल उद्देश्य यहां के लोगों को कान देने के साथ इस प्राचीन कला को विकसित करना भी था।

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बावजूद इसके इस प्रचीन कला का विकास नहीं हो पाया। इसके पीछे कई कारण रहे। आजादी के बाद सरकारें तो बदलीं लेकिन इनकी सूरत नहीं बदली। समय के साथ-साथ पॉटरी उद्योग की स्थिति और बिगड़ती गई। आज ये हालात है कि चीनी मिट्टी का उद्योग अपनी आखिरी सांसे गिन रहा है।

इस बारे में हिरा पॉटरी उद्योग के संचालक और चुनार पाटरी एसोसिएशन के अध्यक्ष अवधेश वर्मा बताते हैं " एक समय था जब चीनी मिट्टी से बनी मूर्तियां पूरे देश में जाती थीं। सरकार ने बहुत पहले इसके लिए पहल भी की थी। लेकिन ये उद्योग अब दम तोड़ता नजर आ रहा है। कभी यहां 2000 से ज्यादा कारखाने हुआ करते थे। लेकिन अब इनकी संख्या 15-20 में सिमट गई है। कलाकृति बनाने में जो सामान उपयोग में आते हैं उनका दाम भी बेतहासा बढ़ गया है। सरकार की उदासीनता और जनप्रतिधिनियों की उपेक्षा के कारण ये कला खत्म होने वाली है।"

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चुनार में बने चीनी मिट्टी के बर्तन और दूसरे सजावटी सामान अपनी कसीदाकारी और खूबसूरती के कारण बरबस ही लोगों का मन मोह लेते हैं। लेकिन इससे जुड़े लोगों का जीवन दिन-ब-दिन बदरंग ही होता जा रहा है। चुनार में पॉटरी उद्योग के विकास के लिए प्रदेश सरकार द्वारा राजकीय चीनी मिट्टी पात्र विकास केंद्र की स्थापना आज से करीब 35 वर्ष पूर्व की गई थी। इस काम से जुडे़ सैकड़ों लोगों को इससे काफी आशाएं बंधी और यहां करीब 50 की संख्या में कारखानेदार जुड़ गये। उन्हें केंद्र से कच्चा माल उपलब्ध होने लगा। माल पकाने के लिए सरकारी स्तर पर बनाई गई भट्ठियां किराए पर उपलब्ध होने लगीं।

अपनी दुकान में अवधेश वर्मा।

वाराणसी से चुनार जाने के बाद पीपा पुल के सहारे जैसे ही आप गंगा उस पार जाएंगे तो सड़क किनारे लाइन से चीनी मिट्टी के डिजाइनर प्रोडक्ट आपको मिल जाएंगे। यहीं पर एक दुकानदार मुकेश जायसवाल बताते हैं "पहले तो यहां बहुत दुकानें थीं। 500 से ज्यादा दुकानें तो केवल चुनार में थीं। माल कही कभी कमी नहीं होती थी। लेकिन जैसे-जैसे कारखाने बंद हुए, दुकानें भी बंदी होती गईं। हमारी कमाई भी अब पहले जैसे नहीं रही।"

नई-नई डिजाइन बनाने के लिए चुनार में रिसर्च एवं डेवलपमेंट सेंटर की स्थापना हुई, जिसमें तकनीकी आधार पर रिसर्च कर पॉटरों को जानकारियां दी जाती थीं। बाद में धीरे-धीरे इस केंद्र की उपेक्षा होने लगी और करीब दस-बारह वर्ष से केंद्र पर ताला लटका हुआ है। चुनार के बाद खुर्जा में पॉटरी विकास के लिए केंद्र की स्थापना की गई और उसकी ओर अच्छा खासा ध्यान दिये जाने से आज खुर्जा का पॉटरी उद्योग दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है। चुनार में वर्तमान में इस उद्योग से जुड़े करीब एक दर्जन कारखानेदार रह गए हैं, जिनकी संख्या कभी 250 से ज्यादा हुआ करती थी। जहां पांच हजार लोगों की रोजी-रोटी इस उद्योग से चलती थी। आज कुल मिलाकर बमुश्किल दो ढाई सौ लोग इस उद्योग से लाभान्वित हो रहे हैं।

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जहां 90 के दशक में यह का पॉटरी उद्योग वर्ष में दो करोड़ से अधिक का टर्नओवर कर लेता था आज तीस लाख टर्नओवर बड़ी बात है। चुनार पाटरी एसोसिएशन के अध्यक्ष अवधेश ने बताया इस उद्योग में प्रयुक्त होने वाला कच्चा माल एवं कोयला के दामों में बेतहाशा वृद्धि के चलते लागत मूल्य अधिक होने लगा है। माल पकाने के लिए यहां डीजल फर्नेश बनाए जाने के साथ कच्चा माल सब्सिडी पर दिए जाने की मांग सरकार से की जाती रही है लेकिन इस पर किसी सरकार ने अब तक ध्यान नहीं दिया।

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चुनार में बने चीनी मिट्टी के बर्तन और दूसरे सजावटी सामान अपनी कसीदाकारी और खूबसूरती के कारण बरबस ही लोगों का मन मोह लेते हैं। लेकिन इससे जुड़े लोगों का जीवन दिन-ब-दिन बदरंग ही होता जा रहा है।

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