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अमृता विश्नोई जिसने पेड़ के बदले सिर कटाना बेहतर समझा, पर्यावरण संरक्षण का ये संदेश शायद ही भुलाया जा सके

इतिहास के पन्नों से: एक साधारण महिला की असाधारण कहानी जिसने दुनिया को पर्यावरण संरक्षण का ऐसा सन्देश दिया जिसे दुनिया कभी भुला नहीं पाएगी

Ashwani DwivediAshwani Dwivedi   8 Sep 2019 5:15 AM GMT

अमृता विश्नोई जिसने पेड़ के बदले सिर कटाना बेहतर समझा, पर्यावरण संरक्षण का ये संदेश शायद ही भुलाया जा सके

लखनऊ । " पेड़ को हम राखी बांधते हैं, ये हमारे घर के सदस्य हैं, इसे नहीं काटने देंगे। पेड़ के बदले अगर सिर कटाना पड़े तो मंजूर है"। आज से 289 साल पहले राजस्थान के जोधपुर जिले के एक किसान परिवार की सामान्य महिला द्वारा राजा के मंत्री से कहे गये इन शब्दों को राजद्रोह माना गया। इसकी सजा एक नहीं कई गाँव के लोगों को भुगतनी पड़ी लेकिन गाँव वालों ने पेड़ नहीं काटने दिए और आख़िरकार राजाज्ञा वापस ली गयी।

राजस्थान के जोधपुर जिले के जिला मुख्यालय से दक्षिण-पूर्व दिशा में मात्र 25 किमी की दूरी पर स्थित गाँव "खेजडली", विश्व में पर्यावरण संरक्षण के लिए एक मिसाल है। पूरी दुनिया में पर्यावरण संरक्षण को लेकर इतनी बड़ी कुर्बानी का उल्लेख और कहीं नहीं मिलता।

लेखक बनवारी लाल साहू द्वारा लिखित पुस्तक " पर्यावरण संरक्षण एवं खेजडली का बलिदान " पुस्तक में इस घटना का उल्लेख किया गया है। बात सत्रहवीं शताब्दी की है। जोधपुर के तत्कालीन महाराज अजीत सिंह के महल का निर्माण हो रहा था। महल के निर्माण में उपयोग होने वाले चूने को बनाने वाले भट्ठों के लिए मजबूत लकड़ी की जरूरत थी। जिसकी व्यवस्था के लिए जोधपुर महाराज के पुत्र अभय सिंह ने राज्य के मंत्री गिरिधारी दास भंडारी को आदेश दिया।

लकड़ी की व्यवस्था की तलाश में मंत्री गिरिधारी दास भंडारी की नजर नजदीक के गाँव खेजडली पर पड़ी जहाँ पर खेजड़ी के वृक्षों की संख्या ज्यादा थी। अपने कारिंदों को साथ लेकर मंत्री गिरिधारी दास गाँव पहुंचे और एक घर के बाहर लगे खेजड़ी के पेड़ को कटवाना शुरू कर दिया। घर की मालकिन अमृता देवी विश्नोई ने मंत्री से पेड़ काटने का विरोध यह कहते हुए किया कि खेजड़ी को हम लोग राखी बांधते हैं और ये पेड़ हमारे घर के सदस्य की तरह है। हम इसे नहीं काटने देंगे। महिला अमृता से विवाद बढ़ने पर खेजडली गाँव के लोग भी मौके पर जमा हो गये और गाँव के पेड़ों को काटने का विरोध कर दिया, लोगों का गुस्सा देख मंत्री को उल्टे पांव जोधपुर लौटना पड़ा।

लेकिन बात यहीं खत्म नही हुई। अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से 21 सितम्बर सन 1730 ई (भारतीय समय के अनुसार भाद्रपद, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि, विक्रम संवत 1787) को सूर्योदय से पहले ही मंत्री गिरिधारी दास भंडारी अपने लाव–लश्कर और खतरनाक इरादों के साथ गाँव पपहुंच गये और खेजड़ी के पेड़ों को कटवाना शुरू कर दिया।

सुबह उठी अमृता देवी ने खेजड़ी के पेड़ को कटते देख हंगामा करना शुरू कर दिया और खेजड़ी के पेड़ से लिपट गयी जिस पर सैनिकों ने खेजड़ी के पेड़ के साथ अमृता देवी का सिर भी काट दिया। माँ की हत्या होते देख अमृता की दो बेटिया भी पेड़ को बचाने के लिए पेड़ से लिपट गयीं और उनकी भी सिर काट दिए गए। अमृता और उनकी बेटियों के बलिदान देख गाँव के विश्नोई समाज के लोगों के एक अनूठा निर्णय ले लिया जिसका अंदाजा मंत्री को भी बिल्कुल नही रहा होगा।

गाँव का एक पुरुष अणदोजी आगे बढ़कर खेजड़ी के पेड़ से लिपट गया और सैनिको ने पेड़ के साथ उसका भी सिर कलम कर दिया। डरने और हताश होने के स्थान पर खेजडली और आस-पास के गाँव में बसें विश्नोई समाज के लोगों ने अमृता का अनुसरण करते हुए खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए बलिदान देने का फैसला किया और मंत्री के सैनिकों ने खेजड़ी के पेड़ से चिपके हुए 363 लोगों के सिर काट दिए। इस बलिदान से दशमी की तिथि हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों पर अंकित हो गयी।

इस घटना की खबर जंगल के आग की तरफ चारों ओर फैलने लगी। दूरदराज से विश्नोई समाज और आस-पास के तालुके के लोग जमा होने लगे। पर्यावरण बचाने के लिए इतनी बड़ी कुर्बानी देख लोग हतप्रभ थे।

इस घटना की जानकारी जब जोधपुर महाराज अजीत सिंह को हुई तो उन्होंने मंत्री को वापस बुला लिया और राजस्थान में खेजड़ी के पेड़ को काटने पर हमेशा के लिए प्रतिबन्ध की घोषणा कर दी। बाद मे आई अंग्रेजी सरकार और आजादी के बाद बनी भारत सरकार ने जोधपुर महाराज के फैसले को यथावत रखते हुए खेजड़ी के पेड़ को काटने पर प्रतिबन्ध बरकरार रखा जो आज भी लागू हैं। साल 1983 में राजस्थान सरकार ने खेजड़ी के वृक्ष को राजवृक्ष घोषित कर दिया।

उस घटना के बाद से अब तक हर साल सितम्बर यानी भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को अमृता देवी और विश्नोई समाज के बलिदानियों की याद में खेजडली गाँव में वृक्ष मेला का आयोजन किया जाता है।

वर्ल्ड पार्लियामेंट एन्वायरमेंट एंड क्लाइमेट चेंज के मंत्री और हीलिंग अर्थ संस्था के सदस्य एस.डी विजयन बताते हैंं, " अमृता विश्नोई समाज की थीं और विश्नोई समाज हमेशा से ही पर्यावरण का संरक्षक रहा है। आज भी राजस्थान के इस इलाके में महिलाएं हिरणो के भटके हुए छोटे बच्चों को अपना दूध पिलाकर पाल लेती हैं।"

विश्नोई समाज की कहावत है

"सर साठे रूख रहे, तो भी सस्तों जांण" अगर सिर कटने से वृक्ष बच रहा हो तो ये सस्ता सौदा हैं।

राजस्थान के जोधपुर जिले फलौदी तहसील के जाम्भा, (जाम्हुना) पूर्व पीठ के श्री मन्हंत भंजदास जी जाम्भा बताते हैं "भगवान जाम्भा ने विश्नोई समाज की शुरुआत की थी हमारे समाज के लोग 29 नियमों का पालन करते हैं जिसमे जीवरक्षा और पर्यावरण रक्षा प्रमुख हैं और आज तक विश्नोई समाज नियमों का पालन करता आया है।

अमृता देवी का बलिदान और विश्नोई समाज का पर्यावरण के लिए बलिदान विश्नोई समाज के लिए गर्व का विषय है उनकी याद में बनवाया गया स्मृति स्तम्भ आज भी श्रद्धा का केंद्र हैं। श्री महंत बताते हैं विश्नोई समाज के लोग देश- दुनिया में जहाँ भी हैं पर्यावरण के प्रति उनमें विशेष स्नेह हैं। मुख्यरूप से विश्नोई समाज के लोग राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा ,पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र में बसे हैं लेकिन सबका मूल राजस्थान ही है।

जानिये उस वृक्ष के बारें में जिसके लिए विश्नोई समाज ने कटाए 363 सिर

खेजड़ी का वृक्ष

"खेजड़ी" वृक्ष को उत्तर प्रदेश में "शमी" कहा जाता हैं। पंजाबी भाषा में इसे शमी या सुमरी कहते हैं,अंग्रेजी भाषा में प्रोसेपिस सिनेरेरिया कहा जाता है। यह वृक्ष ज्यादातर रेगिस्तानी इलाकों में पाया जाता है इसे "थार का कल्पवृक्ष " की भी कहा जाता है। इस पेड़ का भारतीय धर्मग्रंथों में भी महत्व बताया गया है।

जानिये क्यों खेजड़ी को कहते हैं कल्पवृक्ष

रेगिस्तान की भयंकर गर्मी में भी खेजड़ी का पेड़ हरा भरा रहता है और इस समय पशुओं के लिए हरे चारे की कमी होती है। इन पेड़ों से पशुओं को हरा चारा मिलता है। इसमें आने वाले फूल की मंझरी और फल को सारंगी कहा जाता है सारंगी की हरी फलिया सब्जी बनाने के काम और सूखी फलिया दलहन के काम में आती है।

खेजरी पेड़ की लम्बाई थार में आमतौर पर लगभग 24 फीट होती है और इसकी जड़ें जमीन में लगभग 90 फीट की गहराई तक चली जाती हैं। इसकी मजबूत लकड़ी जलाने, फर्नीचर बनाने और हल बनाने के काम आती है। औषधीय रूप से भी खेजड़ी वृक्ष बहुत उपयोगी है।

रामायण और महाभारत ग्रंथों में भी शमी (खेजरी) के वृक्षों का उल्लेख किया है। साल 1899 में राजस्थान में पड़े भीषण अकाल में इस पेड़ के तन की छाल, फलियों और पत्तियों के उपयोग का भी उल्लेख राजस्थान के साहित्य और किताबों में मिलता है।

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