"नदी के किनारे जन्म लेना हमारे लिए गुनाह साबित हो रहा है"

Arvind ShuklaArvind Shukla   21 May 2019 6:44 PM GMT

रिपोर्ट- अरविंद शुक्ला/दया सागर

सीतापुर (उत्तर प्रदेश) । "यह नदी उसी तरह जमीन काटती है, जिस तरह आरी पेड़ को काटती है। जब इसका (शारदा नदी) प्रकोप आता है तो बच्चे-बूढ़े घर-बार, खेत-खलिहान सभी प्रभावित होते हैं। चौमास (बरसात के चार महीने) में तो हमें अपनी जिंदगी मचान पर बितानी पड़ती है। कामायनी की जलप्रलय का दृश्य आंखों के सामने जीवंत होता दिखता है।' पैंसठ साल के सुरेश द्विवेदी नदी दिखाते हुए बताते हैं।

सुरेश द्विवेदी (65) सीतापुर जिले के रतौली गांव के कुछेक पढ़े-लिखे इंसानों में से हैं। गांव कनेक्शन की टीम उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से बिल्कुल सटे हुए सीतापुर जिले में पहुंची थी। जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बेहटा ब्लॉक का यह गांव शारदा नदी के किनारे बसा हुआ है। वैसे तो नदियों को जीवनदायिनी माना जाता है लेकिन रतौली और आस-पास के दर्जनभर गांवों के लिए यह यह अभिशाप से कम नहीं है।

हर साल बाढ़ और नदी की कटान की वजह से यह इलाका कई महीने देश से लगभग कट भी जाता है। गांव के नजदीक में कोई पुल या पक्की सड़क नहीं है, जिससे गांव से बाहर निकला जा सके। एकमात्र सहारा नाव का होता है, जिस पर सवारी करना जोखिम लेने से कम नहीं होता है। लखीमपुर जिले की तरफ एक सड़क बनी भी थी लेकिन उस पर बाढ़ की बालू जमा हो गई है।

गांव में सिर्फ एक पक्की सड़क है लेकिन बाढ़ के बाद आने वाले बालू से वह पटा रहता है।गांव में सिर्फ एक पक्की सड़क है लेकिन बाढ़ के बाद आने वाले बालू से वह पटा रहता है।

इस गांव में आज तक न बिजली पहुंची है। सूरज की रौशनी सौर ऊर्जा के रूप में रात भी कई घरों में नजर आती है। रतौली गांव बाढ़ के चलते दो हिस्सों में कट गया है। सीतापुर वाले हिस्से के घर पक्के हैं, राशन की दुकान और अस्पताल भी नजदीक है। लेकिन मुसीबत उनके लिए है जो नदी के दूसरी तरफ हैं। वहां न स्कूल है, न बिजली। राशन के लिए भी या तो नदी पार करो या 20 किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय कर रतौली के दूसरे भाग में पहुंचे।

सुरेश द्विवेदी कहते हैं, 'हमें तो लगता नहीं हम इसी देश के हैं। आजादी के बाद 72 सालों में हमें क्या मिला? हम आजादी से पहले जिस हालत में रहते थे उसी हालत में अभी भी हैं। तो फिर ऐसी आजादी का क्या फायदा है? नदी के किनारे जन्म लेना हमारे लिए गुनाह साबित हो रहा है।"

गांव वालों के पास एक ही नाव है। नदी के एक तरफ लोग बैठकर इंतजार करते हैं जब तक नाव दूसरी तरफ से सवारियों को लेकर नदी किनारे पर नहीं आ जाती है। लगभग आधे किलोमीटर चौड़ी इस नदी को पार करने में 45 से 60 मिनट का समय लग जाता है। हवा विपरीत दिशा में हो तो यह सफर और भी मुश्किल हो जाता है।गांव कनेक्शन की टीम 18 अप्रैल को दोपहर बारह बजे जब इस गांव में जाने के लिए नदी के किनारे पहुंची तो आधे घंटे तक इंतजार करना पड़ा। नाव किनारे पर लगते ही भर गई। लगभग दस लोगों के अलावा नाव पर तीन मोटरसाइकिल और चार साइकिल लदी थीं। घर के लिए गल्ला (सामान) लाने बाजार गए एक युवक रईस (26 वर्ष) को नाव में जगह नहीं मिली और उसे लगभग चार घंटे तक नाव के आने का इंतजार करना पड़ा।

रईस बार-बार कह रहे थे, "मैं सुबह से ही घर से निकला हूं। खाना भी नहीं खाया है। भूख लगी है। अगर यह नाव नहीं मिली तो मुझे भूखे पेट ही शाम तक इंतजार करना पड़ेगा।" रईस की बात सही साबित हुई। गांव कनेक्शन की टीम जब गांव का भ्रमण कर दोबारा नदी के किनारे पहुंची तब रईस नाव से उतर रहे थे। हमें देखते हुए वह मुस्कुराने लगे और बोलें, "आप लोगों की वजह से मुझे दिन भर भूखा रहना पड़ा।"

नाव चलाने की ठेकेदारी रखने वाले बुजुर्ग भोला प्रसाद (70 वर्ष) बताते हैं, "रोज लगभग 200 से 250 लोग नदी पार करते हैं। जिस दिन बाजार होता है उस दिन भीड़ और बढ़ जाती है। यहां के लोगों की जरूरत गांव के किनारे बंधा और एक पुल है लेकिन कौन ही इस पर ध्यान देने वाला है?"

नदी पर सवार बुजुर्ग सीता (63) ने बताया कि वह राशन लेने नदी पार करके आई थी, लेकिन कोटेदार नहीं था। अब वो फिर किसी दिन आएंगी। महिला ने बताया कि ऐसा कई बार होता है जब उन्हें राशन ना मिले। राशन मिलने की पूर्व सूचना भी गांव के उस पार नहीं जा पाती है।

सीता देवी को राशन लेने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है। कई बार उन्हें राशन मिलती हैं तो कई बार उन्हें निराश वापस लौटना पड़ता है। इस दौरान उनका पूरा दिन इसी में कट जाता है।  सीता देवी को राशन लेने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता है। कई बार उन्हें राशन मिलती हैं तो कई बार उन्हें निराश वापस लौटना पड़ता है। इस दौरान उनका पूरा दिन इसी में कट जाता है।

नदी के कटान से दो हिस्सों में बंट चुका है गांव

कटान की वजह से रतौली गांव दो हिस्सों में बंट चुका है। आधा गांव नदी के एक तरफ जबकि आधा गांव नदी के दूसरी तरफ है। वहीं कई घर और खेत नदी की कटान की वजह से नदी में ही जमींदोज हो चुके हैं। गांव का सरकारी अस्पताल, प्राथमिक स्कूल, सरकारी राशन की दुकान, ग्राम पंचायत नदी के दूसरी तरफ है। किसी भी जरूरी काम के लिए गांव वालों को नाव से नदी पार करना होता है।

'क्या जान दांव पर लगाकर वोट देने जाएं?'

गांव के लोग वर्तमान व्यवस्था से काफी दुःखी हैं। इस व्यवस्था से उनका विश्वास उठ गया है। इलाके के कई लोग तो लोकसभा चुनाव के बहिष्कार की बात भी कर रहे थे। सुरेश द्विवेदी कहते हैं कि उन लोगों के लिए वोट देना व्यवहारिक रूप से भी संभव नहीं है। " लोकसभा चुनाव के बात पता चला कि इस गांव के 70 फीसदी के करीब लोग वोट नहीं डाल पाए। क्योंकि पोलिंग बूथ नदी के दूसरी तरफ था और नाव से एक बार में 20-25 लोग ही जा सकते थे। नाव को पार करने में एक घंटा लग जाता है। ऐसे में गांव 70ां0-800 वोटर कैसे एक दिन में नदी पार कर पाते। गांव के लोग अस्थाई पोलिंग बूथ बनाने की मांग कर रहे थे, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया।

क्या पूरी हो पाएगी चम्पा देवी की 'आखिरी इच्छा?'

गांव के बुजुर्गों को उम्मीद नहीं है कि वह कभी भी अपने गांव में बांध और पुल बनता देख पाएंगे। लगभग सत्तर साल की चम्पा देवी कहती हैं, "मेरी तो उम्र हो गई बाढ़ और पानी देखते-देखते। वोट के समय कई नेता आते हैं और कहते हैं पुल बनेगा, बंधा बनेगा लेकिन जीतने के बाद कोई नहीं आता।"

चम्पा देवी कहती हैं कि उनकी आखिरी इच्छा है गांव में पुल, बांध, बिजली, स्कूल और सड़क हो। लेकिन उन्हें यह भी पता है कि उनकी यह इच्छा कभी भी नहीं पूरी होगी। इसी नाउम्मीदी में वह मुंह को साड़ी से ढक कर अपनी आंसू छिपाने लगती हैं।

पिछले साल बाढ़ में कटे लोग अब सड़क किनारे रहने को मजबूर

2018 में आई बाढ़ में गांव के मुस्लिम टोले के घर नदी में बह गए। करीब 50 परिवार गांव से दूर एक सड़क के किनारे झोपड़ियों में जीने को मजबूर हैं। जिनका पक्का घर कटा था उन्हें 95 हजार और छप्पर वालों को 4600 रुपए मिले थे, लेकिन वो जमीन नहीं मिली जिस पर घर बसाया जा सके।

करीब 6 महीने सड़क किनारे रह रही फातिमा (65 वर्ष) रोते हुए कहती हैं, " एक रात सोए थे, अगले दिन उठे तो सब पानी-पानी था। कुछ दिन तो घर में ही मचान बनाकर हम लोग रहें, लेकिन जब पता चला कि यहां रहना अब खतरे से खाली नहीं है तो हमें अपना घर-बार छोड़कर निकलना पड़ा। खेत भी कट गए। अपने खेत बची नहीं तो दूसरे के खेतों में मजदूरी कर के पेट पालते हैं।"

2018 के बाढ़ में गांव का मुस्लिम टोला पूरी तरह से कट गया। अब वे सड़क किनारे जिंदगी बिताने को मजबूर हैं।2018 के बाढ़ में गांव का मुस्लिम टोला पूरी तरह से कट गया। अब वे सड़क किनारे जिंदगी बिताने को मजबूर हैं।

इसी टोले के कमाल अहमद ने बताया कि आवास और कॉलोनी के लिए वे तहसील से लेकर जिला मुख्यालय तक दौड़े, लेकिन कहीं भी कोई सुनवाई नहीं हुई। "ये भी पतली सी सड़क है, दोनों तरफ लोग रहते हैं। मोटर साइकिलों का आना-जाना लगा रहता है। बच्चें सड़क पर ही खेलते हैं इसलिए डर भी बना रहता है।"

'उसी नदी में पानी, उसी में शौच'

स्वच्छ भारत अभियान के तहत रतौली गांव में कुछ 'इज्जत घर' बने हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि जो शौचालय बने हैं, वे आधे-अधूरे हैं इसलिए प्रयोग में नहीं है। इसलिए गांव की 95 प्रतिशत आबादी बाहर खेतों में ही शौच करती है। लेकिन असल समस्या बाढ़ के समय आती है।

गांव की महिला रानी बताती हैं, "बाढ़ के वक्त बहुत दिक्कत होता है। पानी में ही शौच करना पड़ता है और उसी नदी के पानी को पीने के लिए भी इस्तेमाल करना पड़ता है। इससे अधिक दुर्भाग्य की बात क्या होगी।" गांव के लोगों ने बताया कि बाढ़ के दौरान कई बार नाव से ऊंची जगहों पर जाते हैं तो कई बार खड़े होकर ही नित्यकर्म करना होता है।

'सड़क, बिजली, पानी, स्कूल कुछ भी नहीं है'

उज्जवला योजना को छोड़कर बाकी कोई भी योजनाएं शारदा के पानी को पार नहीं कर पाईं। रतौली के पहले पुरवा में सिर्फ 3-4 लोगों को कॉलोनी (प्रधानमंत्री आवास) मिली है। गांव के कई लोग इसके लिए प्रधान को जिम्मेदार बताते हैं।

"जो लोग प्रधान के साथ रहते हैं, सिर्फ उन्हें ही सरकारी योजनाएं मिलती हैं। बाकी में कोई न कोई अडंगा लगा दिया जाता है।" अपने छप्पर को दिखाते हुए गांव के एक युवक ने बताया।

लखीमपुर की तरफ से पूर्व सांसद जितिन प्रसाद के कार्यकाल में एक सड़क बनी थी। वो रतौली के कुछ नजदीक आई। लेकिन उस पर जगह-जगह कई फीट बालू जमा है। गांव के दूसरे रास्ते कच्चे ही हैं। लोग पगड़डियों के सहारे ही आवागमन करते हैं।

गांव में स्कूल नहीं है तो बच्चे गांव में इधर-उधर खेलते या खेतों में काम करते मिल जाएंगे।गांव में स्कूल नहीं है तो बच्चे गांव में इधर-उधर खेलते या खेतों में काम करते मिल जाएंगे।

नहीं जल पाई शिक्षा की लौ

बाढ़ प्रभावित रतौली और उसके आसपास नजदीक में कोई स्कूल न होने से गिनती के बच्चे स्कूल जाते हैं। करीब 95 फीसदी लोग साक्षर नहीं हैं। गांव में पत्रकारों के आने की ख़बर सुनकर रतौली के पड़ोसी गांव से आए युवा रोहित पड़ोसी जिले लखीमपुर में रहकर स्नातक कर रहे हैं।

रोहित ने बताया, "मैंने अपनी पढ़ाई के लिए काफी कुछ झेला है। लेकिन सब ऐसा नहीं कर पाते हैं क्योंकि रोड, पुल और बांध नहीं है। कई महीने तक ये गांव कटा रहता है इसलिए जो बच्चा बाहर जाकर पढ़ना चाहे उनके पास भी कोई साधन नहीं रहता।"

शिव सहाय गिरी (55) उन कुछ लोगों में से हैं जिन्होंने गांव में शिक्षा के लिए अपने स्तर पर प्रयास किए। शिव सहाय खुद पांचवीं तक पढ़ाई की है। वह खेती और मजदूरी करते हैं। कुछ साल पहले उन्होंने अपनी मजदूरी के पैसों से एक स्कूल खोला और शिक्षा की अलख जगाने की कोशिश की। शिव सहाय गिरी का स्कूल दो-तीन साल तक चला लेकिन बाद सहयोग के अभाव में बंद हो गया। इसके बाद उन्होंने स्कूल के लिए डीएम से लेकर पीएम तक को पत्र लिखा। लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। इस तरह संसाधनों का अभाव, शिक्षा की लौ नहीं जला सका। "सब कुछ कर के देख लिया लेकिन हाथ में कुछ नहीं मिला।" पीएम को भेजे गए पत्रों को दिखाते हुए शिव सहाय गिरी कहते हैं।

स्कूल के लिए प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्रों को दिखाते शिव सहाय गिरी। वह गांव में स्कूल खुलवाने के लिए पिछले कई साल से प्रयासरत हैं। पीछे रोहित राज खड़े हैं जो कि बाहर रहकर पढ़ाई कर रहे हैं।स्कूल के लिए प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्रों को दिखाते शिव सहाय गिरी। वह गांव में स्कूल खुलवाने के लिए पिछले कई साल से प्रयासरत हैं। पीछे रोहित राज खड़े हैं जो कि बाहर रहकर पढ़ाई कर रहे हैं।

बाढ़ की वजह से सिर्फ एक फसल उगा पाते हैं किसान

इस इलाके को गांजर भी कहा जाता है। यहां बालू को छोड़ दिया जाए तो मिट्टी उपजाऊ है। गन्ना यहां की मुख्य फसल है। ज्यादातर लोग किसान है, बाकी लोग खेतिहर मजदूर। गन्ने के अलावा जो दूसरी फसल उगाते हैं वो सिर्फ एक फसल ले पाते हैं। बाढ़ के चलते धान नहीं होता, कुछ खेतों में रबी के सीजन में गेहूं और सरसों जरुर हो जाती है। ग्रामीणों ने बताया कि अभी अप्रैल का महीना चल रहा है लेकिन नदी अपना रंग दिखाना शुरू कर चुकी है। यह कटाव कर रही है जिसकी वजह से गन्ने और गेहूं के फसल का हिस्सा नदी में जाकर मिलता जा रहा है।


नदी से हो रही खेत के कटान को दिखाते आशुतोष शुक्ला। वह कह रहे हैं कि इस बार अप्रैल से ही नदी थोड़ी-थोड़ी कटनी शुरू हो गई है।नदी से हो रही खेत के कटान को दिखाते आशुतोष शुक्ला। वह कह रहे हैं कि इस बार अप्रैल से ही नदी थोड़ी-थोड़ी कटनी शुरू हो गई है।

बगल के गांवों का भी है यही हाल

बाढ़ और कटान की समस्या सिर्फ रतौली नहीं बल्कि शारदा नदी के किनारे बसे लगभग दर्जन भर गांवों की है। गांव कनेक्शन की टीम जब रतौली के बगल के गांव बरैती पहुंची तो वहां भी लगभग समान हालत देखने को मिले। ग्रामीणों ने हमें गांव का मुख्य रास्ता दिखाया जो कि कटान की वजह से धंस चुका है। एक बुजुर्ग मिश्री लाल (71) मिले जो अभी से मचान बनाकर बाढ़ से बचने के लिए तैयारियां कर रहे थे। वह पेड़ पर चारपाई बांधकर मचान बन रहे थे।

मिश्री लाल अप्रैल महीने में ही मचान बनाकर बाढ़ से निपटने की तैयारी करने लगे हैं।मिश्री लाल अप्रैल महीने में ही मचान बनाकर बाढ़ से निपटने की तैयारी करने लगे हैं।

मिश्री लाल से जब पूछा गया कि उनकी जिंदगी इतनी दूभर है तो फिर वे यह जगह क्यों छोड़ नहीं देते? मिश्री लाल ने कहा, "हम घर तो छोड़ दें और कहीं दूसरे जगह पर अपना छप्पर बना लें लेकिन खेत कहां से मिलेगा। हमारी जिंदगी खेती पर ही निर्भर है। बच्चे भी पढ़े-लिखे नहीं हैं कि नौकरी कर लें। इसलिए खेत छोड़कर नहीं जा सकते।"

गांव की एक महिला सेमा (48) कहती हैं, "सरकार क्या करती है? जब बाढ़ आता है तो सरकार बिस्कुट, नमक, चीनी, आटा बांटती है। बाढ़ खत्म होने के बाद हम लोगों को अपना जमीन ढूढ़कर फिर से घर बनाना पड़ता है। कुछ लोगों की जमीन नहीं मिलती तो वे लोग सड़क के किनारे छप्पर बनाकर रहते हैं।"

शारदा और घाघरा नदी की बाढ़ और कटान की समस्या बहुत विकराल है। यह किसी एक गांव और जिले की समस्या नहीं बल्कि पूरे अवध क्षेत्र, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की समस्या है। हर साल इस बाढ़ और कटान की समस्या से लाखों लोग प्रभावित होते हैं। सरकारें भी फौरी राहत के तौर पर खाना-पानी और चिकित्सा की व्यवस्था तो कर देती हैं, लेकिन स्थायी समाधान की तरफ किसी का भी ध्यान नहीं जाता।

केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के जुलाई, 2018 के सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक बाढ़ से हर साल लाखों लोग प्रभावित, विस्थापित और बेघर होते हैं। जहां हर साल देश का एक हिस्सा जहां सूखे से प्रभावित होता है, वहीं दूसरा हिस्सा बाढ़ और नदियों की कटान की त्रासदी झेलता है।


गंगा, कोसी, यमुना, राप्ती, गंडक, ब्रह्मपुत्र और घाघरा जैसी नदियां हर साल उत्तर और पूर्व भारत के लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं। वहीं महानदी, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा, स्वर्णरेखा और दामोदर जैसी नदियां दक्षिण भारत में तबाही मचाती हैं।

बाढ़ से हर साल औसतन 5000 करोड़ रूपए की संपत्ति का नुकसान होता है। वहीं लगभग 1.680 करोड़ रूपए की फसलें हर साल नष्ट होती हैं। जबकि लगभग एक लाख पालतू पशु अपनी जिंदगी खो देते हैं। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में बाढ़ से होने वाली मौतों की संख्या का 20 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ भारत में ही होता है।



रतौली गांव के लोग समस्या के स्थायी समाधान लिए बांध, पुल और सड़कें बनवाने के साथ ही नदी में भरे सिल्ट (गाद) को खत्म करने की बात करते हैं। वे इसके लिए नदी की फिर से खुदाई कर उसे और गहरा करने की बात करते हैं। गांव के ही एक युवा आशुतोष शुक्ला ने गांव की समस्या को लेकर अधिकारियों और नेताओं से कई बार गुहार लगाई है। लेकिन कहीं कोई भी सुनवाई नहीं हुई। वह कहते हैं, "सरकारों और अधिकारियों को ना सिर्फ पुनर्वास की व्यवस्था करनी चाहिए बल्कि ऐसा कुछ उपाय करना चाहिए जिससे बाढ़ और कटान की दुर्दशा हर साल ना सहनी पड़ी।"

आशुतोष आरटीआई कार्यकर्ता हैं और उन्होंने गांव की समस्याओं और योजनाओं के लिए कई बार आरटीआई लगाई है। आशुतोष कहते हैं, "2010 में गांव को कटान से बचाने के लिए 90 करोड़ रुपए से बांध बनना था। उस समय इलाके के सांसद जितिन प्रसाद केंद्रीय मंत्री थे। उस समय केंद्रीय जल संसाधन मंत्री पवन बंसल भी गांव में आए थे। लेकिन उसके बाद इस योजना का क्या हुआ पता ही नहीं चला। बांध कुछ दूरी तक तो बना, लेकिन पूरा नहीं बन पाया। मैं इस बारे में आरटीआई लगाया, कई बार सीतापुर से लेकर लखनऊ और दिल्ली तक गया। गांव वालों के साथ जाकर तहसील और जिला मुख्यालय पर धरना दिया। लेकिन कोई बात नहीं बनी।" खबर मूल रुप से 30 अप्रैल 2019 को गांव कनेक्शन वेबसाइट पर प्रकाशित की गई।

(रिपोर्टिंग सहयोग- मोहित शुक्ला)

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