प्रकृति पूजा का पर्व- हरितालिका तीज या तीजा

हरितालिका तीज को हम प्रकृति की मेंहदी रस्म भी कह सकते हैं, एक ओर जहां प्रकृति भौंर माल, करियाली, कलिहारी, तिवाड़िया, काँस आदि रंग बिरंगे फूलों से सज जाती है, वहीं महिलाएं इस दिन अपने हाथों और पैरों में मेंहदी, आलता लगाती हैं।

Dr.Vikas SharmaDr.Vikas Sharma   9 Sep 2021 2:20 PM GMT

प्रकृति पूजा का पर्व- हरितालिका तीज या तीजा

इस दिन माता गौरी और भगवान शंकर की पूजा की जाती है। सभी फोटो: दिवेंद्र सिंह

प्रकृति पूजा से जुड़ा हुआ यह त्यौहार मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश के सबसे प्रमुख तीज त्यौहारों में से एक माना जाता है। ग्रामीण भारत में इस व्रत की बहुत मान्यता है, जिसे महिलाएं व लड़कियां निर्जला और निराहार रात्रि जागरण कर भोलेनाथ की आराधना के साथ पूरा करती हैं। इस दिन प्रकृति के अमूल्य धरोहर वनस्पतियां एवं जंगली जड़ी बूटियों की पूजा की जाती है। यह त्योहार प्रतिवर्ष हरे भरे भादो मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन मनाया जाता है, इसीलिये इसे हरतालिका तीज और तृतीया तिथि होने के कारण इसे 'तीजा आदि नामों से जाना जाता है। लड़किया और विवाहित महिलाएं इस दिन उपवास रखती हैं। इस दिन सोलह श्रृंगार करने के बाद पेड़, नदी और जल के देवता वरुण की पूजा की जाती है.

क्यों मनाया जाता है यह त्यौहार

धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती के पिता विष्णु जी के साथ पार्वती जी का विवाह करना चाहते थे। लेकिन माता पार्वती शिव शंकर जी से शादी करना चाहती थीं। इसलिए पार्वती जी की सखियां उन्हें भगाकर जंगल में लेकर चली गयीं, जहां उन्होंने इस उपवास और पूजन से भोलेनाथ की आराधना की। सखियों (आलिका) द्वारा पार्वती जी का हरण (हरत) किये जाने के कारण इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा।

मान्यता है कि इस दिन माता पार्वती ने कठोर तपस्या से भगवान शिव को पति के रूप में पाया था. कहा जाता है कि इसी दिन माता पार्वती सैकड़ों साल की साधना के बाद भगवान शिव से मिली थीं. यह भी कहा जाता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए 107 बार जन्म लिया, फिर भी माता को पति के रूप में शिव मिल न सके। फिर माता पार्वती ने 108वीं बार जब जन्म लिया और हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर में घोर तपस्या की। पुराणों की कथा के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव देवी पार्वती की तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन दिए, साथ ही उन्हें अपनी पत्नी बनाने का वरदान दिया था।

यह त्योहार प्रतिवर्ष हरे भरे भादो मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन मनाया जाता है, इसीलिये इसे हरतालिका तीज और तृतीया तिथि होने के कारण इसे 'तीजा आदि नामों से जाना जाता है।

हरतालिका तीज (Hartalika Teej) के दिन महिलाएं अपने पति के लिए निर्जला व निराहार व्रत रखती हैं। मान्यता है कि हरतालिका तीज का व्रत करने से सुहागिन महिला के पति की उम्र लंबी होती है जबकि कुंवारी लड़कियों को मनचाहा वर मिलता है। इस दिन माता गौरी और भगवान शंकर की पूजा की जाती है। इस बार तो हरतालिका तीज में इतना सुखद योग है जो पिछले 16 सालों बाद पड़ रहा है।

इस उत्सव को हम प्रकृति की मेंहदी रस्म भी कह सकते हैं, एक ओर जहां प्रकृति भौंर माल, करियाली, कलिहारी, तिवाड़िया, काँस आदि रंग बिरंगे फूलों से सज जाती है, वहीं महिलाएं इस दिन अपने हाथों और पैरों में मेंहदी, आल्ता आदि रचाती हैं. सुहागिन महिलाएं मेंहदी रचाने के बाद अपने कुल की बुजुर्ग महिलाओं से आशीर्वाद लेती हैं, इस दिन प्रफुल्लित मन से झूला-झूलने का भी रिवाज है।

कैसे पूर्ण किया जाता यह व्रत

हरितालिका तीज के दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं। हरियाली तीज के दिन महिलाएं सुबह स्नान करने के बाद सोलह श्रृंगार करके निर्जला व्रत रखती हैं। इसके बाद पूरी रात जागरण करके मां पार्वती और भगवान शिव की पूजा-अर्चना करती हैं। पूजा के अंत में तीज की कथा सुनी जाती है। इसके बाद ही महिलाएं अपना व्रत समाप्‍त करती हैं।

हरतालिका तीज का व्रत अत्‍यंत कठिन माना जाता है. यह निर्जला, एवम निराहार व्रत है यानी कि व्रत के पारण से पहले पानी की एक बूंद भी ग्रहण करना वर्जित है और कुछ खाना भी वर्जित है। व्रत के दिन सुबह-सवेरे स्‍नान करने के बाद उमामहेश्वरसायुज्य सिद्धये हरितालिका व्रतमहं करिष्ये मंत्र का उच्‍चारण करते हुए व्रत का संकल्‍प लिया जाता है-

इस व्रत को सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्‍याएं रखती हैं। लेकिन एक बार व्रत रखने के बाद जीवन भर इस व्रत को रखना पड़ता है।

अगर महिला ज्‍यादा बीमार है तो उसके बदले घर की अन्‍य महिला या फिर पति भी इस व्रत को रख सकता है।

व्रत करने वाली महिला को किसी पर भी गुस्‍सा नहीं करना चाहिए. यही वजह है कि इस दिन महिलाएं मेहंदी लगाती हैं।

व्रत अगले दिन सूर्योदय के बाद माता पार्वती को सिंदूर चढ़ाने के बाद ही तोड़ा जाता है।

इस त्यौहार में केवल फूलों की नहीं वरन एक पूरी शाखा की आवश्यकता होती है, जिसमे फल फूल बीज सभी होते हैं।

हरतालिका तीज व्रत सामग्री

गीली काली मिट्टी या बालू रेत,धतूरे का फल एवं फूल, अकांव का फूल, तुलसी, मंजरी, बेलपत्र, शमी पत्र, केले का पत्ता, जनैऊ, कलेवा/लच्छा, वस्त्र, श्रीफल, कलश, अबीर, चंदन, घी-तेल, सभी प्रकार के फल एवं फूल पत्ते, कपूर, फुलहरा, कुमकुम, दीपक और विशेष प्रकार की पत्तियां, लकड़ी का पाटा, पूजा के लिए नारियल, लाल या पीले रंग का कपड़ा, पानी से भरा कलश, मेंहदी, काजल, माता के लिए चुनरी, सुहाग का सामान, सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी और पंचामृत।

कुछ जंगली पौधे जिनके बारे में जिनके सामान्य नाम से इन्हें पहचान पाना मुश्किल होता है, उनके वानस्पतिक नाम भी यहाँ लिख रहा हूँ, ताकि वनस्पति शास्त्र के विद्यार्थी और आमजन जानकारी ले सकें।

1. बेलपत्र (Aegle_marmelos)

2. धतूरा (Datura_metal)

3. महुआ (Madhuca_indica)

4. भौरमाल (Rotheca_serrata / Clerodendrum_serratum)

5.कलिहारी (Gloriosa_superba)

6. करियाली (Clerodendrum_indicum)

7. गुलतर्रा (Caesalpinea_pulcherima)

8. कांस (Saccharum_spontanum)

9. मोया (Pennisetum_pilosum)

10. अकोना (Calotropis_procera)

11. कुशा- (Desmostachya_bipinnata)पूजन चटाई के रूप में

12. दूव: (Cynodon_dactylon)

13. नारियल (Cocas_nucifera)

14. केला (Musa_paradiciaca)

15. आम्र पत्र (Mangifera_indica) कलश के लिए।

16. अन्य फल- सेब, अनार आदि

17. चना (Cicer_arietinum) (बेसन से बने हुए पकवान के रूप में- सेव, ठेठरा, पापड़ी)

अन्य - गाय के दूध से बने मिष्ठान, खास तौर पर गूझा और खुरमा...

फोटो: विकास शर्मा

हरितालिका तीज और प्रकृति संरक्षण

सबसे महत्वपूर्ण बात जो भारतीय संस्कृति और तीज त्योहारो को खास बनाते हैं, उसे लेकर अपना व्यक्तिगत अनुभव आप सभी से शेयर कर रहा हूँ, हालाकि इन तीज त्यौहारों का वर्तमान स्वरूप अब वो नहीं रहा जैसा पहले हुआ करता था। अब ये संरक्षण कम विनाश की दिशा में बढ़ते दिख रहे हैं। किंतु में भारत की समृद्ध शाली परंपरा की ओर से अपना पक्ष रख रहा हूँ-

आइये जानते हैं, कैसे यह त्यौहार बहुमूल्य जड़ी बूटियों और पौधों के संरक्षण में अपना योगदान देते थे, जबकि देखने में लगता है, कि इनका दोहन हो रहा है, मेरे एक मित्र ने पूछा भी कि, तुम्हे इतने महत्वपूर्ण पौधों की थोक में कटाई पर दुःख नहीं होता, तो मेने उसे वही जबाब दिया जो मेरी माँ ने मुझे एक सवाल के रूप में दिया-

सवाल था, कि पूजन के बाद हम इन सभी का क्या करते हैं, मैंने कहा नदी/ नालों में विसर्जित कर देते हैं। तब माँ ने कहा और लाते कहाँ से है, मैंने कहा कि नदियों और नालों के किनारे से......। मैं सन्न सा रह गया था, इतनी गूढ़ बात का इतना साधारण जबाब।।।

सब कुछ स्पष्ट हो गया था, जब हम इन पौधों को पूजन के बाद नदियो में विसर्जित कर देते हैं तो कुछ तो नदी/ नाले किनारे की गीली मिट्टी में कलम की तरह लग जाते हैं, और कुछ के बीज बहते हुए दूर दूर तक फैल जाते है। इसी कारण ये सभी वनस्पतियां भी अक्सर नदी नाले के किनारे ही मिलती हैं, और वहीँ फलती फूलती हैं।

इस त्यौहार में केवल फूलों की नहीं वरन एक पूरी शाखा की आवश्यकता होती है, जिसमे फल फूल बीज सभी होते हैं। और कमाल की बात तो यह है, कि जिस पेड़ से शाखा तोड़ी जाती है, उसमें कई नयी शाखाएं आ जाती हैं, और पहले से ज्यादा फल और फूल लगते हैं। याने की उनका दोहन नहीं बल्कि प्रसार हो रहा है। अगर इसे मनाने वाले इन त्यौहारों के वास्तविक तरीको और उद्देश्यों को समझ जायें तो कितनी अच्छी बात होगी। धन्य है, भारतीय संस्कृति

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