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शादी के समय महिलाओं की उम्र घरेलू हिंसा को कैसे प्रभावित करती है ?

दुनिया भर में तीन में से एक महिला अपने जीवनकाल में घरेलू हिंसा से प्रभावित होती है। महिलाओं की शादी में एक वर्ष की देरी करने से कम गंभीर शारीरिक हिंसा की संभावना 7 प्रतिशत अंकों तक और गंभीर शारीरिक हिंसा 4 प्रतिशत अंकों तक कम हो जाती है।

शादी के समय महिलाओं की उम्र घरेलू हिंसा को कैसे प्रभावित करती है ?

घरेलू हिंसा दुनिया भर में तीन में से एक महिला को उनके जीवनकाल में प्रभावित करती है। महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा को कम करने के लिए अगर महिलाओं की शादी की उम्र में देरी होती है तो उनके साथ होने वाली हिंसा को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

भारत के नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए, इस आलेख में लेखक पुनर्जित और गौरव यह पाते हैं कि महिलाओं की शादी में एक वर्ष की देरी करने से कम गंभीर शारीरिक हिंसा की संभावना 7 प्रतिशत अंकों तक कम हो जाती है और गंभीर शारीरिक हिंसा 4 प्रतिशत अंकों तक।

जो महिलाएं घरेलू हिंसा का सामना करती हैं उन्हें चोट, भावनात्मक तनाव, आत्महत्या के विचार, गंभीर बीमारी के शारीरिक लक्षण, यौन संचारित रोगों और अनपेक्षित गर्भधारण सहित अन्य गंभीर प्रतिकूल स्वास्थ्य उत्पीड़नाओं का सामना भी करना पड़ता है। इन्हें स्वास्थ्य के साथ-साथ भारी आर्थिक खर्च भी उठाने पड़ते हैं।


घरेलू हिंसा से पीड़ित को हो रही पीड़ा, उनकी चिकित्सा का बिल, उत्पादकता खोना, न्यायिक व्यय तथा विकृत अपराधी से खोई हुई उत्पादकता के कारण अर्थव्यवस्था गंभीर रूप से प्रभावित होती है। हमारे शोध (धमीजा और रॉय चौधरी,2018) में हम घरेलू हिंसा से ग्रस्त महिलाओं की शादी के समय की उनकी उम्र का प्रभाव और अधिक विशेष रूप से अपने जीवनसाथी के द्वारा हिंसा पर पहला आकस्मिक कारण संबंधी विश्लेषण प्रदान करते हैं। हमारा यह अध्ययन भारत में उपलब्ध नवीन राष्ट्रीय प्रतिनिधि डेटा का उपयोग करता है, जिसमे 2014 की बीबीसी रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर पांच मिनट में घरेलू हिंसा की एक घटना दर्ज की जाती है (जो निश्चित रूप से वास्तव में होने वाली घटनाओं का केवल एक छोटा अंश है)।

वैचारिक रूपरेखा

सैद्धांतिक रूप से, घरेलू हिंसा पर महिलाओं की उम्र का प्रभाव नकारात्मक या सकारात्मक, दोनों रूपों में हो सकता है। दूसरी ओर, जो महिलाएं जल्दी शादी करती हैं, वे घरेलू हिंसा के प्रति असंवेदनशील, भोली और कम प्रतिरोधक होती हैं। इसलिए वे पीड़ित होने के लिए 'सुरक्षित' रहती हैं। उनके कम शिक्षित होने की संभावना भी अधिक रहती है क्योंकि कम उम्र में विवाह अक्सर पारिवारिक जिम्मेदारियों (फील्ड एवं एंब्रस 2008) के कारण महिलाओं के लिए औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने को बाधित करते हैं।

यह शादी के पहले उनके विकल्पों और उनके निपटान में आर्थिक और सामाजिक संसाधनों को सीमित करता है तथा शादी के बाद उनके सशक्तिकरण को प्रभावित करता है (किसान और टाइफेनथेलार 1996, स्टीवन्सन और वूलफर्स 2006, आइज़ेर 2010, हिदरबो और फर्नाल्ड 2013, एरटेन और केसकीन 2018)। ये सभी कारक विवाह और घरेलू हिंसा में महिलाओं की उम्र के बीच नकारात्मक संबंध को उजागर करेंगे। दूसरी ओर, जो महिलाएं देर से शादी करती हैं उन्हें अपने जीवनसाथी के घर में अपनी प्राथमिकताओं पर ध्यान देने के लिए बेहतर रखा जा सकता है, वे घरेलू हिंसा के लिए अधिक प्रतिरोधक हो सकती हैं, उनकी और अधिक सौदेबाजी की शक्ति हो सकती है, तथा उन्हें अपने जीवनसाथी (फील्ड एवं अन्य) से एक मजबूत संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है (फील्ड एवं अन्य2016)।

डेटा और अनुभव जन्य कार्यनीति

हम भारत के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस 2015-16) डेटा का उपयोग करते हैं। इस सर्वेक्षण में घरेलू हिंसा, लिंग भूमिका, स्वास्थ्य और विवाह बाजार संकेतक की व्यापकता पर विस्तृत जानकारी शामिल है।

हमारे पास चार प्रकार के घरेलू हिंसा के आंकड़े हैं— कम गंभीर शारीरिक हिंसा, गंभीर शारीरिक हिंसा, यौन हिंसा और भावनात्मक हिंसा। कम गंभीर शारीरिक हिंसा को धक्का देने, हिलाने, किसी चीज को फेंकने, हाथ को मोड़ने, बालों को खींचने, थप्पड़ मारने, साथी को मुट्ठी से मुक्का मारने या कुछ और चीजों के रूप में मापा जाता है।

गंभीर शारीरिक हिंसा को किसी भी तरह के हथियार से मारना, पीटना, घोंटना, जलाना, धमकाना या हमला करने जैसे कामों से मापा जाता है। यौन हिंसा को जबरन यौन क्रियाओं द्वारा मापा जाता है, मजबूर यौन संबंध इस डर से उत्पन्न होते हैं कि साथी अन्यथा क्या करेगा, और यौन कृत्यों के जरिए अपमानित करेगा। अंत में, भावनात्मक हिंसा में ऐसी गतिविधियाँ शामिल होती हैं जिनके कारण महिलाओं को तिरस्कार का सामना करना पड़ता है, अपमान होता है, अपने जीवनसाथी से महिला को या उसके करीबी लोगों को चोट पहुँचाने की धमकियों जैसे खतरों का सामना करना पड़ता है।

महिलाओं की अनदेखी विशेषताओं को उनकी शादी के समय की उम्र और घरेलू हिंसा दोनों को साथ जोड़ा जा सकता है। विशेष रूप से, उच्च क्षमता वाली महिलाएं देर से शादी कर सकती हैं जिसके कारण उनके घरेलू हिंसा से प्रभावित होने की संभावना कम हो सकती है। यह उनकी क्षमता और श्रम बाजार की संभावनाओं के बीच सकारात्मक संबंध के कारण हो सकता है। ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि उच्च क्षमता वाली महिलाएं अपनी कमाने की क्षमता साबित होने के बाद ही अपेक्षाकृत देर से परिवारों में शादी करने का विकल्प चुन सकती हैं और ये परिवार औसत परिवारों की तुलना में (शायद घरेलू हिंसा की व्यापकता के संदर्भ में) व्यवस्थित रूप से अलग हो सकते हैं।

इस समस्या को हल करने के लिए हम फील्ड और अम्ब्रस (2008) द्वारा प्रस्तावित अनुभव-जन्य कार्यनीति को लागू करते हैं, जो शादी के समय की महिलाओं की उम्र को उनके रजोदर्शन की उम्र के साथ जोड़कर देखते हैं। यह सोच समाजशास्त्रियों और मानवविज्ञानी द्वारा किए गए अवलोकन से प्रेरित है। माता-पिता अपनी बेटियों की शादी करने के लिए बेहद उत्सुक तब हो जाते हैं जब उनका रजोदर्शन आरंभ होता है, इसे वे किसी भी अवांछित गर्भधारण को रोकने के लिए आंशिक रूप से कारण मानते हैं। इस प्रकार, रजोदर्शन की उम्र में भिन्नता उस उम्र में एक अर्ध-यादृच्छिक अंतर उत्पन्न करती है जिस पर एक लड़की शादी के बाजार में प्रवेश करती है।

जाँच-परिणाम

इस शोध के परिणाम शारीरिक हिंसा के कम-गंभीर और गंभीर रूपों पर शादी में महिलाओं की उम्र के एक मजबूत नकारात्मक प्रभाव का संकेत देते हैं। विशेष रूप से, हम पाते हैं कि महिलाओं के विवाह में एक वर्ष की देरी से कम गंभीर शारीरिक हिंसा की संभावना में 7 प्रतिशत अंक की कमी आती है और गंभीर शारीरिक हिंसा में 4 प्रतिशत अंक तक की कमी आती है। हालांकि, शादी के समय महिलाओं की उम्र, यौन हिंसा और भावनात्मक हिंसा पर प्रभाव सांख्यिकीय रूप से पर्याप्त नहीं हैं। अगर कोई हमारे नमूने से पूरे देश में इन परिणामों को हटाने के लिए तैयार है, तो हमारे निष्कर्षों के निहितार्थ बेहद चौकाने वाले हैं।

यह देखते हुए कि भारत की 58.6 करोड़ महिलाओं (2011 की जनगणना) में से 50% विवाहित हैं,और उनमें से 25% तथा 6% विवाहित महिलाएं घरेलू हिंसा से क्रमशः कम गंभीर और गंभीर रूपों के चपेट में हैं। हमारे निष्कर्ष का मतलब यह है कि शादी के समय महिलाओं की उम्र में एक वर्ष की देरी के कारण कम गंभीर शारीरिक हिंसा से प्रताड़ित महिलाओं की संख्या 7.3 करोड़ से घटकर 5.3 करोड़ हो जाएगी और गंभीर शारीरिक हिंसा से प्रताड़ित महिलाओं की संख्या 1.8 करोड़ से घटकर 60 लाख तक हो जाएगी। इसलिए हमारे निष्कर्ष मौजूदा सशर्त नकद हस्तांतरण कार्यक्रमों तथा अन्य सामाजिक नीतियों की प्रासंगिकता की पुष्टि करते हैं, जो भारत में महिलाओं के विवाह में देरी की मांग करते हैं (उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल में 'कन्याश्री प्रकल्प' कार्यक्रम, हरियाणा में 'अपनों बेटी आप धन' कार्यक्रम, आदि) और घरेलू हिंसा की व्यापकता को कम करने के लिए नए डिजाइन तैयार करने के लिए एक तर्क प्रदान करते हैं।


टिप्पणियाँ:

1. अकेले वाशिंगटन पोस्ट (22 फरवरी 2018) में अमेरिका में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, यह लागत लगभग सालाना46,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर है।

2. देर से शादी, अपने आप में, भारत में विशेष रूप से महिलाओं के लिए बहुत सारी वर्जनाओं को ढोती है। जो महिलाएं युवावस्था में विवाह नहीं करती हैं उन्हें दोषपूर्ण माना जाता है। देर से शादी करने पर अगर कोई महिला शादी के बाद तलाक भी मांगती है तो यह संभावना है कि ऐसी महिला के लिए 'सही उम्र' में शादी (या जल्दी शादी) करने वाली महिलाओं की तुलना में सामाजिक कलंक अधिक होगा क्योंकि महिला पहले से ही देर से शादी करने के लिए 'गलती' कर चुकी है।

3. ये दोनों प्रभाव 5% के स्तर पर महत्वपूर्ण हैं।

4. घरेलू हिंसा के कम गंभीर और गंभीर रूपों की व्यापकता का अनुमान हमारे विश्लेषण नमूने पर आधारित है।

लेखक परिचय: पुनर्जित रॉय चौधरी नॉटिंघम विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर हैं। गौरव धमीजा भारतीय सांख्यिकी संस्थान के दिल्ली केंद्र में एक विजिटिंग असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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