अटरली बटरली गर्ल के हल्के फुल्के विज्ञापन जो हमेशा छाए रहे 

अटरली बटरली गर्ल के हल्के फुल्के विज्ञापन जो हमेशा  छाए रहे अमूल 

गोल मटोल,पोल्का डॉट्स की फ्रॉक पहनी उस छोटी सी अमूल गुड़िया से हर कोई परिचित होगा। वह गुड़िया सिर्फ अमूल-बटर की मैस्कट वाली गुड़िया नहीं है । यह अमूल गुड़िया बड़े-बड़े होर्डिंग्स और साइन-बोर्ड्स में इतनी बार चस्पा हुई है कि वह शहरी रोज़मर्रा जीवन की कथाओं में रच-बस सी गई है । सामयिक घटनाओं पर कटाक्ष करते, चुटीले वाक्यांशों के साथ, होर्डिंग्स में डटी यह अमूल-गर्ल तमाम समस्याओं के खिलाफ लड़ाई में खड़ी दिखाई देती रही है।

ये भी पढ़ें-दूध से ज्यादा सफेद था दूध क्रांति के जनक का जीवन, ये 2 घटनाएं उनका मुरीद बना देंगी

जब भारतीय सेना ने पाकिस्तान की दहलीज पर सर्जिकल स्ट्राइक कर संदेश दिया।

अमूल का “अटरली बटरली कैंपेन” सबसे ज्यादा चलने वाला विज्ञापन था और इसको गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी शामिल किया गया था क्योंकि कम्पनी का मानना था कि," हम बहुत सीधी, आसान, एक नई सोच के साथ और अपने ग्राहकों को एक सा उत्पाद प्रदान करने वाली कम्पनी हैं।"

सबसे पहला ऐड यहां देखें-

अब तक किन मुद्दों पर ऐड निकला है

अमूल पीओके में भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर इंदिरा गांधी सरकार की नसबंदी योजना तक, हर मसले पर क्रिएटिव ऐड के जरिए अपना नजरिया पेश कर चुका है। अमूल 1960 के दशक में हर महीने एक एक ऐड किया करता था, 70 और 80 के दशकों में ये ऐड महीने में दो हो गए। फिर 90 के दशक में तो अमूल हर सप्ताह विज्ञापन देने लगा। अभी हर सप्ताह कंपनी के 5-5 ऐड आते हैं।खास बात यह है कि इन ऐडस में अब भी हाथों से हुई पेंटिंग ही दिखाई जाती है। में अब भी हाथों से हुई पेंटिंग ही दिखाई जाती है।

अमूल का यह ऐड 1976 में आया था जब इंदिरा गांधी के शासनकाल में नसबंदी को अनिवार्य घोषित कर दिया गया था।

कौन हैं वो तीन लोग जिन्होंने अमूल गर्ल को बनाया

अमूल के विज्ञापनों को तैयार करने के लिए तीन लोगों की टीम बनी हुई है, जो हर सप्ताह 5 कार्टून तैयार करती है । इन विज्ञापनों की कैम्पेन डाकुन्हा कम्युनिकेशंस करती है । इस कंपनी के क्रिएटिव हेड हैं-राहुल डाकुन्हा, कॉपी राइटर है-मनीष झावेरी और करीब ढाई दर्शकों से अमूल गर्ल को बनाने वाले कार्टूनिस्ट जयंत राणे हैं । डाकुन्हा के विज्ञापन काफी हद तक आक्रामक होते हैं ।

जब सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमा हॉल में फिल्म से पहले राष्ट्रीय गान को अनिवार्य कर दिया।

अख़बारों को खंगालने के बाद आता है विज्ञापन का आइडिया

सुबह वह अख़बारों को खंगालते हैं और उनमें छोटे-बड़े घोटाले, मजदूरों का आंदोलन, खेलों का विवाद,भ्रष्टाचार प्रदर्शन, इमारतों का ढह जाना, कुछ विवादित होना या फिर ऐसा कुछ भी खोजते हैं जिनपर देश भर में चर्चा हो रही होती है । पटकथा और इसका मुद्दा तैयार होने के बाद कार्टूनिस्ट जयंत राणे को इस बारे में बताया जाता है । राणे ज्यादा से ज्यादा आधे घंटे में अमूल गर्ल के साथ उस मुद्दे से जुड़ी मुख्य तस्वीर दे देते हैं । इसके बाद डाकुन्हा इसमें हो सकने वाले जरुरी सुधारों और बेहतर किये जाने की संभावना होने पर कुछ जानकारी देते हैं और फिर ऐड फाइनल हो जाता है।

जब 8 नवम्बर को 500 और 1000 के नोट अमान्य करने की घोषणा के गयी।

1966 में बनी थी अटरली-बटरली अमूल गर्ल

1966 में अमूल के विज्ञापन की शुरुआत हुई थी और इसकी कमान एडवरटाइजिंग सेल्स एंड प्रमोशन के मैनेजिंग डायरेक्टर सिल्वेस्टर डाकुन्हा को दी गई थी । इन विज्ञापनों की शुरुआत थोड़ी बोरिंग थी लेकिन धीरे-धीरे इसने रोचक रफ़्तार पकड़ी क्योंकि डाकुन्हा ने ठान लिया था कि वो अमूल के विज्ञापनों की बोरिंग इमेज बदल कर रख देंगे और उन्होंने वैसा ही किया । जब अमूल बटर की शुरुआत हुई थी तब पॉल्सन नाम की कंपनी भी टक्कर में थी क्योंकि वह भी बटर का उत्पाद करती थी और अच्छा ख़ासा बिजेनस कर रही थी ।पॉल्सन अपने विज्ञापन में एक बटर गर्ल का इस्तेमाल करता था । इसी गर्ल को टक्कर देने के लिए डाकुन्हा ने अपने एजेंसी के आर्ट डायरेक्टर यूस्टेस पॉल फर्नांडिज के साथ बैठकर एक ऐसी गर्ल की कल्पना करी जो तुरंत लोगों के दिल और दिमाग में समा जाए ।

अमूल ने बड़े क्रिएटिव तरीके से विराट अनुष्का को बधाई दी है।

वी कुरियन की सोच

अपनी एक मीटिंग में अमूल के चेयरमैन वी. कुरियन ने कहा – “सहयोग से काम करना और सबके साथ काम करना” उनकी सबसे पहली सोच है। यह उन इंसानों का विश्वास है कि जब लोग साथ में काम करते हैं तो वे अपने खुद के बारे में कम सोचते हैं और अपनी टीम के बारे में ज़्यादा सोचते हैं। इसी सोच ने यह चमत्कार और जादू कर दिखाया है कि अमूल कम्पनी आर्थिक और व्यापारिक रूप से एक मजबूत कम्पनी बन गयी।

दिल्ली में फैले स्मॉग को लेकर भी अमूल ने ट्वीट किया।

सफलता की कहानी

अमूल की सफलता उसकी सोच और उसकी मार्केटिंग पर रही जिसमें उसने ऐसे उत्पाद बनाए जहाँ भारतीय या गाँव के लोगों को एहसास था कि अगर हम अपने घरों में भी दूध मक्खन का उत्पादन करेंगे तो हमको इससे सस्ता नहीं पड़ने वाला। लोगों को उन पर एक विश्वास था कि अगर यह हमारे जैसे किसानों के घरों से ही निकल कर बाजार में उपलब्ध हो रहा है तो यह गलत चीज़ नहीं हो सकती। आज पूरे देश में अमूल के 50 विक्रय कार्यालय हैं, 3000 थोक डीलर्स और 5,000 से भी ज्यादा खुदरा विक्रेता हैं।

शशि कपूर को इस तरह से याद किया।

ये भी पढ़ें-राष्ट्रीय दुग्ध दिवस : पशु प्रताड़ना पर जुर्माना 50 रुपए से बढ़ाकर 20,000 रुपए किया जाए

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए यहां, ट्विटर हैंडल को फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें।

Share it
Top