तमिलनाडु के इस जिले में दो साल से नहीं हुई बारिश, 60 साल की महिलाएं कर रहीं मजदूरी

तमिलनाडु के इस जिले में दो साल से नहीं हुई बारिश, 60 साल की महिलाएं कर रहीं मजदूरीमजदूरी करने जातीं महिलाएं।

नई दिल्ली। तमिलनाडू में पिछले चार महीने में करीब 400 से ज्यादा किसान सूखे और लोन नहीं चुका पाने के कारण आत्महत्या कर चुके हैं। द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार केवल एक माह में ही 106 किसानों ने आत्महत्या की है। तमिलनाडु के कई जिले अक्सर सूखे की चपेट में रहते हैं। इन्हीं किसानों ने नई दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर महीनों प्रदर्शन किया था।

तमिलनाडु में सूखे का साइड इफेक्ट का अंदाजा आप तंजावुर के इन बुजुर्गों को देखकर लगा सकते हैं। तंजावुर जिले में लगभग 100 महिलाओं का समूह हाथ में फरसा और कुदाल लिए आपको दिख जाएंगे। आप गलत समझ रहे हैं। ये महिलाएं खेती नहीं, बल्कि मजदूरी करने जा रही हैं। इन सभी महिलाओं की उम्र 60 के ऊपर हैं।

कीलाथिरुपंठुरुथी ब्लॉक के गाँव थिरुवैयारु में मई की मध्य दोपहरी में भी ये महिलाएं आपको काम करने हुए दिख जाएंगी। तंजावुर जिला मुख्यालय से लगभग 40 किमी दूर है। यहां भारत के विकास की एक अलग तस्वीर दिखती है। सभी बुजुर्ग कमजोर, थके हुए से ये लोग मनरेगा के तहत मजदूरी करने जा रहे थे। ये सभी आर्थिक रूप से पिछड़े, कुछ दलित भी है। 42 वर्षीय जे अनंत जो ग्राम पंचायत के सदस्य भी हैं, ने बताया कि इस समूह में करीब 100 महिलाएं हैं। पिपुल्स आर्चिव और रूरल इंडिया के जर्नलिस्ट को जब इन लोगों ने देखा तो उन्होंने फोटो नहीं लेने दिया। उन्हें लगा ये सरकारी अधिकारी है। ये बुजुर्ग बस अपने पैसे चाहते थे।

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तमिलनाडु में सूखे का एक दृश्य।

राज्य सरकार ने पिछले 2-3 महीने की मजदूरी इन्हें नहीं दी है। कुछ लोगों ने बताया कि बकाये की रकम 10,000 से 15,000 रुपए है। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने राज्यों को मनरेगा कोष जारी करने में देरी की। दिसंबर 2016 में मुख्यमंत्री जयललिता की मृत्यु के बाद तमिलनाडु की राजनीतिक अस्थिरता के कारण भी इनकी मजदूरी नहीं मिल रही।

कावेरी नदी के डेल्टा क्षेत्र में आने वाले 100 गाँवों में से एक गाँव कीलाथिरुपंठुरुथी भी है, जहां का क्षेत्र सूखे की वजह से तबाह हो चुका है। कावेरी डेल्टा में जुलाई-सितंबर के बीच दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून आता है। जिसका इस वर्ष भी नामोनिशान नही है। पिछले साल भी यहां मानसून के नाम पर थोड़े फुहारे गिरे थे जिस कारण उत्पादन न के बराबर हुआ और किसानों की आय तेजी से घटने लगी।

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अनंत ने बताया कि गांव के ज्यादातर युवा पुरुषों और महिलाएं शहर जैसे तंजावुर शहर, कोयम्बटूर, थिरुपुर या चेन्नई में उच्च मजदूरी की तलाश में चले गए हैं। जब तक और बारिश नहीं होगी वे वापस नहीं आएंगे। इस वर्ष (2016-17) में कृषि से कोई आय नहीं हुई है, बुजुर्ग जो रह गए हैं, वे मजदूरी कर जीवन-यापन कर रहे हैं। अनंत आगे कहते हैं कि हम सड़कों को चौड़ा कर उनकी सफाई कर रहे हैं, स्थानीय त्योहार आने वाला है। बूढ़ी महिलाओं के बारे में उन्होंने बताया कि सूखे के कारण सभी को मजदूरी करनी पड़ रही है।

मानव खोपड़ी के साथ तमिलनाडु के किसान दिल्ली में प्रदर्शन करते हुए।

महिलाओं ने बताया कि पिछले दो वर्ष से कृषि का बुरा हाल है। नहर, नदिया सूख गए हैं, वोरवेल्ड में पानी नहीं है। पूरी कृषि प्रणाली ढह गई है। उन्हीं में से एक महिला ने कहा, हमें केवल 100 दिनों का काम मिला है। तमिलनाडु सरकार एक दिन का 150 रुपए देगी। लेकिन कई दिन काम करने के बाद भी हमारे हाथों में कैश नहीं है। इन्हीं महिलाओं में से एक 62 वर्षीय मनिक्कावली ने बताया कि मेरे बच्चे कमाने के लिए बाहर चले गए हैं। हमारे साथ कुछ युवा महिलाएं अपने दुधमुंहे बच्चों के साथ मजदूरी कर रही हैं। बच्चे कहते हैं जब बारिश होगी तब आउंगा। बारिश के बाद खेतों में कुछ करने को होगा।

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अनंत ने कहा कि वर्कसाइट पर प्रत्येक सदस्य को एक दिन का 120 से 150 रुपए दिया जाता है, लेकिन भुगतान में बहुत देरी हो रही है। हमने इसकी शिकायत की है। लोगों को दो महीने की मजदूरी नहीं मिली है। कावेरी नदी के किनारे डेल्टा क्षेत्र के कई गाँवों में आपको सूखे से लड़ते बुजुर्ग और युवा दिख जाएंगे। इनके पास मनरेगा के अलावा कोई विकल्प नहीं है। एक बुजुर्ग और भूमिहीन परिवार की महिला पुष्पवल्ली ने कहा "यह कमाई हमारे लिए पर्याप्त नहीं है। लेकिन जब हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है तो यही सही है। उन्होंने कहा कि जमीन के मालिकों को इस संकट में जूझना पड़ रहा है तो हम तो छोटे किसान हैं।

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