अमृता-प्रणय की तरह हज़ारों प्रेमी जोड़े जाति-धर्म की बदौलत खुशियों के लिए लड़ रहे हैं

अमृता ने 30 जनवरी 2019 को बेटे को जन्म दिया, उनके पति प्रणय को परिवार वालों ने मार दिया था क्योंकि उसकी जाति अलग थी। ऐसे हज़ारों जोड़े हैं जो सालों से अपने परिवार से लड़ रहे हैं और कई ऑनर किलिंग के नाम पर मारे जा चुके हैं। 2014 से 16 के बीच 291 लोगों की दूसरी जाति या धर्म में शादी करने के कारण हत्या हुई।

अमृता-प्रणय की तरह हज़ारों प्रेमी जोड़े जाति-धर्म की बदौलत खुशियों के लिए लड़ रहे हैंदूसरी जाति या धर्म में शादी करना हमारे समाज में मुश्किल ही नज़र आता है

लखनऊ। निहालुद्दीन उस्मानी और अभिलाषा की शादी हुई तो उनका ट्रांसफर अलग-अलग स्थानों पर कर दिया गया, ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों अलग धर्म के थे। वे उस समय भारत सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में कार्यरत थे।

लड़का-लड़की जब दूसरे धर्म या जाति में शादी करते हैं तो परिवार और समाज उनके सामने दीवार बन कर खड़े हो जाते हैं। इनकी नाराज़गी प्रेमी जोड़ों के लिए अथाह मुश्किलें पैदा करती हैं। कई बार तो ये नाराज़गी परिवार की शान और इज़्जत का रूप ले प्रेमी जोड़ो की हत्या कर देती है। तेलंगाना के प्रणय की हत्या का कारण अमृता से शादी करना बना। दोनों अलग जाति के हैं, उन्होंने अपनी मर्ज़ी से शादी की लेकिन शादी के बाद अमृता के घरवालों ने प्रणय को मार डाला।

अमृता ने हिम्मत नहीं हारी और अपने बच्चे के लिए लड़ीं, 30 जनवरी 2019 को उन्होंने बेटे को जन्म दिया। बेटे के साथ उनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। अमृता और प्रणय की तरह हज़ारों लोग जाति और धर्म की बदौलत अपनी खुशियों से मोहताज हैं। अपनी मर्ज़ी से किसी और जाति या धर्म में शादी करने के कारण लोगों को किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है इस बारे में गाँव कनेक्शन ने कुछ जोड़ों, संबंधित सरकारी अधिकारियों और स्वयं सेवी संस्थाओं से बात की।

अमृता और उनके बेटे की ये तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल रही। साभार- सोशल मीडिया

पत्नी और उनके अलग ट्रांसफर की वजह से निहाल को 3 साल की छुट्टी लेनी पड़ी, रिटायर्मेंट के 4 साल पहले स्वैच्छिक रिटायर्मेंट लेना पड़ा। वो कहते हैं-

"लोगों को लगता है कि लड़की अगर दूसरे समाज में शादी कर रही है तो वो उनकी हार है। मेरे परिवार पर रिश्तेदारों ने दबाव डाला कि लड़की को मुस्लिम बना दो लेकिन मैंने कहा कि जब शादी के समय कोई पाबंदी नहीं थी तो अब भी कोई पाबंदी नहीं होगी।"

दोनों की शादी को अब 22 साल हो गए हैं। उनकी एक बेटी है। रिटायर्मेंट के बाद निहाल, 'निहाल उस्मानी' नाम से एक यूट्यूब चैनल चलाते हैं, इस पर वो लोगों को अलग-अलग भाषाएं सिखाते हैं- हिन्दी, अरबी, फारसी, फ्रैंच आदि।

"बाहर की समस्याएं तो इन्सान झेल लेता है, अपनों से लड़ना, उन्हें छोड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है। परिवार को लगता है कि आप उन्हें धोखा दे रहे हैं, वो आपसे नाराज़ हो जाते हैं। कोई लड़ाई-झगड़ा तो नहीं हुआ, लेकिन परिवार की नाराज़गी से ऊपर उठना बहुत मुश्किल हो जाता है। आप मानसिक तौर पर इतना परेशान हो जाते हैं कि अपराधबोध में चले जाते हैं,"- ये कहना है रश्मि (बदला हुआ नाम) का, जिन्होंने दूसरे धर्म के रज़ा (बदला हुआ नाम) से शादी की है। दोनों की शादी को एक साल हो गया है और फिलहाल वे उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रहते हैं। रश्मि गाज़ियाबाद से हैं और रज़ा लखनऊ के ही हैं।

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2007 से लखनऊ में रह रहे अली ने कभी 90 रुपए दिहाड़ी पे मजदूरी की तो कभी ठेला और रिक्शा चलाया। चाय-पानी पिलाने के काम से लेकर एयर कंडीशनर (AC) सुधारने का काम भी किया लेकिन हार नहीं मानी। उनके 2 बीघा खेत में आग लगा दी गई थी, 15 दिन तक पुलिस उनके घर पर पहरा देती रही, हालत ये थे कि पुलिस न होती तो दंगा हो जाता। लखनऊ से जाकर 5 साल तक केस लड़ना पड़ा तब जाकर दोनों की शादी को मंजूरी मिली। अब दोनों की शादी को 12 साल हो गए हैं, 2 बेटियां हैं लेकिन अब भी वो गांव जाने से डरते हैं, अली कहते हैं, "अगर आज गांव चला जाऊं तो लोग ताना मार-मार के जीना बेहाल कर देंगे।"

12 साल पहले वो दोनों अपने गांव सानी बल्लीपुर से भाग कर मुंबई चले गए थे। अली की माता जी के समझाने बुझाने पर गांव लौटे तो सुनीता के परिवार ने अली के खिलाफ पुलिस में शिकायत कर दी थी। अली को महीने भर जेल काटनी पड़ी और सुनीता को नारी निकेतन नसीब हुआ। दोनों उस समय नाबालिग थे, जज के पूछने पर सुनीता ने कहा था, "'इनकी क्या औकात है भगाने की, हम खुद इनके साथ भागे हैं।"

सुनीता और अली जब कानूनी दांव पेंच से छूटे तो सुनीता को घरवाले जबरदस्ती दिल्ली ले गए। दोनों के प्यार को जुदा होना मंजूर नहीं था। अली दिल्ली पहुंचे और सुनीता को एक बार फिर भगा कर वापस गांव ले आए, इस बार कोर्ट ने उनकी शादी करा दी। सानी बल्लीपुर, उत्तर प्रदेश राज्य के गोंडा जिले में एक छोटा सा गाँव है।

अंतर्जातीय विवाह करने वाली जगीशा कहती हैं-

''मुझे जिस लड़के से प्‍यार था उसकी जाति मुझसे अलग थी। लड़के का नीची जाति से होना मेरे परिवार को गवारा न था इसलिए हमें भाग कर शादी करनी पड़ी। बहुत दिक्‍कतें आईं, धमकियां मिलीं, लेकिन हम एक-दूसरे के साथ रहना चाहते थे।''

जगीशा और प्रशांत दिल्ली में पत्रकार हैं और दोनों ने कुछ समय पहले शादी की है। जगीशा कहती हैं कि वो अभी शादी नहीं करने वाले थे लेकिन घरवालों के डर के कारण उन्हें शादी करनी पड़ी। वो कहती हैं, "जाति अलग होने से आपकी परम्पराएं अलग होती हैं, मान्यताएं अलग होती हैं, पर आप साथ रहकर एक-दूसरे की परम्पराओं, रीति-रिवाज़ों को सीख सकते हैं।" वो ये भी बताती हैं कि किसी भी शादी में मां का बहुत अहम रोल होता है। अगर मां बच्ची का साथ दे तो बहुत कुछ आसान हो सकता है पर मां अक्सर अपने पति या बच्चों के खिलाफ नहीं जा पातीं। मां को अपने बच्चों का साथ देना चाहिए।

रजनी (बदला हुआ नाम) और परवेज़ (बदला हुआ नाम) की शादी को 7 महीने हो गए हैं। परवेज़ के परिवार ने दोनों को अपना लिया है, इसके लिए रजनी को धर्म परिवर्तन करना पड़ा, उसे अपना घर भी छोड़ना पड़ा क्योंकि उसके परिवार वाले इस शादी के खिलाफ थे। शादी के पहले रजनी और परवेज़ आस-पास ही रहते थे, इस कारण परवेज़ को अपना घर तक बेचना पड़ा। रजनी कहती हैं, "मुझे कोई दिक्कत नहीं थी। मेरे लिए इन्सान कैसा है ये मायने रखता है न कि वो किस धर्म का है, सभी इन्सान अच्छे होते हैं।"

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दिल्ली में पत्रकार सुमित चौहान कहते हैं कि धर्म और जाति समाज की रूढ़िवादी सोच को बनाए रखने के लिए है। आप अपने धर्म को श्रेष्ठ मानते हैं इसलिए अपने ही धर्म में शादी करें, यही बात जाति के साथ है। सुमित हरियाणा से हैं, उन्होंने इस्लाम धर्म मानने वाली लड़की से शादी की है। वो बताते हैं कि उनके यहां कभी कोई मुसलमान नहीं रहा, पहली बार कॉलेज में आकर वो मुस्लिम लोगों से मिले।

"बचपन से लोग कहते थे कि ये लोग कट्टर होते हैं, नहाते धोते नहीं हैं, वो तो मज़हब के लिए कुछ भी कर सकते हैं, जब मैं उनसे मिला, घर आना जाना हुआ तो लगा कि ये तो हमारे जैसे ही लोग हैं। हम लोगों ने बात की, अपने संदेह खत्म किए कि धर्म को लेकर हमारे बीच में कभी कोई दिक्कत नहीं आएगी, तब हम लोग आगे बढ़े," - सुमित। वो बताते हैं कि लोगों के दिमाग में ये भी आता है कि क्या अपनी खुशी इतनी बड़ी है कि पूरा परिवार बर्बाद हो रहा है, जाने देते हैं, हम ही समझौता कर लेते हैं।

वो आगे कहते हैं,

"हमारा पालन पोषण ही इस तरह होता है, हमें बचपन से ही ये बताया जाता है कि ये (दूसरी जाति या धर्म में शादी करना) गलत है, आप ऐसा न करें। हमारे यहां लोग फिल्मों में तो नायक-नायिका को मिलते देखना चाहते हैं, उन्हें साथ देख खुश होते हैं लेकिन असल ज़िन्दगी में अगर आप अपना जीवनसाथी चुनना चाहते हैं तो वो उसे ठीक नहीं मानते तो पहला विचार तो इन्सान के मन में खुद पर उठता है कि मैं जो करने जा रहा हूं वो सही है या नहीं? दूसरी बात की हमारा समाज हमें हमेशा डरा के रखता है, वो तो आपने सुना ही होगा कि उन्होंने लव मैरिज की थी देखो अब अलग हो गए, लव मैरिजेज़ बहुत ज़्यादा नहीं चलतीं। लोगों के दिमाग में डर पैदा किया जाता है।"

सुमित 'धनक' नाम की स्वयं सेवी संस्था से जुड़े हैं। ये संस्था ऐसे लोगों की मदद करती है जो अपनी मर्ज़ी से शादी करना चाहते हैं और उन्हें किसी भी तरह की परेशानी सामने आती है। धनक के लिए काम करने वाले आसिफ बताते हैं, "सबसे बड़ी समस्या है परिवार का तैयार होना, परिवार वाले जबरन नौकरी छोड़ने को कहते हैं, जबरदस्ती कहीं और शादी करा देते हैं पर प्यार जो है वो एक महिला को एक मौका देता है कि वो बराबरी पर एक शुरूआत करे क्योंकि महिलाओं को बचपन से ही कम समझा जाता है। अधिकतर महिलाएं इस अपराधबोध में चली जाती हैं कि वो अपने परिवार को दुखी कर रही हैं। हम उनकी इस मानसिकता को बदलने की कोशिश करते हैं कि वो सही हैं, सभी को अपनी मर्ज़ी से जीवनसाथी चुनने का हक है।"

दूसरे धर्म या जाति में शादी करने के लिए इन्सान को सबसे पहली लड़ाई खुद से लड़नी पड़ती है। साभार- इंटरनेट/pixabay

आसिफ कहते हैं कि अगर लड़का-लड़की आर्थिक तौर पर स्वतंत्र हैं तो बहुत सी परेशानियां कम हो जाती हैं। आर्थिक रूप से परिवार पर आश्रित नहीं होने से आप अपने लिए लड़ने की हिम्मत कर पाते हैं। उत्तर प्रदेश में एक परियोजना कार्यरत है 'आशा ज्योति केन्द्र' नाम से, 8 मार्च 2016 से शुरू हुई ये परियोजना महिलाओं की मदद के लिए है। इस ही के मिर्ज़ापुर विभाग में कार्यरत पूजा मौर्य बताती हैं कि, "1 साल में लगभग 2-3 लड़कियां हमारे पास आई हैं। उनमें परिपक्वता तो होती नहीं है, शादी कर लेते हैं, फिर बाद में पति-पत्नी में ही नहीं बनती तो हमारे पास आते हैं।"

आशा ज्योति केन्द्र के वाराणसी विभाग में पदस्थ सोनल श्रीवास्तव इस बारे में कहती हैं-

"सबसे पहले तो परिवार की बड़ी समस्या रहती है, साथ ही समाज भी इन शादियों को नहीं मानता। हम लोग जो जोड़े हमारे पास आते हैं उनके परिवार के साथ काउंसलिंग करते हैं। उन्होंने अगर कानूनी तौर पर वैध शादी की है तो हम उनको सकारात्मक तरीके से बताते हैं और उनकी मदद करते हैं। अगर लड़के का कोई पुराना केस रहा है या वो ठीक नहीं है तो हम लड़की को समझाते हैं। हम लोग डॉक्टर्स और वकील से भी जोड़ों को बात करवाते हैं।"

सोनल आगे ये भी बताती हैं कि कई लड़कियां शादी से पहले आशा ज्योति केन्द्र में सलाह लेने आती हैं। वहां पर प्रोफेशनल साइकॉलजिस्ट भी उपलब्ध होते हैं जो लड़कियों की बात को समझ कर उन्हें सही सलाह देते हैं।

सपना और कामिल (बदले हुए नाम) उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं लेकिन एक-दूसरे से शादी करने के लिए उन्हें घर छोड़ना पड़ा। अब दोनों मुंबई में रहते हैं, अपनी पहचान ज़ाहिर नहीं करने के लिए वो लोग अपने बारे में बताना भी नहीं चाहते।

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कई जोड़ों को शादी के बाद घरवाले अपना लेते हैं, कुछ हैं जिन्हें घरवाले नहीं अपनाते और इज़्जत के नाम पर उनकी हत्या कर देते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2014 से 2016 के बीच अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक शादियों के कारण 291 हत्याएं हुईं। ये आंकड़े हमने data.gov.in से लिए हैं, ये एक सरकारी वेबसाइट है जो भारत सरकार की तरफ से सभी तरह के आंकड़े प्रस्तुत करती है। ये आंकड़े दो साल पहले तक के ही उपलब्ध होते हैं इसलिए खबर लिखने तक साल 2016 के आंकड़े ही मौजूद हैं। इन हत्याओं के अलावा 65 कल्पेबल होमिसाइड के केस भी इस सालों में हुए हैं। कल्पेबल होमिसाइड का अर्थ है गैर-इरादतन हत्या लेकिन ये सभी इस ही मसले से जुड़ी हुई हैं।

साल 2015 में अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाहों के कारण सबसे ज़्यादा हत्याएं हुईं। इस साल 192 लोगों ने अपनी जान खोई, इसके अलावा 59 गैर-इरादतन हत्या के केस भी सामने आए। इसमें सबसे अधिक 131 केस उत्तर प्रदेश के थे। ये पिछले साल यानी 2014 के मुकाबले बहुत ज़्यादा थे। इस साल दूसरी जाति या धर्म में शादी करने के कारण 28 हत्याएं हुई थीं तो साल 2016 में ये आंकड़ा 71 रहा और 6 लोग गैर-इरादतन हत्या में मारे गए। इनमें सबसे अधिक संख्या 18 मध्यप्रदेश में थी।

इन हत्याओं को हमारे समाज में ऑनर किलिंग कहा जाता है, ऑनर यानी सम्मान के लिए की जाने वाली हत्या। यही बात आशा ज्योति केन्द्र के गोरखपुर में काम करने वालीं तुहिना बताती हैं, "अंतर्राजातीय विवाह हमारे यहां बहुत बड़ी समस्या है, ऑनर किलिंग तक हो जाती है। कई बार हम लोगों पर भी हमला हो जाता है। मैं डेढ़-दो साल से काम कर रही हूं, इस दौरान लगभग 7 से 10 केस हमारे सामने आए हैं। हमने बच्चों की मदद की पर दिक्कत ये है कि गाँव से उठ कर लोग हमारे पास आ ही नहीं पाते, गाँव के लोग उन्हें वहीं डरा-धमका कर चुप करा देते हैं।"

मध्यप्रदेश में दमोह जिला है, यहां के फुटेराकलां गाँव में 16 जून 2018 को जो हुआ वो इन आंकड़ों को सही साबित करता है।

शबनम और राजीव (बदले हुए नाम) एक-दूसरे से प्यार करते थे, शादी करना चाहते थे लेकिन शबनम के भाई को इसका पता चला गया, उसने 15 जून की शाम राजीव के घर जाकर मार-पीट की। अगले दिन ईद थी, जब शबनम का भाई और उसके दोस्त नमाज़ अदा करके लौट रहे थे तो राजीव के कुछ दोस्तों ने उन पर हमला कर दिया, कहा गया कि ये बजरंग दल से जुड़े हुए थे; मामला इतना बढ़ गया कि बाज़ार बंद करा दिया गया, कई दुकानों में आग लगा दी। तीन दुकानें पूरी तरह जल गईं, 6 मोटर साइकल और 3 साइकलें जल कर खाक हो गईं, 20 दिन तक गाँव में 144 धारा लगी रही, यानी कि कर्फ्यू लगा रहा, एक जोड़े के प्यार ने दंगे का रूप ले लिया।

भारत का संविधान सभी नागरिकों को अपनी मर्ज़ी से शादी करने की इजाज़त देता है। आर्टिकल 21 के अनुसार भारतीय नागरिकों को 'शादी करने का हक' (Right to Marry) है। मानवाधिकारों के साथ सभी को अपनी मर्ज़ी से शादी करने का भी हक है लेकिन हमारा समाज इसकी इजाज़त नहीं देता। ऑनर किलिंग के सरकारी आंकड़ों से ज़ाहिर है कि अपनी मर्ज़ी से शादी करना एक बहुत बड़ी समस्या है। शहरों और जागरूक तबकों में हालत कुछ सुधरती दिखती है पर अब भी लोग जाति और धर्म की रूढ़ियों में बंधे हुए नज़र आते हैं।

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