दवा नहीं, दारू पर ज्यादा पैसा खर्च करता है ग्रामीण भारत

दवा नहीं, दारू पर ज्यादा पैसा खर्च करता है ग्रामीण भारतये फोटो 2011 पश्चिम बंगाल की है। (फोटो साभार- डेली मेल)

उमेश की अगले महीने ही शादी होने वाली थी। पर अफसोस, जहरीली शराब पीने से उसकी तबियत खराब हो गई और बाराबंकी से इलाज के लिए लखनऊ लाते समय रास्ते में उसकी मौत हो गई। उमेश उन 12 मृतकों में से एक है जिनकी मौत बुधवार को बाराबंकी के देवा और रामनगर इलाके में होती है। उमेश की उम्र मात्र 22 साल थी। मृतकों में 22 से 30 वर्ष के कई युवा हैं।

बाराबंकी की ये घटना उदाहरण मात्र है, कि कैसे ग्रामीण भारत को शराब अपने चपेट में ले रहा है। शराब के आड़ में अवैध करोबार भी खूब फल-फूल रहा है। वर्ष 2016 में हुए एक सर्वे के अनुसार, देश के ग्रामीण इलाकों में लोग दवाओं के मुकाबले शराब पीने पर ज्यादा पैसा खर्च करते हैं।

कानपुर शहर में रहने वाले अंतरराष्ट्रीय नशा मुक्ति अभियान के प्रमुख योग गुरु ज्योति कहते हैं "ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी बहुत ज्यादा है। लोगों के पास कुछ काम ही नहीं है। किसानों की आय भी घटती जा रही है। ऐसे में लोग नशे की ओर बढ़ने लगते हैं। अच्छी शराब पीने के लिए पैसे तो होते ही नहीं। यहीं शराब माफिया सफल हो जाते हैं। वो शराब के नाम सस्ता जहर लोगों को मुहैया करा रहे हैं। शासन और प्रशासन की मिलीभगत से जहरीली शराब बनाने का करोबार खूब फलफुल रहा है।"

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अप्रैल 2017 में यूपी के एटा में जहरीली शराब पीने से 17 लोगों की मौत हो गई थी। मृतकों में सभी ग्रामीण ही थे। बिहार में कहने को तो शराब पर पाबंदी है, बावजूद इसके वहां पिछले साल गोपालगंज जिले में जहरीली शराब के सेवन से 17 लोगों को जान गंवानी पड़ी। 2017 जुलाई में आजमगढ़ शराब कांड ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं।

आजमगढ़ के रौनापार थाना क्षेत्र में जहरीली शराब पीने से 12 लोगों की मौत हो गयी थी। वर्ष 2015 नवंबर में गोरखपुर के पिपराइच थाना के जंगल छत्रधारी में भी जहरीली शराब पीने से 4 लोगों की मौत हो गई थी। गोरखपुर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का क्षेत्र है। मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने कहा था उनकी सरकार अवैध शराब कारोबारियों पर शिंकजा कसेगी, लेकिन बात आई-गई हो गई।

वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल के संग्रामपुर में जहरीली शराब पीने से 140 से ज्यादो लोगों की मौत हो गयी थी। 2015 के मार्च महीने में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के मलिहाबाद इलाके में पचास से ज्यादा लोग जहरीली शराब पीकर अपनी जान गंवा बैठे। इससे पहले उन्नाव जिले में जहरीली शराब पीने से तकरीबन तीन दर्जन लोग मौत के मुंह में समा गए। राज्य के आजमगढ़, बुलंदशहर, मुरादाबाद, मेरठ, अलीगढ़, कानपुर, इलाहाबाद, सहारनपुर, बहराइच, गाजीपुर, वाराणसी, प्रतापगढ़, भदोही, मिर्जापुर व जालौन में अवैध शराब का कारोबार होली जैसे त्योहारों के समय चरम पर होता है। नतीजतन, कई निर्दोष लोग मारे जाते हैं अथवा आंख की रोशनी गंवा बैठते हैं।

उत्तर प्रदेश भदोही के सामाजिक कार्यकर्ता (ह्यूमन एजुकेशन डेवलपमेंट वेलफेयर ट्रस्ट) और शराब के खिलाफ मुहिम चला रहे हरीश सिंह कहते हैं, "ग्रामीण क्षेत्रों के वो लोग जो मजदूरी करते हैं और नशे के आदी होते हैं, वे महंगी शराब तो खरीद नहीं पाते। अवैध शराब बनाने वाले कारोबारियों के दलाल ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय रहते हैं। वो 10-20 रुपए में देशी शराब की बोतल बेचते हैं। ये जहर ग्रामीण क्षेत्रों में हर जगह आसानी से उपलब्ध है। पुलिस की नाकामी से अवैध शराब का कारोबार बढ़ रहा है।"

देश के अन्य राज्य महाराष्ट्र, उत्तराखंड, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, बंगाल, आंध्र प्रदेश और ओड़िशा में हर साल, खासकर त्योहारों के अवसर पर जहरीली-नकली शराब के सेवन से बड़ी संख्या में लोग अकाल मौत के शिकार हो जाते हैं। जून, 2015 में जहरीली शराब ने मुंबई में जमकर कहर बरपाया, जहां मालवणी थाना अंतर्गत लक्ष्मीनगर झोंपड़पट्टी स्थित एक अनधिकृत दुकान से खरीदी गई जहरीली शराब पीने से नब्बे लोगों की मौत हो गई, जबकि सौ से भी ज्यादा लोगों को गंभीर हालत में विभिन्न अस्पतालों में दाखिल कराना पड़ा।

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मुंबई के भांडुप में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता संतोष कुमार पांडेय नशा मुक्ति अभियान से जुड़े हुए हैं, बताते हैं "नशे के इस कारोबार में तंत्र का शह होता है, ग्रामीण क्षेत्रों की गरीब जनता पैसे कम होने के कारण यह जहर खरीद लेती है। उसे क्या पता कि वो नशा नहीं, जहर है। सरकार चाहे तो इनपर लगाम लगा सकती है। लेकिन सरकारें फायदे के चक्कर पर इन्हें शह देती हैं। और गरीब लोग मारे जाते हैं।"

वर्ष 2004 में मुंबई के विक्रोली इलाके में जहरीली शराब पीने से सत्तासी लोगों की मौत हो गई थी। जनवरी 2012 में आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के मइलावरम व पोरत्रागनर इलाकों में जहरीली शराब पीने से अठारह लोग मारे गए। फरवरी 2012 में ओड़िशा के कटक जिले में जहरीली शराब पीने से बत्तीस लोगों की मौत हो गई।

2009 में खुदरा जिले में तैंतीस और 1992 में कटक में दो सौ लोग जहरीली शराब के शिकार बनकर अपनी जान गंवा बैठे थे। दिसंबर 2011 में पश्चिम बंगाल में 171, फरवरी 2010 में तमिलनाडु में 10 और जुलाई 2009 में गुजरात में 107 लोग मिलावटी-जहरीली शराब पीने से मारे गए। इनमें से ज्यादातर मौतें ग्रामीण क्षेत्रों में ही हुई हैं।

नशे की चपेट में ग्रामीण भारत

वर्ष 2016 में आई क्रोम डेटा ऐनालिटिक्स ऐंड मीडिया (क्रोम डीएम) की सर्वे रिपोर्ट के खुलासे चौंकाने वाले थे। इसमें बताया गया कि गांव-देहात के लोग दवाओं के मुकाबले नशे की चीजों पर ज्यादा पैसा खर्च करते हैं। ग्रामीण भारत में एक व्यक्ति इलाज पर करीब 56 रुपए खर्च करता है जबकि शराब पर 140 रुपए और तंबाकू पर 196 रुपए। यानी इलाज पर खर्च के मुकाबले नशे की चीजों का खर्च तीन गुना ज्यादा है।

मध्य प्रदेश के इंदौर में रहने वाले नशामुक्त भारत आंदोलन यात्रा के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. सुनीलम बताते हैं "देश में प्रत्येक वर्ष 10 लाख लोगों की मौत शराब के सेवन से होती है और शराब बिक्री से अधिक फायदा देश के राजनेताओं, पुलिस तथा शराब माफियाओं को होता है। युवा वर्ग शराब सहित मादक पदार्थों की लत का शिकार होता जा रहा है। गरीब लोग सस्ते नशे के चलते जहरीली शराब पीकर मौत को गले लगा रहे हैं।"

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शराब से होने वाले नुकसान को देखते हुए गुजरात और नागालैंड और बिहार सरकार ने अपने राज्यों में शराब को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया है। एनसीआरबी के अनुसार महाराष्ट्र में शराब पीने से सबसे अधिक मौतें होती हैं। इसके बाद मध्यप्रदेश और तमिलनाडु का नंबर आता है। आंकड़े बताते हैं कि शराब की वजह से महिलाओं पर होने वाले शारीरिक शोषण के मामलों में बढ़ोतरी हुई है।

तमिलनाडु में शराब पीने वालों की मौतों के चलते अधिकतर महिलाएं 30 वर्ष से कम उम्र में ही विधवा हो रही हैं। केरल में 69 प्रतिशत अपराधों की वजह शराब और ड्रग्स को बताया गया है। साल 2013 में महाराष्ट्र में शराब पीने से मरने वालों की संख्या 387 थी, जो साल 2014 में 339 प्रतिशत बढ़कर 1,699 हो गई। देश में फिलहाल उत्तर प्रदेश, राजस्थान सहित कई राज्यों में शराब पर प्रतिबंध की मांग उठ रही है।

बिहार में पटना निवासी पत्रकार और लेखक पुष्य मित्र कहते हैं "बिहार में शराबबंदी का असर अच्छा रहा। अब लोगों का शाम ढलते ही नशे में धुत होकर किसी से झगड़ा करना, हंगामा करना, औरतों-लड़कियों को छेड़ना काफी कम हो गया है। नवयुवकों और किशोरों में नशा की प्रवृत्ति अब नहीं नजर आती। हां, कुछ लोग इस कदर आदी हैं कि कहीं न कहीं पर वो अपनी व्यवस्था कर लेते हैं।

वो आगे बताते हैं, गरीब लोग नकली शराब बनाने की कोशिश करते हैं, इसलिए कुछ घटनाएं भी हो जाती हैं। यह भी सच है कि शराब की होम डिलीवरी हो रही है। मगर मात्रा काफी कम है। और समझदार लोग ऐसा करने का रिस्क नहीं लेते, क्योंकि एक बार चक्कर में पड़े तो लाखों रुपए खर्च और नौकरी चाकरी पर भी खतरा रहता है।

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बिहार में शराबबंदी लागू होने के बाद राज्य में अपराध की घटनाओं तथा सड़क दुर्घटनाओं में कमी आई है। आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल 2016 से अप्रैल 2017 के बीच जिलों के विभिन्न थानों में अपराध के कुल 2,328 मामले दर्ज हुए हैं, जबकि पिछले साल इतने ही दिनों में 3,178 अपराध के मामले दर्ज हुए थे। पिछले साल की तुलना में 850 कम आपराधिक मामले सामने आए हैं, जो पहले से 27 फीसदी कम है।

शराब के प्रभाव से हर 96वें मिनट पर एक भारतीय की मौत

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में शराब का सेवन करने से प्रति 96 मिनट में एक और एक दिन में करीब 15 लोगों की मौत हो रही है।

विक्रम पटेल, लंदन स्कूल ऑफ हाइजिन एवं ट्रॉपिकल मेडिसिन के साथ एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, इंडियन एक्सप्रेस के एक कॉलम में कहते हैं "शराब पर रोक लगाने से लत और मौतों को कम नहीं कर सकते हैं। पटेल लिखते हैं, “ऐसे पदार्थ जिसके सेवन से लोगों को खुशी मिलती है उस पर रोक लगाने से काम नहीं बनाता है।

लत एक स्वास्थ्य संबंधित समस्या है, न कि नैतिक समस्या है। रोक लगाना ज्यादातर सार्वजनिक स्वास्थ्य वैज्ञानिकों द्वारा अस्वीकार किया गया है, जो इस क्षेत्र को भली प्रकार जानते हैं। यहां तक कि विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इसकी सिफारिश नहीं करता है।”

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में प्रति व्यक्ति शराब की खपत 38 प्रतिशत बढ़ गई है। साल 2003-05 में यह खपत 1.6 लीटर थी, जो साल 2010-12 में बढ़कर 2.2 लीटर हो गई। भारत में शराब पीने वालों की संख्या 11 प्रतिशत से ज्यादा है, जबकि दुनिया में यह स्थिति 16 प्रतिशत है।

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भारतीय वाणिज्य एंव उद्योग मंडल (एसोचैम) की मानें तो भारत में आज शराब की खपत 19 अरब लीटर सालाना है और इससे हर वर्ष करीब 1.45 लाख करोड़ रुपये का कारोबार होता है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा शराब का बाजार है और यह सबसे तेजी से बढ़ता बाजार भी है। यह पूरी दुनिया में व्हिस्की का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। भारत में कुल शराब खपत में 80 प्रतिशत हिस्सा देसी-विदेशी व्हिस्की का है।

गांव कनेक्शऩ में प्रकाशित ख़बर। ख़बरें विस्तार से यहां पढ़िए- www.gaonconnection.com

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