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झारखंड: लॉकडाउन से सब्जी किसानों को हुआ नुकसान, लेकिन उन्हें अब भी है उम्मीद

लॉकडाउन ने जो किया, सो किया। ऊपर से मौसम की मार ने जान ही निकाल ली। लॉकडाउन के दौरान पांच-छह बार ओले पड़े। पूरी की पूरी फसल बर्बाद हो गई। अब किससे कहने जाएं। उम्मीद है कि अब सब बढ़िया हो जाएगा।

Rajendra TiwariRajendra Tiwari   6 Jun 2020 8:42 AM GMT

झारखंड: लॉकडाउन से सब्जी किसानों को हुआ नुकसान, लेकिन उन्हें अब भी है उम्मीद

'महाराष्ट्र या पंजाब से किसी किसान की आत्महत्या की खबर जब कहीं पढ़ता या देखता था, तो मैं हंसी आती थी - कैसा किसान है? मैं उन स्थितियों को समझ ही नहीं पाता था। मुझे अजीब लगता था। लेकिन कोरोना लॉकडाउन के बाद अब समझ में आ रहा है कि किसान आत्महत्या करने पर मजबूर क्यों होते होंगे।'

'बंद गोभी जो सामान्य समय में 20 रुपये प्रति किग्रा के हिसाब से जाती थी, लॉकडाउन में एक रुपये पर गई। इससे ज्यादा तो लेबर की कीमत आती है।'

'सरकार से कोई मदद या सुविधा की न तो हमें कोई उम्मीद थी और न ही मिली। वैसे हमें सरकार से कुछ चाहिए भी नहीं, यदि वह सप्लाई चेन सुनिश्चित कर दे।'

'लॉकडाउन ने जो किया, सो किया। ऊपर से मौसम की मार ने जान ही निकाल ली। लॉकडाउन के दौरान पांच-छह बार ओले पड़े। पूरी की पूरी फसल बर्बाद हो गई। अब किससे कहने जाएं। उम्मीद है कि अब सब बढ़िया हो जाएगा।'

अगर आप सब्जियों की कटोरी माने जाने वाले झारखंड के रांची के सब्जी किसानों से बात करेंगे तो ऐसी ही बातें सुनने को मिलेंगी। रांची व उसके आसपास से पूरे झारखंड के अलावा बंगाल व उड़ीसा सब्जियों की सप्लाई होती है। अधिकतर छोटे किसान हैं और इन किसानों का कोई प्रभावी सहकारी संघ भी नहीं है। इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर बड़ा निर्वात है। अधिकतर जगहों पर सब्जी किसानों को कोल्ड स्टोरेज जैसी बेसिक सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। जिनका बड़ा काम है और नेटवर्किंग अच्छी है, कोरोना की वजह से लॉकडाउन का असर उनपर कम रहा लेकिन छोटी जोत वालों के उत्पाद कौड़ियों के भाव पर गये हैं।

रांची के मांडर प्रखंड के चोरैया गांव के सब्जी किसान अब्दुल कुदूस ने तो रसीदें सामने रख दीं कि देखिये, तरबूज एक रुपये किग्रा में निकला। तीन कुंतल तरबूज हुआ 300 रुपये का और इस पर मंडी तक का खर्चा आया 150 रुपए और मुझे मिले 150 रुपए। दो एकड़ में तरबूज लगाया था कि इसमें अच्छा मार्जिन मिलेगा लेकिन अल्लाह की मर्जी कुछ और ही थी। फिर भी वह नाउम्मीद नहीं है, कहते हैं - अब लॉकडाउन खत्म हो रहा है। हालात सुधरेंगे। रात तक मेरा एक एक ट्रक तरबूज सियालदा पहुंच रहा है। शायद, इस बार अच्छा रेट मिल जाएगा।

सब्जियों के साथ फूलों की खेती करने वाले आशुतोष बहुत चिंतित नजर आ रहे थे। शादियों का पूरा सीजन लॉकडाउन में निकल गया। फूलों से कुछ मिलना तो है नहीं, उनको तोड़वा कर फेंकने पर भी पैसा खर्च करना पड़ा रहा है। गोभी के खेत दिखाते हुए आशुतोष के चेहरे पर उम्मीदी तैर जाती है - सब खुल जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा। हालांकि साथ ही वह अपने नुकसान की बानगी के रूप में बंद गोभी खराब हो जाने की बात भी बताते है। लेकिन फिर वह कहते हैं, हम किसानों का जीवन ही ऐसा है। हर फसल नई उम्मीद का प्रतीक होती है हमारे लिए।

अभी हाल में ही सब्जी की खेती में उतरे एक किसान बंधु कहते हैं कि कोरोना के प्रकोप (लॉकडाउन) के साथ-साथ इस बार मौसम की मार भी पड़ती रही। आंधी-पानी-ओला ने भी बहुत नुकसान किया। पिछले हफ्ते पड़े ओले में मेरा पूरा खेत नष्ट हो गया। क्या सोचा था और क्या हो रहा है। सोचा था कि एक हफ्ते के बाद शायद लॉकडाउन खत्म हो तो मांग बढ़ेगी और हमारे नुकसान की कुछ भरपाई हो जाएगी। लेकिन हमारी उम्मीदों पर पत्थर पड़ गये।

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अब्दुल कुदूस तो अपने आंधी-पानी और ओलों की वजह से गिर गई करेले की लतर (झाड़) दिखाते हैं। मजदूर उन झाड़ को सीधा कर रहे थे। उनका दर्द फिर फूट उठता है - करेला पांच रुपये किग्रा में जा रहा है जबकि वैसे कम से कम 30-35 में जाता था। करेले का एक बीज ही चार रुपये का पड़ता है। ऊपर से मौसम की वजह से करेले की झाड़ को सीधा करवाने में भी पैसा लग रहा है। दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है।

सब्जी किसानों की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे फसल को रोक भी नहीं सकते। एक तो सब्जी खराब हो जाएगी और तब उसको ठिकाने लगाने के लिए भी मजदूर लगाने पड़ेंगे। यानी मिलेगा कुछ नहीं, जेब अलग से ढीली होगी। बगीचा टोली के रोपना उरांव बताते हैं - अब बंद गोभी को ही लीजिए। एक रुपये में जा रही है। आप खुद हिसाब लगा लीजिए, एक रुपये में हमको कुछ मिलेगा या हमारा पैसा डूबेगा। इसके अलावा, वह बताते हैं कि लॉकडाउन के चलते लोकल में घटतौली भी खूब हो रही है। पचास-साठ किलो पर पांच किलो का फटका लगता है। कुछ बोलिये तो अपना और भी नुकसान कर लीजिए। रोपना उरांव की नजरें अब ओल व अदरक की फसल पर है।

अब्दुल कुदूस व आशुतोष भी घटतौली की बात करते हैं। आशुतोष वैसे तो सरकार से कोई खास उम्मीद नहीं रखते लेकिन इतना जरूर कहते हैं कि यदि दूसरे शहरों व राज्यों तक सप्लाई चेन दुरुस्त हो जाए तो बहुत सारी समस्याएं खुद-ब-खुद खत्म हो जाएंगी।

कदम टोली गांव के मुख्तार अंसारी हकीकत निचोड़ कर रख देते हैं - फूल गोभी एक रुपय में गई तो गई…आगे सब ठीक रहेगा। हम किसान हैं। उम्मीद पर जीते हैं। यह फसल गई, कोई बात नहीं। अगली फसल में सब ठीक होगा। इसी तरह हमारा जीवन चलता है। किससे शिकायत करें!

केदारनाथ अग्रवाल की 'धरती' कविता बरबस याद आने लगती है -

यह धरती है उस किसान की,

जो मिट्टी का पूर्ण पारखी,

जो मिट्टी के संग साथ ही,

तपकर,

गलकर,

जीकर,

मरकर,

खपा रहा है जीवन अपना,

देख रहा है मिट्टी में सोने का सपना,

मिट्टी की महिमा गाता है,

मिट्टी के ही अंतस्तल में,

अपने तन की खाद मिला कर,

मिट्टी को जीवित रखता है;

खुद जीता है।

यह धरती है उस किसान की !


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