मानसून की बेरुखी से यूपी, बिहार और झारखंड में सूख रहा किसानों का हलक

मुंबई समेत देश के कई इलाके भले पानी-पानी हो रहे हों, लेकिन देश में एक बड़ा इलाका है जो बारिश की बूंदों के लिए तरस रहा है।

मानसून की बेरुखी से यूपी, बिहार और झारखंड में सूख रहा किसानों का हलक

लखनऊ। मुंबई समेत देश के कई इलाके भले पानी-पानी हो रहे हों, लेकिन देश में एक बड़ा इलाका है जो बारिश की बूंदों के लिए तरस रहा है। मानसून की सुस्त रफ्तार से यूपी, बिहार, झारखंड समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में खेती चौपट हो सकती है। कम बारिश का सीधा असर खरीफ की बुआई पर पड़ रहा है।

यूपी, झारखंड, बिहार और मध्य प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड में जुलाई के दूसरे हफ्ते में भी बारिश नहीं हुई है। मानसून के शुरुआती दिनों में 2-3 दिन की बारिश के बाद ज्यादातर इलाकों में सिर्फ बूंदाबांदी हुई है, जिसके चलते खरीफ सीजन में बुआई पिछड़ गई है। मानसून की बेरुखी से किसानों की खेती का लागत बढ़ गई है, कई इलाकों में किसान पंपिंग सेट चलाकर रोपाई करवा रहे हैं, जिससे प्रति एकड़ 2000 रुपए तक का अतिरिक्त खर्च लग रहा है।

"उम्मीद से बारिश कम जरूर है, लेकिन 11 जुलाई के बाद दिल्ली, हरियाणा, यूपी के कई इलाकों में बारिश का सिलसिला शुरू हो गया है। अगले सप्ताह भी अच्छी बारिश की उम्मीद है। ऐसे में खेती में जो नुकसान होता नजर आ रहा था वो कम हो सकता है। " डी. सिवानंद पई, प्रमुख मौसम विभाग, मानसून पूर्वानुमान

मौसम विभाग में मानसून पूर्वानुमान के प्रमुख डी. सिवानंदा पई आने वाले दिनों में अच्छी बारिश की उम्मीद जताते हैं। "उम्मीद से बारिश कम जरूर है, लेकिन 11 जुलाई के बाद दिल्ली, हरियाणा, यूपी के कई इलाकों में बारिश का सिलसिला शुरू हो गया है। अगले सप्ताह भी अच्छी बारिश की उम्मीद है। ऐसे में खेती में जो नुकसान होता नजर आ रहा था वो कम हो सकता है। ये भी हो सकता है कि अभी तक की कम बारिश की भरपाई हो जाए।"

11 जुलाई को यूपी के कई हिस्सों बारिश हुई, लेकिन ये भी उम्मीद से काफी कम है। जबकि ज्यादातर जिलों को बारिश का इंतजार है।


कि खेत के डीले भीग जाएं...

बेहतर मानसून का अनुमान लगाने वाले मौसम विभाग को आगे भले उम्मीदें हो, लेकिन किसान बादलों से बारिश की भीख मांगते नजर आ रहे हैं। दिल्ली में मौसम विभाग के दफ्तर के करीब 700 किलोमीटर दूर बुंदेलखंड के ललितपुर में पिछले दिनों में इतनी भी बारिश नहीं हुई कि खेत के डीले भीग जाएं।

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बुंदेलखंड के सबसे प्रभावित जिलों में शामिल ललितपुर में 11 जुलाई तक एक बार भी बारिश नहीं हुई थी। महरौनी में रहने वाले स्थानीय पत्रकार अरविंद परमार बताते हैं, "अच्छे मानसून की बात हो रही थी, तो किसानों ने 10-12 दिन पहले ही उड़द और सोयाबीन बो दिया था, अगर इस हफ्ते बारिश नहीं हुई तो बीज जमेंगे ही नहीं।"

ललितपुर में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के जिला सलाहकार लवकुश टोंटे बताते हैं, "जब छुटपुट पानी बरसा था तो किसानों ने थोड़ी बहुत नमी देखकर उड़द बो दिए थे, अब अगर बारिश नहीं हुई तो किसानों को भारी नुकसान हो सकता है।"

धान की खेती का इरादा त्यागा

बारिश का इंतजार सिर्फ यूपी के साथ बिहार के किसानों को भी ललितपुर से करीब 1300 किलोमीटर दूर के बिहार के पूर्णिया जिले में चनका के प्रगतिशील किसान गिरीद्रनाथ झा इस बार धान की खेती का इरादा त्याग चुके हैं। "11 एकड़ धान के लिए तैयार नर्सरी खराब हो रही है, लेकिन बारिश के इंतजार में रोपाई नहीं हो पाई। इतना महंगा डीजल है अगर मौसम ऐसा ही रहा तो मैं इस सीजन में धान नहीं लगाऊंगा।" गिरीद्र फोन पर गाँव कनेक्शन को बताते हैं।

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वो आगे कहते हैं, "हमारे यहां आखिरी बार अच्छी बारिश करीब एक महीना पहले यानि प्री मानसून से हुई थी, उसके बाद कभी यहां तो कभी वहां यानी कलस्टर में बारिश हो रही है, जिसका फायदा किसानों को नहीं मिल पा रहा है।" बिहार में धान की खेती बहुतायत होती है।

छोटे-छोटे खेत वाले झारखंड में धान खूब होता है, लेकिन ज्यादातर खेती मानसून पर निर्भर है, जिसे इस बार झटका लगा है। इस पहाड़ी इलाके में पिछले साल के मुकाबले 33 फीसदी कम बारिश हुई है। वर्ष 2017 में 6 जुलाई तक 82.9 मिलीमीटर बारिश हुई थी, जबकि इस बार सिर्फ 49.4 मिली बारिश हुई है।

झारखंड के 20 जिलों में सूखे जैसे हालात

कृषि विभाग ने यहां 18 लाख हेक्टेयर में धान की खेती का लक्ष्य रखा था, जबकि जुलाई के पहले हफ्ते में सिर्फ 1.11 लाख हेक्टेयर में रोपाई हुई है। मोटे तौर पर ज्यादातर इलाकों में रोपाई के लिए बारिश का इंतजार है। प्रदेश के 20 से ज्यादा जिलों में सूखे जैसे हालात हैं।

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इक्रीसेट से जुड़े कृषि वैज्ञानिक सिराज हुसैन कहते हैं, " कमज़ोर मानसून किसानों के लिए सिरदर्द बनता दिख रहा है। इस बार 11 जुलाई तक यूपी के कुछ हिस्सों में बारिश औसत से काफी कम हुई है। यूपी में 48 प्रतिशत कम बारिश हुई है। इसका असर सीधे बुवाई पर पड़ा है।"

उत्तर भारत में कृषि उत्पादन का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश, पंजाब हरियाणा और बिहार से आता है। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक छह जुलाई तक हरियाणा, हिमाचल, यूपी में धान की बुआई में पिछले साल के मुकाबले 50 फीसदी कमी है।

खरीफ फसलों की बुआई करीब 15 फीसदी कम


कृषि विभाग के ताजा आंकड़ों यानी 6 जुलाई तक खरीफ की फसलों की बुआई करीब 333.7 लाख हेक्टेयर में हुई थी, जो पिछले साल में इस समय तक हुई बुआई से करीब 15 फीसदी कम है। जबकि इस वर्ष मौसम विभाग ने अच्छी बारिश की उम्मीद जताई थी। मानसून की बेरुखी से कृषि जानकार भी हैरान है।

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महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिण भारत और कई पहाड़ी इलाकों में रेनफॉल को बेहतर बताते हुए वो अलनीनो जैसे किसी प्रभाव से इनकार करते हैं। डी.एस पई कहते हैं, "राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के कुछ हिस्सों में अच्छी बारिश हुई है। आने वाले दिनों में यूपी, बिहार, झारखंड में भी बारिश का सिलसिला शुरू होगा। ये पानी नदियों से होकर देश के दूसरे इलाकों में पहुंचेगा तो वहां के किसानों को फायदा होगा।"

एक पखवाड़े पहले ही पहुंच गया था मानसून

देश में इस बार मानसून अपने अनुमानित समय से करीब एक पखवाड़े पहले ही पहुंच गया था, जिससे किसान और सरकार दोनों को खरीफ के अच्छे सीजन की उम्मीद जगी थी। लेकिन एक जुलाई से लेकर 10 जुलाई तक के मौसम में हालात बदल गए हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक देश के जिन 653 जिलों में बारिश के आंकड़े उपलब्ध थे, उनमें 4 जुलाई तक करीब 40 फीसदी कम बारिश हुई है।

देश में खेती के मुद्दों पर नजर रखने वाले कृषि विशेषज्ञ विजय सरदाना फोन पर गाँव कनेक्शन को बताते हैं, "इसमंश कोई संदेह नहीं कि कई राज्यों में मानसून पिछड़ गया है, जिसका असर खेती पर पड़ेगा। खरीफ सीजन कई राज्यों के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में अगर आगे भी हालात रहे तो दिक्कत होगी।"

किसानी की लागत बढ़ी, महंगे डीजल से परेशान

भारत के कुल खेती योग्य भूमि का 46 फीसदी भाग्य सिंचित है। बाकी 54 फीसदी खेती मानसून पर निर्भर है। सिंचित क्षेत्र यानि जहां सिंचाई के साधन, नहर, नलकूप, कुएं आदि उपलब्ध हैं, में भी मानूसन का अहम रोल रहता है। जब भी मानसून बेरुखी दिखाता है पंजाब, हरियाणा, यूपी जैसे इलाकों में भी किसानों का खर्च बढ़ जाता है।

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यूपी के बाराबंकी क टांडपुर गाँव में रहने वाले नरेंद्र कुमार को एक एकड़ से ज्यादा धान लगाना था, धान की नर्सरी भी 21 दिन से ज्यादा की हो गई है, लेकिन रोपाई नहीं हो पाई है, क्योंकि बारिश नहीं हुई। नरेंद्र बताते हैं, "अब इंजन (डीजल सेट) चलाकर रोपाई कराएंगे, क्योंकि बारिश हो नहीं रही, इससे करीब 2000 रुपए का डीजल लगेगा, क्योंकि रोपाई के दौरान पानी पूरे खेत में होना चाहिए। अगर पानी बरसता तो ये पैसे बच जाते।"

बिहार के गिरींद्रनाथ झा ने डीजल के खर्च को देखते हुए धान नहीं लगाने का फैसला किया है। उनका तर्क है कि अगर आगे भी बारिश नहीं हुई तो सिंचाई करना मुश्किल हो जाएगा।


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