NCRB की रिपोर्ट में फिर किसानों की आत्महत्या के आंकड़े नहीं, उठ रहे सवाल

देश में कब, कहां और किसके साथ कौन सा अपराध हुआ? कितने लोगों की हत्या हुई और कितनी आत्महत्या हुईं। 2017 की राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट जारी हो गई है, लेकिन इस रिपोर्ट कहीं पर किसानों की आत्महत्या का जिक्र नहीं है। जिसके बाद सरकार की मंशा पर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं।

Arvind ShuklaArvind Shukla   23 Oct 2019 8:30 AM GMT

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लखनऊ। "कृषि संकट, किसान की आत्महत्या से नापा जाता है। आत्महत्या नहीं तो ये मैसेज जाएगा कि खेती में समस्या नहीं। यही सरकार की रणनीति है। सरकार जानबूझ कर किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों को जारी नहीं कर रही है, लेकिन आंखें बंद कर लेने से संकट खत्म नहीं हो जाता।" राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट में किसान आत्महत्या का जिक्र न होने पर कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (National Crime Record Bureau - NCRB) ने अक्टूबर के तीसरे हफ्ते में देश में अपराध से जुड़ी अपनी रिपोर्ट जारी की है। लेकिन ये लगातार दूसरा साल है जब एनसीआरबी की रिपोर्ट में किसान आत्महत्या का जिक्र नहीं है। इससे पहले की रिपोर्ट में किसान और मजदूरों की आत्महत्या का अलग सेक्शन हुआ करता था। आखिरी बार 2015 की रिपोर्ट में इसका जिक्र था, रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में 12602 किसान और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की थी। ये हाल तब है जब कि महाराष्ट्र में 2015 के बाद लगातार 8 किसान रोज आत्महत्या कर रहे हैं। पंजाब में कर्ज़ के चलते एक किसान का वंश ही खत्म हो गया।

महाराष्ट्र में सीपीआई के किसान संगठन के उपाध्यक्ष राजन क्षीरसागर कहते हैं, "किसान कितना परेशान है ये समझने के लिए महाराष्ट्र के परमणी जिले का एक उदाहरण बताता हूं, यहां पाथरी में किसान ने आत्महत्या की। उसके भाई की बेटी ने आत्महत्या कर ली और चिट्ठी में लिखा कि मुझे डर है कि कहीं आप भी चाचा की तरह मेरी शादी की खर्च के डर से आत्महत्या न कर लें। तो सिर्फ किसान नहीं उसके परिजन भी आत्महत्या कर रहे है, सरकार इस समस्या को सुलझा नहीं पा रही।"

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सितंबर के दूसरे हफ्ते में पंजाब में हुए एक प्रकरण ने भारत में किसान के शुभचिंतकों को सोचने पर मजबूर कर दिया। पंजाब के बरनाला जिले के भोजना गांव में 22 साल के एक युवक ने कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली थी। कर्ज़ के कारण ये परिवार में चौथी पीढ़ी की पांचवीं मौत थी, और इसी के साथ ये वंश खत्म हो गया। इससे पहले युवक के परदादा, दादा दादा के भाई और पिता भी आत्महत्या कर चुके थे। 50 साल पहले युवक ने परदादा जोदिंगर सिंह ने जो 13 एकड़ जमीन के मालिक थे, आढ़ती से कर्ज़ लिया था, कर्ज लेने के 10 साल बाद उन्होंने जान दे दी, बढ़ते कर्ज़ से परेशान युवक के दादा भगवान सिंह 25 साल पहले, और कमाई न होने से परेशान उसके दादा के भाई नाहर सिंह ने भी 10 साल पहले जान दे दी। जबकि पिछले साल लवप्रीत सिंह उसे परिवार में दादी, माता और एक बहन है।

लोकसभा चुनाव के पहले चरण के ठीक एक दिन पहले आत्महत्या करने वाले उत्तराखंड में किसान ईश्वर चंद शर्मा ने लिखा था, "बीजेपी को वोट न दें, बीजेपी ने पांच साल में किसानों को बर्बाद कर दिया।" सिर्फ ऐसा नहीं है कि आत्महत्या सिर्फ बीजेपी शाषित राज्यों में हो रही हैं। पंजाब और राजस्थान में भी किसान जान दे रहे हैं। जून 2019 में कर्ज़ में डूबे किसान सोहन कड़ेला (43 साल) ने आत्महत्या करने से पहले वीडियो बनाया, जिसमे कहा कि मेरी मौत के जिम्मेदार अशोक गहलोत हैं। मैं सब किसान भाईयों के लिए मरने जा रहा हूं।

पंजाब के बरनाला में चौथी पीढ़ी के पांचवें सदस्य लवप्रीत सिंह की आत्महत्या ने कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार पर सवाल खड़े किए। दैनिक भास्कर की ख़बर के मुताबिक लवप्रीत के परिवार पर अब लगभग 8.5 लाख का कर्ज़ था, जिसमें से छह लाख आढ़ती और दो लाख बैंक के थे, पिछले साल उसके पिता की मौत के बाद कांग्रेस सरकार के वादे के मुताबिक 5 लाख रुपए माफ होना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। लवप्रीत के परिवार के सिर्फ 57000 रुपए माफ हुए। कैप्टन सरकार भी किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए कर्ज़माफी का की बात कहकर सरकार में आई थी।

महाराष्ट्र में ही 2015 से 2018 के बीच 12021 किसानों के आत्महत्या की है। ये आंकड़े सामाजिक कार्यकर्ता शकील अहमद की आरटीआई के जवाब में खुद महाराष्ट्र सरकार ने दिए हैं। यानि औसतन रोज 8 किसानों ने जान दी है। महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडणवीस सरकार ने 2017 में छत्रपति शिवाजी महराज शेतकरी सन्मान योजना लागू की थी, जिसके तहत 89 लाख किसानों को फायदा मिलना, लेकिन बहुत सारे किसानों का आरोप है कि उन्हें कर्ज़माफी का लाभ नहीं मिला। विधानसभा चुनाव से पहले यहां दोबारा रजिस्ट्रेशन शुरु किए गए थे। विधानसभा चुनाव में किसानों की आत्महत्या मुद्दा नहीं बनी।

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30 दिसंबर 2016 जारी रिपोर्ट में एनसीआरबी ने अपनी रिपोर्ट में एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015 में बताया था कि 2015 में 12,602 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने आत्महत्या की। जबकि वर्ष 2014 में ये आंकड़ा में 12,360 था। ये 42 फीसदी ज्यादा था। रिपोर्ट में बताया गया था कि 12,602 लोगों में 8,007 किसान थे जबकि 4,595 खेती से जुड़े मजदूर थे।

बात अगर राज्यवार करें तो वर्ष 2015 में महाराष्ट्र के आंकड़े भयावह थे। महाराष्ट्र वर्ष 2014-15 में भीषण सूखे की चपेट में था जिस कारण वहां की स्थिति बिगड़ी। वर्ष 2015 में महाराष्ट्र के 4,291 किसानों ने आत्महत्या की थी। जबकि कर्नाटक के 1,569, तेलंगाना 1400, मध्य प्रदेश 1290, छत्तीसगढ़ 954 आंध्र प्रदेश 916 और तमिलनाडु के 606 किसानों ने आत्महत्या की थी। 2012 में कृषि से जुड़े 13,754 लोगों ने आत्महत्या की वहीं वर्ष 2013 में यह आंकड़ा 11,772 था।

"किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर इसलिए क्योंकि कृषि अर्थव्यवस्था को तोड़ा जा रहा है। खेती की इनपुट कास्ट डीएपी-यूरिया कीटनाशनक सब महंगे हो गए हैं। और फसलों की कीमतें धाराशाई हो रही हैं। किसानों की लागत नहीं निकल पा रही है। ज्यादातर किसान शिक्षा और मेडिकल खर्च का खर्च नहीं झेल पा रहे हैं। क्योंकि किसान की फसल के अलावा सबकुछ महंगा हो गया है।" राजन क्षीरसागर आगे जोड़ते हैं।

देशभर में 200 से ज्यादा किसान संगठनों की समन्वय समिति अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति के संयोजक सरदार वीएम सिंह कहते हैं, "बीजेपी सरकार को पता है कि उनके राज में किसानों की आत्महत्याएं बढ़ी हैं। इन्हें जारी न करके वो अपने आगे के किसान विरोधी फैसलों को लागू करना चाहती है। अब 4 नवंबर क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी पर दस्खत होने हैं, अगर आत्महत्या की ख़बरें आती रहीं तो आरसीईपी का विरोध और ज्यादा होगा। और सरकार ऐसे होने देना नहीं चाहती।"

वीएम सिंह अपनी बात जारी रखते हुए आगे कहते हैं, भारत में पिछले 30 सालों में 4 लाख किसानों ने आत्महत्या की है। अगर ये आरसीईपी समझौता लागू हुआ तो 10 करोड़ दूध किसान बर्बाद होंगे। बीजेपी को लगता है पिछले चुनावों में किसानों ने उसे वोट दिया तो सब ठीक है, लेकिन ऐसा है नहीं, किसान ने राष्ट्रवाद (पुलवामा) के नाम पर वोट दिया था। अगर सरकार को ऐसा लगता है खेती में सब ठीक चल रहा है तो वो आत्महत्या के भी आंकड़े जारी करे।"

(आरसीईपी (RCEP) देशों का एक समूह है, जिसमें भारत, आष्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड, ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, म्यामार, फिलीपीन, सिंगापुर, वियतनाम शामिल है। समझौता होने के बाद इन दोनों के बीच एक मुक्त व्यापार होगा, जिसके बाद इन देशों के बीच बिना आयात शुल्क (इंपोर्ट ड्यूटी) के कारोबार होगा। भारत के किसान संगठनों का आरोप है, न्यूजीलैंड जैसे देशों से अगर भारत में दूध और उसके उत्पाद आए तो यहां के 10 करोड़ दूध किसान प्रभावित होंगे।)

किसानों की आत्महत्या के आंकड़े गृह मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में दर्ज किए जाते हैं। कर्ज़ में डूबे किसानों की आमहत्या का सिलसिला 1990 से चला और 1995 से एनसीआरबी ने इन्हें अलग सेक्शन में लिखना शुरु किया था। 2015 तक ये रिपोर्ट भी जारी होती रही।

पिछले 3 दशकों से कृषि, खाद्य और निर्यात नीति पर लगातार लिख रहे, देविंदर शर्मा कहते हैं, "एनसीआरबी की जब रिपोर्ट आती थी, तो किसानों की आत्महत्या और महिलाओं से जुड़े अपराधों की रिपोर्ट ही सुर्खियां बनती थी। अब वो रिपोर्ट ही जारी नहीं होगी तो राष्ट्रीय बहस नहीं बनेगी, धीरे-धीरे वो चर्चा खत्म हो जाएगी, रिपोर्ट न जारी होने से यही मंशा लगती है।"


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