चंद्रमा पर कदम रखने से पहले नील आर्मस्ट्रांग ने लड़ा था युद्ध, जानिए ऐसी ही और रोचक बातें

Vineet BajpaiVineet Bajpai   20 July 2017 11:08 AM GMT

चंद्रमा पर कदम रखने से पहले नील आर्मस्ट्रांग ने लड़ा था युद्ध, जानिए ऐसी ही और रोचक बातेंआज ही के दिन नील आर्मस्ट्रांग ने चंद्रमा पर रखा था पहला कदम।

लखनऊ। 20 जुलाई, 1969 का दिन मानव इतिहास के लिए खास माना जाता है। इंसान ने पहली बार चंद्रमा पर कदम रखा था। नील आर्मस्ट्रांग वे पहले आदमी थे, जिन्हें चन्द्रमा पर सबसे पहले कदम रखने का गौरव प्राप्त हुआ था। इस बात से तो लगभग सभी वाकिफ होंगें, लेकिन क्या आप जानते हैं चंद्रमा पर पहुंचने से पहले नील आर्मस्ट्रांग ने एक युद्ध में भी हिस्सा लिया था ? जी हां, नील आर्मस्ट्रांग खगोलयात्री (ऍस्ट्रोनॉट) बनने से पहले नौसेना में थे और उस समय उन्होंने कोरिया युद्ध में हिस्सा लिया था। जानिए नील आर्मस्ट्रांग के बारे में ऐसी ही कुछ रोचक बातें...

  • नील एल्डन आर्मस्ट्रांग एक अमेरिकी खगोलयात्री और चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले व्यक्ति थे। इसके अलावा वे एक एयरोस्पेस इंजीनियर, नौसेना अधिकारी, परीक्षण पायलट, और प्रोफ़ेसर भी थे।
  • नौसेना के बाद उन्होंने पुरुडु विश्वविद्यालय से स्नातक उपाधि ली और उसके बाद एक ड्राइडेन फ्लाईट रिसर्च सेंटर से जुड़े और एक परीक्षण पायलट के रूप में 900 से अधिक उड़ानें भरीं।

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  • आर्मस्ट्रांग को मुख्यतः अपोलो अभियान के खगोलयात्री के रूप में चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। इससे पहले वे जेमिनी अभियान के दौरान भी अंतरिक्ष यात्रा कर चुके थे।
  • अपोलो 11, वह अभियान था जिसमें जुलाई 1969 में पहली बार चंद्रमा पर मानव सहित कोई यान उतरा और आर्मस्ट्रांग इसके कमांडर थे। उनके अलावा इसमें बज़ एल्ड्रिन, जो चाँद पर उतरने वाले दूसरे व्यक्ति बने, और माइकल कॉलिंस जो चंद्रमा की कक्षा में चक्कर लगाते मुख्य यान में ही बैठे रहे, शामिल थे।
  • पिता स्टीफेन ओहायो सरकार के लिये काम करने वाले एक ऑडिटर थे और उनका परिवार इस कारण ओहायो के कई कस्बों में भ्रमण करता रहा। नील के जन्म के बाद वे लगभग 20 कस्बों में स्थानंतरित हुए। इसी दौरान नील की रूचि हवाई उड़ानों में जगी।
  • नील ने अपने 16वें जन्मदिन पर स्टूडेंट फ्लाईट सर्टिफिकेट हासिल किया और उसी वर्ष अगस्त में ही अपनी एकल उड़ान भरी, यह तब जब अभी उनके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं था।

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  • वर्ष 1947 में नील ने सत्रह वर्ष की आयु में एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की। उन्होंने यह शिक्षा पुरडु यूनिवर्सिटी में ली। वे किसी कॉलेज स्तर की शिक्षा प्राप्त करने वाले अपने परिवार के दूसरे सदस्य थे।
  • आर्मस्ट्रांग को 26 जनवरी 1949 को नौसेना से बुलावा मिला और उन्होंने पेंसाकोला नेवी एयर स्टेशन में अठारह महीने की ट्रेनिंग ली। 20 वर्ष की उम्र पूरी करने के कुछ ही दिनों बाद उन्हें नेवल एविएटर (नौसेना पाइलट) का दर्जा मिल गया।
  • एक नौसेना उड़ानकर्ता के रूप में उनकी पहली तैनाती फ्लीट एयरक्राफ्ट सर्विस स्क्वार्डन 7 में सान डियागो में हुई।
  • युद्ध के दौरान उड़ान का पहला मौका उन्हें कोरियाई युद्ध के दौरान मिला जब 29 अगस्त 1951 को उन्होंने इसमें उड़ान भरी। यह एक तस्वीर लेने के लिए उड़ान भरी थी। पांच दिन बाद, 3 सितंबर को उन्होंने पहली सशस्त्र उड़ान भरी।

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कोरिया के ऊपर उड़ान के दौरान एफ़9एफ़-2 पैंथर्स, आर्मस्ट्रांग S-116 (बाएं) उड़ाते हुए।

  • आर्मस्ट्रांग ने कोरिया युद्ध में 78 मिशनों के दौरान उड़ान भरी और 121 घंटे हवा में गुजारे। इस युद्ध के दौरान उन्हें पहले 20 मिशनों के लिये 'एयर मेडल', अगली 20 के लिये 'गोल्ड स्टार' और कोरियन सर्विस मेडल मिला।
  • आर्मस्ट्रांग ने 22 की उम्र में नौसेना छोड़ी और संयुक्त राज्य नौसेना रिजर्व में 23 अगस्त 1952 को लेफ्टिनेंट (जूनियर ग्रेड) बने और अक्टूबर 1960 में यहां से सेवानिवृत्त हुए।
  • 1958 में आर्मस्ट्रांग को अमेरिकी एयर फ़ोर्स द्वारा मैन इन स्पेस सूनसेट प्रोग्राम के लिये चुना गया। इसके बाद उन्हें 1960 के नवंबर में ऍक्स-20 डाइना-सो'र के टेस्ट पायलट के रूप में और बाद में 1962 में उन सात पायलटों में चुना गया जिनके अंतरिक्ष यात्रा की संभावना थी जब इस यान की डिजाइन पूर्ण हो जाये।
  • जेमिनी 8 यान के लिये चालक दल की घोषणा 20 सितम्बर 1965 को हुई और नील आर्मस्ट्रांग को इसका कमांड पायलट और डेविड स्कोट को पायलट बनाया गया। यह मिशन 16 मार्च 1966 को लॉन्च किया गया। यह अपने समय का सबसे जटिल मिशन था, जिसमें एक मानव रहित यान एजेना पहले छोड़ा जाना था और टाइटन II, जिसमें आर्मस्ट्रांग और स्कॉट सवार थे, से इसे अंतरिक्ष में जोड़ा जाना था।

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  • जब आर्मस्ट्रांग और एल्ड्रिन लूनर मॉड्यूल में वापस लौटे, दरवाजा बंद और सील किया गया। कमांड मॉड्यूल कोलंबिया तक पहुँचने के लिये ऊपर उठने की तैयारी के दौरान उन्होंने पाया कि उनके ईंजन कको चालू करने का स्विच ही टूट चुका है। पेन के एक हिस्से के द्वारा उन्होंने सर्किट ब्रेकर को ठेल कर लॉन्च शृंखला शुरू की। इसके बाद लूनर मॉड्यूल ने अपनी उड़ान भरी और कोलंबिया के साथ जुड़ा। तीनों अंतरिक्ष यात्री वापस पृथ्वी पर आये और प्रशांत महासागर में गिरे जहाँ से उन्हें यूएसएस हौर्नेट नामक जलपोत द्वारा उठाया गया।
  • हृदय की बीमारी के चलते आर्मस्ट्रांग 7 अगस्त 2012 को बाईपास सर्जरी से गुजरे, रिपोर्ट के मुताबिक़ वे तेजी से ठीक हो रहे थे, लेकिन फिर अचानक कुछ जटिलतायें उत्पन्न हुईं और 25 अगस्त 2012 को सिनसिनाती, ओहायो में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद, व्हाईट हाउस द्वारा जारी एक सन्देश में उन्हें अपने समय के ही नहीं अपितु सार्वकालिक महान अमेरिकी नायकों में से एक बताया गया।

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  • आर्मस्ट्रांग को कई पुरस्कार और सम्मान मिले जिनमें प्रेसिडेंसियल मेडल ऑफ फ्रीडम, कांग्रेसनल स्पेस मेडल ऑफ ऑनर और कॉंग्रेसनल गोल्ड मेडल शामिल हैं। चंद्रमा पर एक क्रेटर और सौरमंडल के एक छुद्र ग्रह (एस्टेरौइड) का नामकरण उनके नाम पर किया गया है। पूरे संयुक्त राज्य में उनके नाम पर दर्जनों स्कूल और हाईस्कूल हैं और विश्व के अन्य देशों मे भी उनके नाम पर स्कूल, सड़कें और पुल इत्यादि के नाम रखे गये हैं।

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