रोजाना ढाई हजार किसान खेती छोड़ने को मजबूर, जीएसटी के बाद क्या होगा    

रोजाना ढाई हजार किसान खेती छोड़ने को मजबूर, जीएसटी के बाद क्या होगा     लखनऊ की एक महिला किसान। 

नई दिल्ली (भाषा)। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश समेत देश के लाखों किसान अपने खेत में पैदा हुई चीजों की लागत और बढ़ती महंगाई के अनुरुप न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की मांग कर रहे हैं। एक जुलाई से जीएसटी पूरे देश में लागू हो जाएगा, उसके बाद की स्थितियां और गंभीर हो सकती है। इन के बीच घाटे का सौदा होने के कारण हर रोज ढाई हजार किसान खेती छोड़ रहे हैं।

आज के वक्त गेहूं का रेट 7600 रुपए प्रति कुंतल होना चाहिए

अपनी उपज का सही मूल्य मांगते किसानों की त्रासदपूर्ण स्थिति के बीच उनकी आत्महत्या का सिलसिला जारी है। देश के जाने माने कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने कहा कि पिछले काफी समय से किसानों की आमदनी बढ़ाना और उन्हें उपज का लाभकारी मूल्य प्रदान करना एक अहम मुददा रहा है। किसान और खेती के समक्ष यह मूल समस्या है, मसलन 1970 में गेहूं 76 रुपए कुंतल था और 2015 में करीब 1450 रुपए कुंतल, यानि सिर्फ 19 गुना जबकि इस दौरान सरकारी कर्मचारियों के मूल वेतन और डीए 120 गुना बढ़ा, प्रोफेसर रैंक में 150-170 गुना और कॉर्पोरेट सेक्टर में ये बढ़ोतरी 300-1000 गुना की था। अगर उस अनुपात में किसान की तुलना करें तो गेहूं का रेट कम से कम 7600 रुपए कुंतल होना चाहिए।

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लखनऊ के करीब एक गाँव में खेत जोतता एक किसान।

देश में अभी किसानों की कोई एक परिभाषा नहीं

घाटे का सौदा होने के कारण हर रोज ढाई हजार किसान खेती छोड़ रहे हैं, और तो और देश में अभी किसानों की कोई एक परिभाषा भी नहीं है। वित्तीय योजनाओं, राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो और पुलिस की नजर में किसान की अलग-अलग परिभाषाएं हैं। ऐसे में किसान हितों से जुड़े लोग सवाल उठा रहे हैं कि गांव, खेती और किसान को बचाने के लिए क्या पहल की जा रही है।

इस बारे में पूछे जाने पर कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह ने कहा कि हम आपूर्ति श्रृंखला और खाद्यान्नों एवं शीघ्र खराब होने वाली वस्तुओं सहित सभी वस्तुओं की मूल्य श्रृंखला पर ध्यान दे रहे हैं। सभी राज्यों को जिलों की प्रमुख जिंसों की आपूर्ति श्रृंखला और मूल्य श्रृंखला तैयार करने की सलाह दी जा रही है। हमने हाल ही में मॉडल कृषि उत्पाद और पशुधन विपणन (संबद्धन और सुविधा) अधिनियम 2017 को जारी किया है। इस अधिनियम का मकसद वैकल्पिक विपणन चैनल तैयार करना है ताकि किसानों को प्रतिस्पर्धी लाभ मिल सके, इसके अलावा ई-राष्ट्रीय मंडी की पहल को भी आगे बढ़ाया गया है।

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एनएसएसओ के 2012-13 के सर्वे के अनुसार किसानों की औसत मासिक आमदनी पंजाब में 18059 रुपए, हरियाणा में 14434, बिहार में 3588 रुपए है। इस तरह अगर भारत की बात करें तो किसानों की औसत आमदनी 6426 रुपए है हालांकि इसमें सिर्फ कृषि की आय लगभग इसकी आधी है।

गांव से पलायन करने के बाद किसानों और खेतीहर मजदूरों की स्थिति यह है कि कोई हुनर न होने के कारण उनमें से ज्यादातर को निर्माण क्षेत्र में मजदूरी करनी पड़ती है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार हर रोज ढाई हजार किसान खेती छोड़ रहे हैं। भारी संख्या में गांव से लोगों का पलायन हो रहा है जिसमें से ज्यादातर किसान हैं।

जंतर मंतर पर किसानों के विषय को उठाने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता किशन पटनायक का कहना है कि खेती और किसान की वर्तमान दशा के बीच यक्ष प्रश्न यह उठ खड़ा हुआ है कि वास्तव में किसान कौन हैं, किसान की क्या परिभाषा हो? ऐसा इसलिए है कि वित्तीय योजनाओं के संदर्भ में किसान की एक परिभाषा है, तो राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो का कोई दूसरा मापदंड है, पुलिस की नजर में किसान की अलग परिभाषा है, इन सबके बीच किसान बदहाल और परेशान है और आत्महत्या करने को मजबूर है।

तमाम दुश्वारियों के बीच किसान कर रहे हैं आत्महत्या

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के पिछले पांच साल के आंकड़ों के मुताबिक साल 2009 में 17 हजार, 2010 में 15 हजार, 2011 में 14 हजार, 2012 में 13 हजार और 2013 में 11 हजार से अधिक किसानों ने खेती-बाड़ी से जुडी तमाम दुश्वारियों समेत अन्य कारणों से आत्महत्या की राह चुन ली। महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या की दर सबसे अधिक रही है।

केंद्र सरकार ने कुछ समय पहले उच्चतम न्यायालय को बताया था कि तमाम पहल के बावजूद साल 2013 से कृषि क्षेत्र में प्रति वर्ष 12 हजार से अधिक लोगों के आत्महत्याएं करने की रिपोर्ट है। साल 2014 में 12360 लोगों ने कृषि क्षेत्र में आत्महत्या की जिसमें 5650 कृषक और 6710 कृषि मजदूर शामिल हैं। इसी प्रकार से साल 2015 में 12602 लोगों ने कृषि क्षेत्र में आत्महत्या की जिसमें 8007 कृषक और 4595 कृषि मजदूर शामिल हैं।

न्यूनतम समर्थन मूल्य से मतलब उस दर से है, जो सरकार किसी खाद्यान्न (गेहूं-धान आदि) के बदले किसी किसान को भुगतान की गारंटी देती है सरकार ने गेहूं, धान गन्ना समेत कई चीजों का एमएसपी तय भी कर रखी है लेकिन वो किसान की लागत के बदले काफी कम है, जिसे लेकर पिछले कई वर्षों से किसान आंदोलनरत है।
देविंदर शर्मा, कृषि विशेषज्ञ

अपनी मांग को लेकर दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने वालों किसानों का कहना है कि (8220) किसानों की आमदनी तो छोड़िए अपनी फसल का लागत तक निकालना मुश्किल हो रहा है। कृषि उत्पाद की उपभोक्ता के स्तर पर कीमत और किसान के स्तर पर लागू कीमत में 50 से 300 प्रतिशत तक का अंतर होता है। हम कहां जाएं, क्या करें।

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उतार-चढाव के बीच कृषि विकास दर रफ्तार नहीं पकड़ रही है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2012-13 में कृषि विकास दर 1.2 प्रतिशत थी जो 2013-14 में बढ़कर 3.7 प्रतिशत हुई और 2014-15 में फिर घटकर 1.1 प्रतिशत पर आ गई। पिछले कई वर्षों में बुवाई के रकबे में 18 प्रतिशत की कमी आई है।

विशेषज्ञों के अनुसार, कई रिपोर्टों को ध्यान से देखने पर कृषि क्षेत्र की बदहाली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दो दशकों में भारी संख्या में किसान आत्महत्या कर चुके हैं और अधिकतर आत्महत्याओं का कारण कर्ज है, जिसे चुकाने में किसान असमर्थ हैं जबकि 2007 से 2012 के बीच करीब 3.2 करोड़ गांव वाले जिसमें काफी किसान हैं, शहरों की ओर पलायन कर गए हैं, इनमें से काफी लोग अपनी जमीन और घर-बार बेच कर शहरों में आ गए।

गांव से पलायन को मजबूर किसान : गोविंदाचार्य

जाने माने चिंतक के एन गोविंदाचार्य ने कहा कि गांव और किसानों की स्थिति आज बेहद खराब है, पंचायती राज व्यवस्था के इतने साल बीत जाने के बाद भी लोग गांव से पलायन करने को मजबूर है जबकि खेती के प्रति रुझान लगातार कम हो रहा है। उन्होंने कहा कि इसका कारण पंचायतों का वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर नहीं होना है, ऐसे में केंद्रीय बजट का 7 प्रतिशत सीधे गांव को दिया जाए ताकि गांव में संसाधन विकसित किए जा सकें।

किसानों के लिए संकट की बात यह है कि पूरी दुनिया में अनाज के भाव कम हुए हैं, ऐसे में उत्पादन घटने के बावजूद भारत में फसल के दाम बढ़ने की उम्मीद नहीं है, अगर उत्पादन घटेगा तो किसानों को आर्थिक तंगी का सामना करना पडेगा और यह किसान की समस्याओं को और बढ़ा सकता है।

‘खेती किसानी का खर्च बढ़ा पर किसानों की आमदनी कम हुई’

बुंदेलखंड विकास आंदोलन के आशीष सागर ने कहा कि खेती किसानी का खर्च बढ़ा है लेकिन किसानों की आमदनी कम हुई है जिससे किसान आर्थिक तंगहाली के दुष्चक्र में पड़ गया है। किसानों की आय राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। ऐसे में भी किसान सरकार से किसी वेतनमान की मांग नहीं कर रहा है बल्कि वह तो अपनी फसलों के लिए उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य मांग रहा है ताकि देश के लोगों के साथ अपना पेट भी ठीक से भर सके।

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