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किसी ने पूरे दिन खाना नहीं खाया, किसी ने खाने में की कटौती, लॉकडाउन में 68 % ग्रामीणों ने झेलीं खाने-पीने में मुश्किलें : गाँव कनेक्शन सर्वे

कोविड-19 लॉकडाउन के चलते भारत ने कारोबार बंदी के साथ माइग्रेशन का जो दर्द झेला, उसने देश की आर्थिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया। गांव कनेक्शन रुरल इनसाइट ने 23 राज्यों के 179 जिलों में 25,371 व्यक्तियों का इंटरव्यू कर ये जानने की कोशिश की, कि लॉकडाउन का उनके जीवन पर क्या असर पड़ा। सीरीज के इस हिस्से में बात लॉकडाउन के दौरान ग्रामीणों को खाने-पीने की हुईं मुश्किलों पर ...

Kushal MishraKushal Mishra   25 Aug 2020 9:28 AM GMT

किसी ने पूरे दिन खाना नहीं खाया, किसी ने खाने में की कटौती, लॉकडाउन में 68 % ग्रामीणों ने झेलीं खाने-पीने में मुश्किलें : गाँव कनेक्शन सर्वे

किसी ने पूरे दिन खाना नहीं खाया तो किसी ने थाली में से खाने की चीजों में कटौती की, कोरोना आपदा के समय पूर्ण लॉकडाउन में ग्रामीणों को खाने-पीने की चीजों के लिए कई मुश्किलों से जूझना पड़ा।

"सरकार हमें कुछ नहीं दिए, राशन के लिए गए तो जाति (प्रमाण पत्र) का मांगते हैं, हम लॉकडाउन में जाति बनवाई फिरें, न मिट्टी का तेल मिले, न गेहूं मिले, न चावल मिले, दो चार खेत बाड़ी हैं वहां न जाओ, कोरोना लगा दिया, कोरोना के चक्कर में तो हम गरीब भूख से मर गए," अपने घर के बाहर गलियारे में अँधेरे में बैठीं मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में करिगी गाँव की भगवती पनिका (47 वर्ष) कहती हैं।

कोरोना के कारण देश में लॉकडाउन लगने से 24 मार्च को अचानक सब कुछ बंद हो गया। देश की करीब 130 करोड़ की जनता अपने घरों में कैद हो गई। चालीस दिनों के इस पूर्ण लॉकडाउन में सरकार ने जनता के लिए मुफ्त में राशन मुहैया कराने की बात कही, मगर बड़े-बड़े शहरों से इतर ग्रामीण भारत में किए गए गाँव कनेक्शन के सबसे बड़े सर्वे में जो आंकड़े सामने आये, वो बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान देश के ग्रामीणों के सामने भुखमरी जैसे हालात बने, सरकारी घोषणाओं के बावजूद ग्रामीणों ने खाने-पीने की चीजों के लिए कहीं ज्यादा कठिनाइयाँ झेलीं।

सर्वे के मुताबिक देश के 68 प्रतिशत ग्रामीणों ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें खाने-पीने की चीजों के लिए मुश्किलें उठानी पड़ीं। इतना ही नहीं, लॉकडाउन के समय में इन ग्रामीणों के परिवार के लोगों को कई बार खाना न मिलने की वजह से भूखे पेट सोना पड़ा।


मध्य प्रदेश से लगभग 950 किलोमीटर दूर बिहार के कठिहार जिले की चित्तौरिया ग्राम पंचायत में हालात और भी ज्यादा भयावह दिखे। यह क्षेत्र आलू उत्पादन के लिए जाना जाता है। लॉकडाउन के सिर्फ एक हफ्ता बीतने के बाद यहाँ के ग्रामीण मजदूरों के पास खाने के लिए कुछ नहीं बचा तो उन्हें मजबूरन आलू उबाल कर खाने पड़े।

इस ग्राम पंचायत के प्रधान जितेन्द्र पासवान 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "ये लोग गाँव में मजदूरी करते हैं, लॉकडाउन में सब बंद हो गया तो इन्हें कोई काम नहीं मिला, ये आलू उबाल कर खाने के लिए मजबूर हुए, जब मैंने खुद जाकर देखा तो बहुत दुःख हुआ, हम लोगों ने उन्हें राशन-पानी मुहैय्या कराया, मगर स्थिति बहुत ही भयावह थी। ये लोग भुखमरी के कगार पर थे।"

देश में लॉकडाउन की घोषणा के बाद केंद्र सरकार ने 25 मार्च को खाद्य सुरक्षा कानून के तहत देश के 80 करोड़ लोगों को तीन महीने का एडवांस राशन मुफ्त में दिए जाने की घोषणा भी की। सरकार ने मासिक कोटे में प्रति व्यक्ति दो किलोग्राम सीमा बढ़ाकर सात किलोग्राम खाद्यान्न देने का फैसला किया और सभी राज्यों को पीडीएस यानी सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये केंद्र से खाद्यान्न लेने के लिए कहा। इसके बावजूद देश के अलग-अलग राज्यों में बड़े स्तर पर ग्रामीणों को राशन नहीं मिला और उन्हें अपने परिवार के लिए खाने-पीने की चीजों का इंतजाम करने के लिए काफी मुसीबतें झेलनी पड़ीं।

अलग-अलग राज्यों पर गौर करें तो यह तस्वीर और साफ़ होती नजर आती है। गाँव कनेक्शन सर्वे में सामने आया कि लॉकडाउन के दौरान जम्मू-कश्मीर-लद्दाख, उत्तराखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और हरियाणा में ग्रामीणों को खाने-पीने का इंतजाम करने के लिए सबसे ज्यादा दिक्कतें उठानी पड़ीं।


केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की बात करें तो यहाँ 56 प्रतिशत ग्रामीणों ने खाने-पीने के लिए सबसे ज्यादा मुश्किलें झेलीं। लॉकडाउन के दौरान बड़े स्तर पर ग्रामीणों को राशन नहीं मिल सका।

जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर जिले में हजरतबल गाँव में मो. रियाज मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालते हैं। गाँव कनेक्शन ने सर्वे के दौरान जब उनसे बात की तो वह सरकार से बेहद निराश नजर आये।

"मैं दिहाड़ी मजदूर हूँ, लॉकडाउन में काम नहीं मिला तो खाने-पीने की बहुत परेशानी हुई, चावल वगैरह कुछ भी हम लोगों को नहीं मिला, भूखे रह गए, किसी ने कोई मदद नहीं किया," मो. रियाज कहते हैं।

वास्तव में लॉकडाउन के दौरान देश के ग्रामीणों को अपने परिवार के लिए भोजन का प्रबंध करना बेहद मुश्किल रहा। अलग-अलग राज्यों में जो आंकड़ें सामने आये तो बताते हैं कि सिर्फ केरल छोड़कर सभी राज्यों में आधे से ज्यादा ग्रामीणों को लॉकडाउन के दौरान खाने-पीने का इंतजाम करने के लिए खासा दिक्कतें झेलनी पड़ीं।

लॉकडाउन का असर देश के हर इंसान पर पड़ा। सब कुछ बंद हो जाने से हर वर्ग के लोग इससे प्रभावित हुए, मगर देश के गरीब तबके के लिए यह कहीं चुनौतीपूर्ण था। गरीब और मजदूर वर्ग के लोगों पर लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार पड़ी।

सर्वे के अनुसार लॉकडाउन के दौरान भोजन की व्यवस्था करने में 76 प्रतिशत गरीब परिवारों को कहीं ज्यादा मुश्किलें आईं, जबकि निम्न वर्ग के ग्रामीण परिवारों में यह आंकड़ा 68 प्रतिशत रहा, अमीर और मध्य परिवारों की तुलना में कहीं ज्यादा। ये आंकड़ें बताते हैं गरीब परिवारों के सामने भुखमरी जैसे हालात बने और लॉकडाउन के दौरान ऐसी भयावह तस्वीरें भी सामने आईं।


झारखण्ड के लातेहार जिले के हेसातू गाँव में लॉकडाउन के दौरान 16 मई को एक मजदूर वर्ग के परिवार में पांच साल की बच्ची की मौत हो गई। तब प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ ने आरोप लगाया कि जिस परिवार में बच्ची की मौत हुई है उस घर में दो दिन से चूल्हा नहीं जला था क्योंकि उस घर में अनाज का एक दाना नहीं था।

अपनी बच्ची को खोने वाली माँ कलावती के पति जगलाल भुइंया शहर में ईंट-भट्टे में मजदूरी करते थे और लॉकडाउन की वजह से वह गाँव नहीं लौट सके थे। उस वक़्त कलावती के घर में दो कमरों के अलावा एक टूटा छप्पर पड़ा हुआ था और उसमें भी बड़ा सा छेद था। घर में कुछ बर्तन, बिस्तर और एक फटा हुआ मच्छरदानी के अलावा कुछ भी नहीं था।

तब कलावती ने बताया, "हम डोकी पंचायत की मुखिया पार्वती देवी के पास कई बार राशन लेने के लिए गए लेकिन राशन नहीं मिला। मुखिया के पति ने कहा कि तुम लोग के लिए राशन नहीं है।" वहीं मुखिया पार्वती देवी के पति गोपाल उरांव का कहना था, "राशन नहीं दिया था क्योंकि मेरे पास जो बजट था, वो खत्म हो गया था। जब आवंटन ही नहीं था तो कैसे देते?"

असल में मुफ्त राशन के लिए सरकार की घोषणाओं के बावजूद जिनके पास राशन कार्ड नहीं था उन परिवारों की अधिकाँश आबादी को लॉकडाउन के दौरान भोजन का इंतजाम करने के लिए काफी दिक्कतें उठानी पड़ीं, इनमें भी गरीब परिवारों को तो सबसे ज्यादा।

गाँव कनेक्शन सर्वे में यह भी सामने आया कि ग्रामीण भारत के जिन गरीब परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं था, उनमें 70 प्रतिशत गरीबों को लॉकडाउन के दौरान खाने-पीने की चीजों के लिए काफी मुश्किलें आईं।


उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में हरिपुर गाँव की नीरज किसी तरह मजदूरी करके अपने बच्चों का पालन पोषण करती हैं। मजदूरी मिलने के बाद भी उनके लिए बच्चों को पालना काफी मुश्किल था। मगर लॉकडाउन ने न सिर्फ नीरज का काम बंद कर दिया, बल्कि उन्हें सरकार से भी राशन नहीं मिल सका।

नीरज 'गाँव कनेक्शन' से बताती हैं, "मजदूरी करते थे तो 100-150 रुपये मिलता था, उसमें ही बच्चों का भी खर्चा करना पड़ता था, मजदूरी करते हैं तो भी खर्चा नहीं पूरा होता था," क्या लॉकडाउन में सरकार से राशन में गेहूं या चावल मिला, के सवाल पर नीरज कहती हैं, "कुछ नहीं, गल्ला (राशन) नहीं मिलता, तीन साल हम राशन कार्ड के लिए गुहार लगा रहे, हमने शिकायत भी की लेकिन इन लोगों ने सुना ही नहीं। कोई राशन नहीं मिला।"

सरकार की घोषणाओं से इतर लॉकडाउन के दौरान गरीबों और जरूरतमंदों तक राशन पहुँचाने के लिए गैर सरकारी संगठन यानी एनजीओ भी सक्रिय रहे। देश की कई एनजीओ ने कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान राशन वितरण करने के साथ बनी-बनाई भोजन सामग्री भी बांटी, मगर इसके बावजूद गांवों में रहने वाली देश की 70 प्रतिशत ग्रामीण जनता के लिए 40 दिनों के पूर्ण लॉकडाउन के दौरान यह राशन अपर्याप्त दिखाई दिया।

गाँव कनेक्शन सर्वे में यह भी सामने आया कि जिन्हें सरकार और एनजीओ के जरिये लॉकडाउन में राशन मिला, उन्हें भी राशन के लिए मुश्किलों का ख़ासा सामना करना पड़ा। यानी जिनको सरकार से चावल या गेहूं बड़ी मुश्किल से मिला, उनमें भी 69 प्रतिशत लोगों के लिए इतना राशन अपर्याप्त था। जबकि जिनको एनजीओ से राशन बड़ी मुश्किल से मिल सका, उनमें भी 74 प्रतिशत लोगों के लिए राशन अपर्याप्त था।


सर्वे के दौरान ओडिशा के बोलांगिर जिला में मधियापाली गाँव में रहने वाली अनीता बारीक़ 'गाँव कनेक्शन' से बताती हैं, "सरकार जो भी पांच किलो चावल राशन के रूप में हमें दे रही है, वह मेरे घर और परिवार के लिए काफी नहीं है। मेरा एक बड़ा परिवार है। मैं सिर्फ पांच किलो चावल के साथ परिवार की देखभाल कैसे कर सकती हूं?"

ऐसा ही हाल ओडिशा से करीब 410 किलोमीटर दूर झारखण्ड के ग्रामीणों के साथ भी था। झारखण्ड के पलामू जिले के लीलिगंज गाँव की ममता देवी कहती हैं, "लॉकडाउन में सरकार अपना काम कर रही है। हमें चावल दे रही है। कभी-कभी उसके बाद भी हमें घर पर चावल की जरूरत होती है। हमें और चाहिए, मगर घर पर चावल नहीं होता। हम क्या करें।"

लॉकडाउन के दौरान गुजरात के गांवों में नरेगा संघर्ष मोर्चा की ओर से भी जरूरतमंदों तक राशन पहुँचाने का काम किया गया। इक्कीस दिनों के पहले चरण में गांवों में राशन वितरण के दौरान गुजरात से नरेगा संघर्ष मोर्चा से जुड़े निखिल शिनॉय ने बताया, "लॉकडाउन के दो हफ्ते से ज्यादा दिन बीत चुके हैं मगर अभी भी कई गांव ऐसे हैं जहां अभी तक सरकारी मदद नहीं पहुंच सकी है। कई गांव में लोगों को राशन नहीं मिला है, हम कोशिश कर रहे हैं कि कम से कम उन तक सूखा राशन पहुंचाया जाए, मगर लॉकडाउन बढ़ता है तो इनकी मुश्किलें और भी बढ़ जाएँगी।"

और इन ग्रामीणों के लिए मुश्किलें बढीं भी, देश में लॉकडाउन अगले 19 दिनों के लिए और बढ़ा दिया गया। ऐसे में कई ऐसे ग्रामीण परिवार रहे जिन्हें घर में उपलब्ध राशन के अनुसार अपने भोजन में कटौती करनी पड़ी, चाहे वो खाने में एक-चीजें हटाने के रूप में हों, या फिर पूरा दिन बिना कुछ खाए गुजारा करने के रूप में।

पूर्ण लॉकडाउन के बाद ग्रामीण भारत पर किये गए गाँव कनेक्शन के सबसे बड़े सर्वे में यह भी सामने आया कि हर आठ ग्रामीण परिवारों में से एक ने अक्सर पैसे और संसाधनों की कमी के कारण लॉकडाउन के दौरान पूरे दिन बिना खाना खाए गुजारा करने की बात स्वीकारी।

सर्वे में सामने आया कि लॉकडाउन के दौरान 17 % ग्रामीणों को या उनके परिवार के किसी सदस्य को भोजन में से एक-दो खाने की चीजों में कई बार कटौती करनी पड़ी। इतना ही नहीं, 12 % ग्रामीणों को लॉकडाउन के दौरान एक वक़्त का खाना कई बार छोड़ना पड़ा, जबकि इतने ही प्रतिशत ग्रामीणों को लॉकडाउन में कई बार पूरे दिन बिना कुछ खाए गुजरना पड़ा।

बिहार के नवादा जिले के नवादा ब्लॉक की रहने वाली नुसरत जहाँ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बच्चे भूखे पेट न सोयें इसलिए नुसरत ने खुद कुछ भी नहीं खाया। मगर उन्हें लॉकडाउन के दौरान ऐसे भी दिन देखने पड़े जब उनके बच्चों को भी भूखे पेट सोना पड़ा।

सर्वे के दौरान नुसरत जहाँ 'गाँव कनेक्शन' से बताती हैं, "हमें कहीं से कोई मदद नहीं मिली, हमें दो दिन भूखे रहना पड़ा, बाल-बच्चे ऐसे भूखे ही रात काट काट कर सो गए।"

सर्वे के अलग-अलग राज्यों के आंकड़ों पर गौर करें तो यह तस्वीर और भी बड़ी नजर आती है। पर्याप्त राशन न होने की वजह से लॉकडाउन के दौरान ग्रामीणों को कई बार बिना कुछ खाए ही पूरा दिन गुजारना पड़ा। ऐसे दिन बिताने वालों में हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश के ग्रामीण सबसे ज्यादा रहे।

हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश में 41-41 %, असम में 34 %, पश्चिम बंगाल में 18 %, गुजरात में 16 %, झारखण्ड और ओडिशा में क्रमशः 15 और 14 प्रतिशत ग्रामीणों को लॉकडाउन के दौरान कई बार पूरा दिन बिना कुछ खाए बिताना पड़ा।

झारखण्ड में यह प्रतिशत 15 प्रतिशत रहा, यानी 15 % ग्रामीणों को कई बार बिना कुछ खाए ही दिन बिताना पड़ा। यह उनके लिए कहीं ज्यादा कठिन समय रहा जिनका परिवार बड़ा था।

"किसी तरह, हम अपने बच्चों को बचा रहे हैं और सिर्फ चावल पर रह रहे हैं। हम लगभग भूखे रहने की कगार पर हैं। मेरे दो ब्च्चे हैं। मुझे उनका भी ध्यान रखना है," झारखण्ड के पलामू जिले के पथराही गाँव की अंशु कुमारी कहती हैं।

झारखण्ड से इतर जम्मू-कश्मीर में श्रीनगर के गाँव हजरतबल के मो. रियाज कहते हैं, "वास्तव में लॉकडाउन के दौरान भोजन एक बहुत बड़ी समस्या थी। लॉकडाउन में हमें खाने-पीने के लिए बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ा। चावल नहीं, कुछ नहीं, हम भूखे रह गए।"

देश में लॉकडाउन के दौरान भूख से लड़ाई ग्रामीणों के लिए एक बड़ी चुनौती थी। सरकार की ओर से मदद न मिलने पर गरीब और जरूरतमंद ग्रामीणों के लिए सिर्फ पड़ोसी ही सहारा थे। अनाज-तेल के लिए ऐसे ग्रामीणों को अपने पड़ोसियों के सामने हाथ फैलाने पड़े।

गाँव कनेक्शन सर्वे में यह भी सामने आया कि असम में 26%, मध्य प्रदेश में 23 %, ओडिशा में 21 % और उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में 20-20 % ग्रामीणों को लॉकडाउन के दौरान अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए पड़ोसियों से अनाज-तेल आदि माँगना पड़ा।

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि देश की आधी से ज्यादा आबादी जहाँ गांवों में बसती है, लॉकडाउन उनके लिए कहीं ज्यादा मुश्किलों में बीता। काम-धंधा सब बंद हो गया, सरकारी कोटे से राशन लेने के लिए भी ग्रामीणों ने काफी मुश्किलें झेलीं, जिनके पास राशन कार्ड था उन्होंने ने भी, और जिनके पास राशन कार्ड नहीं था, उन ग्रामीणों ने भी। सरकार ने राशन मुहैय्या करवाया और ग्रामीणों को काफी हद तक राशन मिला भी, इसके बावजूद उनके परिवार के लिए राशन काफी नहीं था और उन्हें फिर भी खाने-पीने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी।

लॉकडाउन में खाने-पीने और राशन की मुश्किलों को लेकर गाँव कनेक्शन सर्वे के निष्कर्ष यहीं खत्म नहीं होते। और भी बहुत से कारण रहे जिससे ग्रामीणों को खाने-पीने की दिक्कतों का सामना किया।

गाँव कनेक्शन सर्वे के अन्य नतीजे ...

खाने-पीने की चीजों तक पहुँच में लॉकडाउन के दौरान बनाये गए रेड, ऑरेंज और ग्रीन जोन का भी असर देखने को मिला। उम्मीद के मुताबिक यह असर रेड जोन जिलों में कहीं ज्यादा था।

गाँव कनेक्शन सर्वे के मुताबिक ऑरेंज जोन के जिलों में एक तिहाई और ग्रीन जोन के जिलों में एक-चौथाई ग्रामीणों को भोजन संबंधी चीजों के लिए बहुत कठिनाई हुईं, जबकि यही आंकड़ा रेड जोन के जिलों में दो-पांच का रहा, यानी हर पांच में से दो लोगों को भोजन के लिए बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ा, सरल शब्दों में रेड जोन जिलों के 76 प्रतिशत ग्रामीणों को लॉकडाउन के दौरान खाने के लिए खासा परेशानियां झेलनी पड़ी।

सर्वेक्षण की पद्धति

भारत के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन ने लॉकडाउन का ग्रामीण जीवन पर प्रभाव के लिए कराए गए इस राष्ट्रीय सर्वे को दिल्ली स्थित देश की प्रमुख शोध संस्था सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के लोकनीति कार्यक्रम के परामर्श से पूरे भारत में कराया गया।

देश के 20 राज्यों, 3 केंद्रीय शासित राज्यों के 179 जिलों में 30 मई से लेकर 16 जुलाई 2020 के बीच 25,371 लोगों के बीच ये सर्वे किया गया।

ये पूरा सर्वे गांव कनेक्शन के सर्वेयर द्वारा गांव में जाकर फेस टू फेस एप्प के जरिए मोबाइल पर डाटा लिया गया। इस दौरान कोविड गाइडलाइंस (मास्क, उचित दूरी, हैंड सैनेटाइजर) आदि का पूरा ध्यान रखा।

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