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गांव कनेक्शन सर्वे: लॉकडाउन के दौरान 71 फीसदी राशनकार्ड धारकों को मिला मुफ्त राशन

लॉकडाउन होते ही सरकार ने लोगों के लिए मुफ्त राशन की घोषणा की थी ताकि किसी को काम या पैसे के अभाव में बिना राशन के भूखे पेट ना सोना पड़ा। सरकार की इस योजना का गरीबों को लाभ होता दिखा और लगभग 71 फीसदी राशन कार्डधारकों ने कहा कि उन्हें मुफ्त राशन मिला। हालांकि जिनके पास राशन कार्ड नहीं थे, उनमें से लगभग तीन चौथाई (73 फीसदी) लोग इस योजना से वंचित रह गए।

Daya SagarDaya Sagar   25 Aug 2020 11:57 AM GMT

गांव कनेक्शन सर्वे: लॉकडाउन के दौरान 71 फीसदी राशनकार्ड धारकों को मिला मुफ्त राशन

"अगर मुफ्त राशन नहीं मिलता तो कई लोग महामारी से पहले भूखमरी से मर जाते।" ऐसा कहना है सुधीर बाजपेयी (48 वर्ष) का जो उत्तर प्रदेश के बहराईच जिले के रहने वाले हैं। सुधीर बाजपेयी प्रवासी मजदूर हैं, जो लॉकडाउन के दौरान हरियाण के वल्लभगढ़ औधोगिक क्षेत्र से अपने परिवार सहित अपने गांव लौट आए थे। वह कहते हैं कि अगर उन्हें सरकार की तरफ से मुफ्त राशन और उनकी पत्नी को जनधन योजना के तहत 500 रूपये खाते में नहीं आते, तो लॉकडाउन के दौरान परिवार का गुजारा करना बहुत मुश्किल हो जाता।

कुछ ऐसी ही बात झारखंड की पलामू जिले पथराही गांव की अंशु कुमारी भी कहती हैं। "मोदी सरकार की वजह से हमें हर महीने 18 किलो चावल मिल रहा है, जिसकी वजह से लॉकडाउन काटने में हमें बहुत आसानी हुई, नहीं तो काफी मुश्किल हो जाता," वह कहती हैं।

कोरोना महामारी के कारण मार्च के अंत में लगाए गए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन का सबसे अधिक प्रभाव गरीब और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों पड़ पड़ा। लाखों लोगों का रोजगार छूट गया और करोड़ों लोग बड़े-बड़े शहरों को छोड़कर अपने घर लौट आए। ऐसे में रोज कमाकर खाने वाले लोगों के लिए सबसे बड़ी संकट राशन की उपजी। लोगों का कहना था कि अगर उन्हें पर्याप्त राशन मिले, तो वे जहां हैं, वहीं रहेंगे और फिर लॉकडाउन तोड़कर इधर-उधर या गांव जाने की जरूरत नहीं होगी।

सरकार ने भी इस जरूरत को देखते हुए लॉकडाउन लागू होने के कुछ दिनों बाद 'प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना' के तहत सार्वजनिक राशन वितरण प्रणाली के माध्यम से प्रत्येक परिवार में प्रति व्यक्ति के हिसाब से 5 किलोग्राम अतिरिक्त चावल या गेहूं और एक किलोग्राम अतिरिक्त दाल मुफ्त देने की घोषणा की। इस योजना को बढ़ाकर अब नवंबर तक कर दिया गया है।

इस योजना का प्रभाव भी लोगों में देखने को मिला और भारत के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया प्लेटफॉर्म गांव कनेक्शन द्वारा कराए गए सर्वे के अनुसार लगभग 63 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें लॉकडाउन के दौरान मुफ्त राशन मिला। इन 63 फीसदी लोगों में वे लोग भी शामिल हैं, जिनके पास राशन कार्ड नहीं था।


यह सर्वे देश के 20 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों के 179 जिलों में 25,000 से ज्यादा ग्रामीणों के बीच हुआ। 30 मई से 16 जुलाई के बीच चले इस सर्वे में ग्रामीणों ने लॉकडाउन से उपजे हालात को गांव कनेक्शन के साथ साझा किया।

अगर हम सिर्फ राशन कार्ड धारकों की बात करें तो 71 फीसदी राशन कार्ड धारकों ने कहा कि उन्हें लॉकडाउन के दौरान सरकारी मुफ्त योजना का लाभ मिला। हालांकि जिनके पास राशन कार्ड नहीं थे, उनमें से सिर्फ 27 फीसदी लोगों को ही इस मुफ्त राशन योजना का लाभ मिल पाया।

गौरतलब है कि तमाम मानवाधिकार संगठनों और अर्थशास्त्रियों की मांग पर सरकार ने राशन को यूनिवर्सलाइज करते हुए सबके लिए राशन की घोषणा की थी। इसमें वे लोग भी शामिल थे, जिनके पास राशन कार्ड नहीं था या जिनका राशन कार्ड गांव में था और वे शहरों में थे।


कुछ राज्य सरकारों जैसे दिल्ली, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान और उत्तर प्रदेश ने गैर-राशन कार्डधारकों के लिए अस्थायी राशन कार्ड या ई-कूपन की भी व्यवस्था की ताकि उन्हें मुफ्त राशन योजना का लाभ मिल सके।

इस सर्वे में लोगों से यह भी पूछा गया कि क्या सरकार के ये उपाय भोजन की कमी को पूरा करने के लिए पर्याप्त थे? इस पर आम लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रिया प्राप्त हुई। कई लोग इससे काफी खुश नजर आएं, वहीं कई लोगों ने राशन में सिर्फ चावल मिलने के कारण अपनी नाराजगी भी जताई।

राजस्थान के बूंदी जिले की नयागांव की आरती बाई को लॉकडाउन के दौरान जन-धन खाते में 500 रूपये, मुफ्त एलपीजी सिलेंडर और राशन में मुफ्त गेहूं मिला और इससे वह काफी खुश नजर आईं। उन्हीं के पड़ोसी रंगलाल भी सरकार की मुफ्त एलपीजी और मुफ्त राशन योजना से संतुष्ट नजर आए जिसके कारण उनके परिवार को भोजन की व्यवस्था करने और उसे बनाने में कोई दिक्कत नहीं आई। वह कहते हैं, "पहले हमें यह राशन 2 रूपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से मिलता था, अब यह मुफ्त मिल रहा है। यह और अच्छी बात है।"

मध्य प्रदेश के सतना जिले के सोहावल क्षेत्र के जमोड़ी गांव के रामदयाल साकेत भी कहते हैं कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें हर महीने सरकारी दुकान से पर्याप्त गेहूं, चावल मिलता रहा जिससे परिवार में खाने-पीने की कोई दिक्कत नहीं हुई।

हालांकि मध्य प्रदेश के छत्तरपुर जिले के नौगांव क्षेत्र के मनकारी गांव के हेमराज राशन ना मिलने की शिकायत करते हैं। वह कहते हैं कि जब भी वह राशन की दुकान पर राशन लेने जाते थे, राशन वाला उन्हें साफ मना कर देता था। " 'जाओ, जिससे शिकायत करना हो कर आओ, मैं देख लूंगा,' राशन वाला कहता है। हमने कुछ लोगों ने मिलकर शिकायत भी की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई" हेमराज बताते हैं।

गांव कनेक्शन ने अपने सर्वे में पाया कि राशन ना मिलने की दिक्कत उन लोगों को अधिक हुई, जिनके पास राशन कार्ड नहीं था। इस सर्वे के अनुसार 25,371 उत्तरदाताओं में 83 फीसदी लोग ऐसे थे, जिनके पास राशन कार्ड था। इनमें से 71 फीसदी लोगों को राशन मिला, जबकि 29 फीसदी लोगों की एक बड़ी संख्या भी ऐसी थी, जिन्हें राशन कार्ड होने के बावजूद भी मुफ्त राशन की सुविधा नहीं मिली।


वहीं सर्वे में करीब 17 फीसदी लोग ऐसे भी थे, जिनके पास राशन कार्ड नहीं था। इनमें से महज एक चौथाई (27 फीसदी) लोगों को ही मुफ्त राशन की सुविधा मिल सकी। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के कापसेहड़ा इलाके में बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और उत्तराखंड से आए प्रवासी मजदूर अपने परिवार के साथ रहते हैं। लॉकडाउन के दौरान उन परिवारों को बहुत ही मुश्किलों का सामना करना पड़ा, जिनके पास दिल्ली का राशन कार्ड नहीं था।

हालांकि केजरीवाल सरकार ने राशन कार्ड न होने पर ई कूपन की व्यवस्था की थी, इसके तहत राशन कार्ड ना होने पर तीन महीने तक फ्री राशन देने का ऐलान दिल्ली सरकार ने किया था। लेकिन यह ई-कूपन ऑनलाइन निकल रहा था, जिसे जनरेट करने में प्रवासी मजदूरों को बहुत दिक्कत हुई।

एक ऐसे ही मजदूर इंद्रजीत बताते हैं, "मैंने पिछले महीने (अप्रैल) ही राशन के ई-कूपन के लिए आवेदन कर दिया था लेकिन मुझे अभी तक ई-कूपन नहीं मिला है। अब हमारे सामने राशन की समस्या आ गई है और हम आधे पेट सोने को मजबूर हैं।"

अररिया (बिहार) के बिशनपुरा गांव की फूल कुमारी बताती हैं कि उन्हें राशन नहीं मिला, क्योंकि उनके पास राशन कार्ड नहीं था। हालांकि वह खुश दिखीं क्योंकि उनके जन-धन खाते में पैसा आया है। वह स्थानीय मैथिली भाषा में कहती हैं, "हमारे खाते में 500 आया, हम ओसे खुश छे।"

मध्य प्रदेश के अनूपपूर की भगवती पनिका कहती हैं, "लॉकडाउन के दौरान सरकार कह रही थी घर से बाहर मत निकलो, लेकिन हम गरीब घर से बाहर नहीं निकलेंगे तो खाएंगे क्या? भूख से ही मर जाएंगे।" भगवती ने भी गांव कनेक्शन सर्वे टीम को बताया कि उनके पास भी राशन कार्ड नहीं है, इस वजह से उन्हें राशन नहीं मिला। "अगर हम सोसायटी के दुकान (राशन दुकान) पर जाते हैं, तो वे लोग हमसे राशन कार्ड, जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र जैसे कई कागज मांगते हैं," भगवती कहती हैं।

इस सर्वे में यह भी पता चला कि उन जिलों में लोगों को मुफ्त राशन लेने में अधिक दिक्कत हुई जो लोग रेड जोन में थे। सर्वे के मुताबिक जहां ग्रीन जोन में 77 फीसदी लोगों को मुफ्त राशन मिला, वहीं रेड जोन में रहने वाले सिर्फ 60 फीसदी लोगों को ही यह सुविधा मिल पाई। जबकि ऑरेन्ज जोन में रहने वाले 70 फीसदी लोगों को राशन मिला। ये जोन भारत सरकार के एक मई, 2020 के शासनादेश के अनुसार निर्धारित किए गए थे।


इस सर्वे के अनुसार मुफ्त राशन की सुविधा का लाभ उन लोगों ने सबसे अधिक लिया जो निम्न आय वाले परिवारों से संबंधित थे। ऐसे परिवारों की संख्या 75 फीसदी थी। वहीं 73 फीसदी गरीब परिवारों को भी इसका लाभ मिला। सर्वे में यह भी देखा गया कि अमीर परिवारों ने लॉकडाउन के दौरान मुफ्त राशन लेने में रूचि नहीं दिखाई और सिर्फ 50 फीसदी ही अमीर राशनकार्ड धारक लोग राशन लेने के लिए घर से बाहर निकले।

वहीं जिनके पास राशन कार्ड नहीं था, उनमें सिर्फ 28 फीसदी गरीब परिवारों और 33 फीसदी निम्न आय वाले परिवारों को मुफ्त राशन का लाभ मिल सका। यही कारण है कि लगभग 70 फीसदी गरीब परिवारों और 60 फीसदी निम्न आय वाले परिवारों को लॉकडाउन के दौरान भोजन की दिक्कत हुई। मध्यमवर्ग भी इससे अछूता नहीं रहा और इस वर्ग से संबंध रखने वाले लगभग 54 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें लॉकडाउन के दौरान खाने-पीने की दिक्कतें हुईं।


अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों का कहना है कि अगर उनके द्वारा सुझाए गए पीडीएस सिस्टम को सरकार समय से सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) बना देती और 'वन नेशन वन राशन' स्कीम समय से लागू हो जाता, तो यह संख्या कुछ कम हो सकती थी।

गौरतलब है कि कई गैर-लाभकारी संस्थाओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अर्थशास्त्रियों ने लॉकडाउन के शुरूआती दिनों में ही मांग की थी कि संकट के इस समय में राशन वितरण को एक साल के लिए गरीबों को मुफ्त कर देना चाहिए। इसमें राशन कार्ड की अनिवार्यता को भी खत्म किया जाना चाहिए ताकि किसी को भूखे पेट ना सोना पड़े।

"सरकार को गरीबों और प्रवासी कामगारों के लिए तत्काल मुफ्त राशन उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसके लिए उनसे किसी तरह के पहचान पत्र या निवास प्रमाणपत्र दिखाने को नहीं कहा जाए। केंद्र और राज्य सरकारों ने जो राहत कि घोषणा की है वह उन्हीं लोगों के लिए है जिनके पास राशन कार्ड है। प्रवासी कामगारों के पास उस शहर में राशन कार्ड नहीं होता जहां वे काम करते हैं," यह मांगपत्र में कहा गया था।

हालांकि इसके बाद सरकार ने सबके लिए मुफ्त राशन की घोषणा की थी, इसमें वे लोग भी शामिल थे जिनके पास राशन कार्ड नहीं था या जो अपने परिवार से दूर बिना राशन कार्ड के अकेले रहते थे। हालांकि हमारे सर्वे में बिना राशन कार्ड के लोगों को यह लाभ बहुत कम मिलता हुआ दिखा। शायद इसके लिए स्थानीय स्तर पर कोटेदारों का भ्रष्टाचार कहीं ना कहीं जिम्मेदार है, जो कि सामान्य दिनों में भी राशन की बचत कर उसे बाजार में बेचते हैं।

उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले के मोहल्ला चौहट्टा में प्राइवेट शिक्षक के रूप में काम करने वाले अभय शुक्ल (32 वर्ष) ने बताया कि उन्होंने राशन कार्ड के लिए अपने वार्ड के सभासद से कई बार कहा, लेकिन उन्हें अस्थायी राशन कार्ड भी नहीं जारी किया गया। वह कहते हैं, "कार्ड ना होने के कारण कोटेदार राशन नहीं देता, जबकि मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री का सख्त आदेश है कि महामारी के इस दौर में सबको राशन उपलब्ध हो। मैं ही नहीं, मेरे जैसे शहर के कई जरूरतमंदों को लाभ नहीं मिला रहा है, जबकि अपात्र लोग इसका लाभ ले रहे हैं।" अभय ने राशन कार्ड के लिए ऑनलाइन आवेदन भी किया था, लेकिन अब तक उन्हें राशन कार्ड नहीं मिल सका है।

गांव कनेक्शन के इस सर्वे में कई लोगों ने राशन में सिर्फ चावल मिलने की शिकायत की जबकि केंद्र और राज्य सरकारों का साफ आदेश था कि यह चावल या गेहूं के रूप में होना चाहिए, इसके साथ ही लोगों को दाल और चना भी मिलना चाहिए। चावल या गेहूं की व्यवस्था वैकल्पिक थी, जो कि अलग-अलग बार अलग-अलग हो सकता था या फिर चावल खाने वाले प्रदेशों में चावल बंटता और रोटी खाने वाले प्रदेशों में गेहूं।

मध्य प्रदेश के नराना के लखन पटेल कहते हैं कि उनके परिवार ने तीन महीने से रोटी नहीं खाई है क्योंकि राशन में सिर्फ चावल मिलता है। इसी तरह ओडिशा के बोलनगिर के आशीष बेहरा और छत्तीसगढ़ के बलोदा बाजार के राकेश कुमार मन्हाड़े ने भी कहा कि उन्हें राशन के नाम पर सिर्फ चावल मिल रहा है, जो कि पेट चलाने के लिए नाकाफी है।

सर्वे में कई लोगों ने सरकार की इस योजना में पर्याप्त राशन ना देने की बात कही। उत्तर प्रदेश के संतोष कहते हैं कि उन्हें महीने में सिर्फ 18 किलो राशन मिल रहा है, जबकि उनके परिवार में कुल 6 लोग हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के ही मौरा के उमेश शर्मा ने शिकायत की कि उन्हें राशन तो मिल रहा है, लेकिन उसके लिए उन्हें पैसे देने पड़ रहे हैं। उन्हें लॉकडाउन के दौरान एक भी बार मुफ्त राशन नहीं मिला।

जहां तक राशन लाभार्थियों की राज्यवार तस्वीर की बात है, तो महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में सबसे अधिक लोग इस मुफ्त राशन योजना से लाभान्वित हुए। वहीं इसके बाद राजस्थान, केरल, झारखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार का नाम रहा, जहां लगभग तीन-चौथाई (75 फीसदी) राशन कार्ड धारक इस योजना से लाभान्वित दिखे। इस मामले में सबसे खराब हाल पड़ोसी राज्यों पंजाब और हिमाचल प्रदेश का रहा, जहां 50 फीसदी से भी कम लोगों को मुफ्त राशन मिल सका। पूरी सूची इस प्रकार है-



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