पर्यावरण को बचाने के लिए महिला किसान की जैविक खेती

खेती के विकास में महिलाओं का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। परम्परागत खेती में वे पुरुषों के साथ बराबरी से काम करती हैं। बल्कि उनसे ज्यादा काम करती हैं। खेत में बीज बोने से लेकर उनके संरक्षण-संवर्धन और भण्डारण का काम करती हैं।

पर्यावरण को बचाने के लिए महिला किसान की जैविक खेती

एक अकेली महिला किस तरह जैविक खेती कर सकती है, इसका बहुत अच्छा उदाहरण मंजुला सन्देश पाडवी है। न केवल उसने इससे अपने परिवार का पालन-पोषण किया बल्कि अपनी बेटी को पढ़ाया लिखाया और अब वह नौकरी भी कर रही है। महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले के वागशेपा गाँव की मंजुला की जैविक खेती की चर्चा अब फैल गई है। मंजुला के पास 4 एकड़ जमीन है। उसका पति 10 साल पहले छोड़कर चला गया। उसके खुद का हृदय बाल्व बदला है, दवाएँ चलती रहती हैं। इसके बाद भी उसने हिम्मत नहीं हारी। खुद खेती करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली।

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बचत समूह से कर्ज लेकर खेत में मोटर पम्प लगाया। मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिये गोबर खाद खरीदकर डाली। सरकारी योजनाओं के पैसे से बैल-जोड़ी खरीदी। खेत में खुद हल-बक्खर चलाती है। फसल की निंदाई-गुड़ाई करती है। मक्का और ज्वार खेत में लगाया था। अच्छा उत्पादन हुआ। मंजूला कहती हैं," बाजू वाले खेतों की फसल कमजोर होती है। पिछले साल उनका मक्का नहीं हुआ, हमारा अच्छा हुआ। इसका कारण बताते हुए वह कहती है कि हमने जैविक खाद का इस्तेमाल किया, जबकि वे रासायनिक खाद डालते हैं। इस साल फिर मक्का ज्वारी की फसल खड़ी है।" नंदुरबार स्थित जन सेवा मण्डल ने इस इलाके में 15 बचत समूह बनाए हैं। इन समूहों में जो पैसा जमा होता है, उससे किसान खेती के लिये कर्ज लेते हैं। बिना रासायनिक और देसी बीज वाली खेती को प्रोत्साहित किया जाता है। पहले देसी बीज बैंक भी बनाए थे। सब्जी, फलदार वृक्ष और अनाजों की मिली-जुली खेती की जा रही है। मंजुला भी उनमें से एक है। आज उसकी बेटी मनिका को अपनी माँ पर गर्व है। वह कहती है मेरी माँ बहुत अच्छी है।

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खेती के विकास में महिलाओं का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। परम्परागत खेती में वे पुरुषों के साथ बराबरी से काम करती हैं। बल्कि उनसे ज्यादा काम करती हैं। खेत में बीज बोने से लेकर उनके संरक्षण-संवर्धन और भण्डारण का काम करती हैं। पशुपालन से लेकर विविध तरह की सब्जियाँ लगाने व फलदार वृक्षों की परवरिश में महिलाओं का योगदान होता है। लेकिन जब खेती का मशीनीकरण होता है तो वे इससे बाहर हो जाती हैं। मंजुला की खेती भी यही बताती है, उसका पति उसे छोड़कर चला गया। न केवल उसने खेती को सम्भाल लिया, अपना व अपने बच्चों का पालन-पोषण कर लिया, बल्कि उन्हें पढ़ा-लिखा इस लायक बना दिया कि उसकी लड़की नर्स बन गई और आज जलगाँव में नौकरी कर रही है। उसका काम इसलिये और महत्त्वपूर्ण हो जाता है जब किसान संकट में हैं। उसने खेती की ऐसी राह पकड़ी जो टिकाऊ, बिना रासायनिक, कम खर्चे वाली है। आज बिना रासायनिक वाली खेती ही जरूरत है जिसमें महिलाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो सकती है। बल्कि पहले थी ही।

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टिकाऊ खेती की ओर इसलिये बढ़ना जरूरी है क्योंकि बेजा रासायनिक खादों के इस्तेमाल से हमारी उपजाऊ खेती बंजर होती जा रही है, भूजल खिसकते जा रहा है, प्रदूषित हो रहा है और खेती की लागत बढ़ती जा रही है, उपज घटती जा रही है, इसलिये किसान आत्महत्या कर रहे हैं। मंजुला जैसी महिलाएँ आज एक उदाहरण हैं, जो अकेली होकर भी सफल किसान हैं। उनकी खेती से सीखकर मिट्टी, पानी और पर्यावरण के संरक्षण वाली खेती की ओर बढ़ना ही, आज समय की माँग है।

साभार: बाबा मायाराम

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