ईंट भट्ठे पर काम किया , अब मशहूर ब्लागर हैं मुसहरों के ये बच्चे 

ईंट भट्ठे पर काम किया , अब मशहूर ब्लागर हैं मुसहरों के ये बच्चे ये बच्चे चलाते हैं अपना ब्लॉग। 

मुसहर समुदाय के बारे में सुना है। कहा जाता है अति पिछड़े इलाकों के लोग चूहे खाकर जिंदा रहते हैं। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद ये समुदाय पूरी तरह मुख्य धारा में शामिल नहीं हो पाया.. लेकिन इसी समाज के कुछ बच्चे नया मुकाम रच रहे हैं..

छत्तीसगढ़ में रहने वाले प्रान्जुल का बचपन ईंटों की पथाई करने में गुजरा है। दहकती भट्टियों के बीच इनके बचपन के खेल और शरारतें खोई हैं। मिट्टी-गारे में सने रहने वाले प्रान्जुल की तरह जब कई हाथों ने कलम थामी तो ये बन गये मशहूर ब्लॉगर। आज इनकी लिखी कविताओं को लगभग डेढ़ लाख लोग पढ़ चुके हैं। ये बच्चे कविताओं के माध्यम से न सिर्फ अपना दर्द उकेरते हैं बल्कि 'बाल सजग' नाम के ब्लॉग को खुद संचालित भी करते हैं।

दो भाई तीन बहनों में सबसे छोटे प्रान्जुल कुमार (15 वर्ष) मूल रूप से छत्तीसगढ़ में दुर्ग जिले के रवेली गांव के रहने वाले हैं। काम की तलाश में कुछ साल पहले इनकी माँ ईंट-भट्टे पर काम करने के लिए पूरे परिवार सहित कानपुर आ गये। छत्तीसगढ़ और कानपुर आने के बीच अगर इस परिवार में कोई बदलाव हुआ है तो वो है प्रान्जुल का पढ़ना। हमेशा कुछ नया करने वाले प्रान्जुल का सपना इंजीनियर बनने का है।


प्रान्जुल के चेहरे पर आत्मविश्वास जरूर था पर मुस्कराहट कोसों दूर थी। उसने कहा, "मैं इंजीनियर बनना चाहता हूं ये मेरा शौक है, लेकिन मेरे इंजीनियर बनने से मेरी माँ की मजदूरी करना बंद हो जायेगा। कई सालों से मेरी माँ ने हम पांच भाई-बहनों की परवरिश मजदूरी करके की है। जब हम सब भाई-बहन काम करते थे तब कहीं हमारा पेट भरता।"

ये भे पढ़ें- पूर्व राष्ट्रपति की उस बेटी से मिलिए, जो मजदूरों के बच्चों को करती हैं शिक्षित

छत्तीसगढ़ के प्रान्जुल ने पिछले डेढ़ साल से ब्लॉग को चलाने की सम्भाली है जिम्मेदारी।

प्रान्जुल ने कहा, "पढ़ना-लिखना हमारे लिए भी है, ये एक सपने जैसा था। कानपुर आने के बाद ईंट-भट्टे में काम करते हुए 'अपना स्कूल' में पढ़ाई की। एक टेस्ट हुआ पढ़ने में होशियार निकला तो 'अपना घर' में पांच साल पहले आ गये। पिछले डेढ़ साल से 'बाल सजग' नाम के ब्लॉग को चलाने की जिम्मेदारी मुझे मिली। सभी की लिखी कविताएं पढ़ता हूं, कुछ कमी होती है तो सुधारता हूं, कोशिश रहती है हर दिन एक कविता जरूर पोस्ट करूं।"

प्रान्जुल की तरह अलग-अलग राज्यों के बच्चे कानपुर जिले के तातियागंज में बने 'अपना घर' में रहते हैं। यहां ये न केवल पढ़ाई करते हैं बल्कि ये कई हुनर भी सीखते हैं। एक गैर सरकारी संस्था आशा ट्रस्ट के सहयोग से वर्ष 2006 में 'अपना घर' की शुरुआत की गयी थी। 'अपना घर' का मुख्य उद्देश्य प्रवासी मजदूरों के बच्चों को उच्च शिक्षा देना है। देश के अलग-अलग राज्यों के सुविधाओं से वंचित मुसहर और आदिवासी जाति के लोग जो या तो बंधुवा मजदूरी करते हैं या फिर ईंट-भट्टे पर काम करते हैं।

ये भी पढ़ें- चप्पल प्रथा का नाम सुना है ? एक और कुप्रथा, जिससे महिलाएं आजाद होने लगी हैं...

इस बोर्ड पर ये अपनी लिखी कविताएं लगाते हैं।

ये लोग कुछ महीनें ईंट-भट्टे पर काम खत्म हो जाने के बाद ये अपने देश लौट जाते हैं जिससे इनके बच्चों की पढ़ाई नहीं हो पाती है। ऐसे बच्चों के लिए 'अपना घर' एक ऐसा ठिकाना बनाया गया जहां इनके रहने के साथ ही इन्हें पहली कक्षा से लेकर 12वीं तक नि:शुल्क शिक्षा दी जाती है। उच्च शिक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को भी ये संस्थान पूरी तरह से सहयोग कर रहे हैं। प्रान्जुल भी उन्हीं बच्चों में से एक है।

'अपना घर' की देखरेख कर रहे महेश कुमार ने बताया, "इन बच्चों के साथ वक्त गुजारते हुए ये अनुभव किया कि इनके मन में अपनी मजदूरी को लेकर बहुत पीड़ा है। जब इनसे कुछ लिखने को बोलते तब ये या तो बंधुवा मजदूरी पर लिखते या फिर ईंट-भट्टे पर गुजारे अपने अनुभव लिखते। कुछ महीने ही इनके साथ मेहनत की तो कुछ बच्चों ने इसे कविताओं का रूप दिया।"

वो आगे बताते हैं, "बस यहीं से नन्हा मन बाल सजग नाम के ब्लॉग की शुरुआत की। लगभग दस वर्षों से ये बच्चे ये ब्लॉग चला रहे हैं। इस ब्लॉग को देश के अलग-अलग राज्यों के लाखों लोग पढ़ते हैं और कमेन्ट करके इन बच्चों का उत्साह बढ़ाते हैं। लिखने के साथ ही ये बच्चे फोटोग्राफी और वीडियो भी खुद ही बनाना सीख चुके हैं, इनमें लगन बहुत है बस इन्हें मौका मिलने की जरूरत है।"

ये भी पढ़ें- इन बच्चों के सपनों को उड़ान देता है 'बदलाव पाठशाला'

कभी ये और इनके पूर्वज खाते थे चूहा आज कविताओं के माध्यम से बयां कर रहे अपना दर्द।

तीन फरवरी को 'जीना छोड़ दें' शीर्षक नाम की कविता बिहार के नवादा जिले देवराज ने अपने ब्लॉग पर लिखी है। इस कविता की कुछ पंक्तियां सातवीं में पढ़ने वाले देवराज कुमार सुनाते हैं, "जिंदगी में दु:ख है तो, हम सोचते हैं जीना छोड़ दे, जब कभी दरवाज़े बंद हो, तब एक उम्मीद के सहारे जीते हैं...।" इन पंक्तियों को सुनाते हुए भावुक हुए देवराज ने कहा, "हमें अपने घर और आस पास के बच्चों को कभी पढ़ते नहीं देखा। बिना पढ़े-लिखे होने की वजह से दिनभर मजदूरी करने के बाद जितना पैसा ठेकेदार दे देता ये चुपचाप ले लेते। इन्होंने अपने हक़ के लिए कभी आवाज़ सिर्फ इस डर से नहीं उठाई कि उन्हें जो मिल रहा है विरोध करने के बाद वो भी नहीं मिलेगा।"

वर्तमान में प्रान्जुल और देवराज की तरह यहां के 30 से ज्यादा बच्चे कविताओं के माध्यम से अपने समुदाय का और अपने बचपन का दर्द बयाँ करते हैं। अपना घर जब यहां बच्चों का चयन करता है तो इनकी ये कोशिश रहती कि हर राज्य का हर जिले का और हर गांव का एक बच्चा जरूर हो। अपना घर में 48 बच्चे रह सकते हैं अभी 30 बच्चे रह रहे हैं, चयन प्रक्रिया चल रही है जल्द ही 48 बच्चे पूरे हो जायेंगे।

ये भी पढ़ें- अनकही कहानियां : 35 साल भीख मांगने के बाद इस तरह बदली ज़िंदगी

इनकी लिखी कविताओं को कई राज्यों के लोग पढ़ते हैं।

ब्लॉग पर कविताएं पोस्ट करने का ये है तरीका

यहां रह रहे 30 बच्चों में जिसकी लेखनी ज्यादा अच्छी होती है। जो अपने साथ दूसरों की भी कवितायें पोस्ट कर सकें उसे बाल सजग ब्लॉग चलाने की जिम्मेदारी दी जाती है। ये बच्चे साल दो साल पर बदलते रहते हैं। पिछले डेढ़ वर्ष से इस ब्लॉग को छत्तीसगढ़ के रहने वाले प्रान्जुल कला रहे हैं। प्रान्जुल ने बताया, "बाल सजग नाम का एक बोर्ड लगा है हर कोई अपनी लिखी कविताएं वहां चिपका देता है। हर रविवार को मैं इन कविताओं को पढ़ता हूँ उसमे जो सुधार की जरूरत होती है उसे ठीक करता हूँ। एक हफ्ते हर दिन कौन सी कविता जायेगी ये भी तय कर लेते हैं। लिखते-लिखते अब हमें इतना नुभव हो गया है अगर कोई किसी विषय पर लिखने को बोले तो हम आसानी से लिख सकते हैं।"

ये भी पढ़ें- बदलाव की मिसाल हैं थारू समाज की ये महिलाएं, कहानी पढ़कर आप भी कहेंगे वाह !

ये है 'बाल सजग' ब्लॉग का स्टेटस।

ये भी पढ़ें- यूपी : मुख्यमंत्री समग्र ग्राम विकास योजना से बदलेगी थारू और मुसहर बाहुल्य गाँवों की तस्वीर

Share it
Share it
Share it
Top