बदलाव की मिसाल हैं थारू समाज की ये महिलाएं, कहानी पढ़कर आप भी कहेंगे वाह !

बदलाव की मिसाल हैं थारू समाज की ये महिलाएं,  कहानी पढ़कर आप भी कहेंगे वाह !

श्रावस्ती। "पहले लाल, पीले, हरे रंग को देखकर चीजों की पहचान करते थे क्योंकि हमे पढ़ना नहीं आता था, लेकिन अब हम दुकानदार को नाम बताकर अच्छे बीज और दवाई की मांग करते हैं, क्योंकि अब हमने पढ़ना और लिखना सीख लिया है।" ये कहना है रामकली (53 वर्ष) का।

रामकली श्रावस्ती जिले के तराई क्षेत्र में रहने वाले थारू जनजाति की एक महिला है। जो कभी जंगलों से लकड़ी बीना करती थी, तालाबों में मछली मारा करती थी, और रंगों से चीजों की पहचान किया करती थी। पर आज वही रामकली अपने क्षेत्र की एक जागरूक किसान बन गयी है। अब वो दुकानदार को रंग नहीं बल्कि नाम बताकर सामान की खरीददारी करती है। कृषि विभाग में किसानों के लिए कौन सी नई योजना आई है, इस बात को जानने के लिए अब वो अधिकारियों से सवाल करने में झिझकती नहीं है। क्योंकि अब वो साक्षर हो चुकी है और अपने अधिकारों को समझने लगी है।

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रामकली साक्षर होकर अपने क्षेत्र की बन गयी एक सफल महिला किसान

थारू समाज की रामकली अपने क्षेत्र की पहली महिला नहीं है जिन्होंने समाज में आगे बढ़कर अपने दम पर कुछ हासिल किया हो बल्कि रामकली की तरह सैकड़ों महिलाएं आज बाजार जाकर चीजों का नाम लेकर खरीददारी करने लगी हैं। कोटेदार के घटतौली करने पर अब वो विरोध जताने लगी हैं। अपने बच्चों को अब वो लकड़ी बीनने और मछली मारने से मना करती हैं और उन्हें स्कूल भेजती हैं। अब वो अपने मोबाइल से नंबर खुद ही डायल करने लगी हैं। सौ रुपए से लेकर एक हजार रुपए तक का हिसाब रखना जानने लगी हैं। छोटे बड़े गुणा-भाग, अक्षर मिला-मिलाकर पढ़ना, अपने बच्चों को घर पर बैठकर पढ़ाना, हस्ताक्षर करना, बैंक में रुपए जमा करने और निकालने का फॉर्म भी अब ये खुद भरती हैं।

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भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के मुताबिक, वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की साक्षरता दर 72.99 फीसदी है। इसमें पिछले 10 वर्षों की अवधि में समग्र साक्षरता दर में 8.15 फीसदी की वृद्धि हुई है। 2001 में 64.84 फीसदी थी वहीं 2011 में 72.99 फीसदी हुई है। कुछ गैर सरकारी संस्थाओं के सहयोग से प्रदेश के कई जिलों में महिला और किशोरी साक्षरता केंद्र चलाए जा रहे हैं। इन साक्षर केन्द्रों की वजह से इन आंकड़ों में बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है।

टाटा ट्रस्ट कुछ गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से उत्तर प्रदेश में 155 महिला साक्षरता केंद्र चलाए जा रहे हैं। हर सेंटर पर 30 महिलाओं का एक समूह होता है। इसमे से ज्यादातर वो महिलाएं हैं जिनकी कम उम्र में शादी हो गयी थी जिसकी वजह से वो कभी स्कूल नहीं जा पायी थी। ये अपने घर का कामकाज निपटाकर दोपहर 11 बजे से 2 बजे तक पढ़ाई करती हैं। टाटा ट्रस्ट के प्रोग्राम आफीसर विवेक सिंह का कहना है, "जिन महिलाओं को अपने आपकी अभिव्यक्ति करने का कभी मौका नहीं मिला, ये साक्षरता केंद्र उन महिलाओं के लिए एक मंच हैं, जहाँ ये आपस में मिलकर अपनी बातें साझा कर सकती हैं। इनके ही समुदाय की कोई पढ़ी-लिखी महिला इन्हें पढ़ाने का भी काम करती हैं। जिससे अब ये साक्षर होकर सवाल करने लगी हैं।"

श्रावस्ती जिला मुख्यालय से लगभग 45 किमी. नेपाल सीमा से सटे सिरसिया ब्लॉक के मोतीपुर ग्राम पंचायत के रनियापुर गाँव में वर्ष 2015 में माँ जगदम्बे महिला साक्षरता केंद्र की शुरुआत की गयी थी। इस केंद्र पर पढ़ाई कर रही आशा रानी (42 वर्ष) ने बताया कि जब वो यहाँ पढ़ने आती थी तो लोग क्या कहते थे, 'बुड्डा सुग्गा पढ़ के का करी' माँ-बाप पढ़ाया नहीं, अब तो ऐसे पढ़ने जाती हैं जैसी अब कल से ही नौकरी लग जायेगी।" वो आगे बताती हैं, "हमारे समाज के लिए इस उम्र में पढ़ना किसी अजूबे से कम नहीं था, जब हम यहाँ पढ़ने आते थे तो अच्छा लगता था, अपने लिए थोड़ा फुरसत का समय निकाल पाते थे। लिखना पढ़ना तो सीखा ही, अब तो अपने बच्चों को भी स्कूल भेजने पर जोर देने लगे हैं।"

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एक समूह में बैठकर करती हैं पढ़ाई

एक गैर सरकारी संगठन ग्रामीण डेवलपमेंट टाटा ट्रस्ट के सहयोग से थारु जनजाति के लिए 13 सेंटर, श्रावस्ती में कुल 21 सेंटर चल रहे हैं। इसमे दो फेज चलते हैं जो 18-18 महीने के होते हैं, पहले फेज में बेसिक अक्षर, शब्द, जोड़ना-घटाना पढ़ाया जाता है, दूसरे फेज में एडवांस गुणा-भाग, लिखना-पढ़ना सिखाया जाता है। थारु नेपाल और भारत के सीमावर्ती तराई क्षेत्र में पायी जाने वाली एक जनजाति है। नेपाल की कुल जनसँख्या का लगभग 6.6 प्रतिशत लोग थारू हैं।

इन महिलाओं ने बढ़ती उम्र और अपनों के मजाक की परवाह न करते हुए आज से तीन साल पहले पढ़ाई करने की ऐसी ठानी कि फिर कभी पीछे कदम नहीं खीचें। इसका असर इनके व्यवहार परिवर्तन में साफ़ तौर पर देखने को मिल रहा है।

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खुद पढ़कर अब ये अपने बच्चों को पढ़ा रहीं

इन महिलाओं ने एक बात स्पष्ट तौर पर बताई कि इन्हें इनके माँ-बाप ने नहीं पढ़ाया और कम उम्र में शादी कर दी। इन्होने ये भी कहा हमारे यहाँ लकड़ी बीनना, मछली मारना ही बचपन से काम कराया जाता था, हमारे यहाँ पढ़ाई का कोई चलन नहीं था। यहाँ पढ़ने आ रही सुशीला ने कहा, "हम रोज अपने घर में अपने दोनों छोटे बच्चों को पढ़ाते है, वो रोज जाए ये हमारी पहली कोशिश रहती है। पढ़ाई कितना जरूरी है ये हमें यहाँ पढ़कर पता चल रहा है।"

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साक्षरता केंद्र पर पढ़कर अब ये अपने हक के लिए करने लगी हैं सवाल

इस संस्था की कार्यक्रम समन्यवक शालिनी वर्मा ने कहा, "जब इन महिलाओं ने सेंटर पर आना शुरू किया था, तब ये आपस में ही बात करने में संकोच करती थी। इनको इन केन्द्रों पर पढ़ाई के लिए लाना हमारे लिए चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि इन्हें लगता था इस उम्र में पढ़ाई करने का कोई मतलब नहीं है।" वो आगे बताती हैं, "पढ़ाई करने का मतलब ये सिर्फ नौकरी करना समझते थे, पर जब इन्होने यहाँ पढ़ाई की और लिखना पढ़ना सीख गयी। तब ये दूसरी महिलाओं को भी पढ़ने के लिए खुद ही प्रेरित करनी लगी। मुझे लगता है अगर सही मायने में ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सशक्तीकरण की बात की जाये तो इन महिलाओं को साक्षर बनाना है जिससे ये सवाल करना सीख जाएँ।"

जानें थारू जनजाति के बारे में

थारू, नेपाल और भारत के सीमावर्ती तराई क्षेत्र में पायी जाने वाली एक जनजाति है। नेपाल की सकल जनसंख्या का लगभग 6.6% लोग थारू हैं।

भारत में बिहार के चम्पारन जिले में और उत्तर-प्रदेश के नैनीताल और ऊधम सिंह नगर में थारू पाये जाते हैं। थारुओं का मुख्य निवास स्थान जलोढ़ मिट्टी वाला हिमालय का संपूर्ण उपपर्वतीय भाग तथा उत्तर प्रदेश के उत्तरी जिले वाला तराई प्रदेश है। ये हिन्दू धर्म मानते हैं तथा हिन्दुओं के सभी त्योहार मनाते हैं। आखेट, मछली मारना, पशुपालन एवं कृषि इनके जीवनयापन के प्रमुख साधन हैं। टोकरी तथा रस्सी बुनना सहायक धंधों में हैं।

थारु जनजाति का श्रावस्ती जिले में ये हैं पहनावा

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