RBI ने घटाई ब्याज दरें, रेपो रेट में 0.25 फीसदी कटौती, जानिए, क्या हैं रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट

RBI ने घटाई ब्याज दरें, रेपो रेट में 0.25 फीसदी कटौती, जानिए, क्या हैं रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेटआरबीअाई।

मुंबई। अगस्त मौद्रिक समीक्षा करते हुए बुधवार को केन्द्रीय रिजर्व बैंक ने देश में कारोबारी तेजी लाने के लिए रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की कटौती का ऐलान किया है। इस कटौती के बाद देश में कर्ज देने के लिए बेस रेट 6 फीसदी पर पहुंच गया है। वहीं रिवर्स रेपो रेट में भी 0.25 पॉइंट की कटौती की गई है जिसके बाद यह 6 प्रतिशत से घटकर 5.75 प्रतिशत हो गई है।

बैंकरों को उम्मीद थी कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अपने मौद्रिक रुख को बदलने और बेंचमार्क उधार दर में कम से कम 0.25% की कटौती करेगा। वहीं कुछ लोगों को उम्मीद है कि जून में खुदरा मुद्रास्फीति के 1.54% के ऐतिहासिक निम्नतम स्तर पर पहुंचने के बाद केंद्रीय बैंक दरों में कटौती की उम्मीद जताई थी।

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पिछली बैठक में क्या हुआ था फैसला

पिछले छह व सात जून को हुई एमपीसी की बैठक में रेपो रेट 6.25 फीसद पर पूर्ववत रखने का फैसला किया गया था। इसमें कहा गया था कि महंगाई बढ़ने की आशंका के चलते ब्याज दर नहीं बढ़ाई गई है।

गौरतलब है कि केंद्रीय बैंक ने आखिरी महीने कहा था कि एमपीसी की अगली बैठक 1 और 2 अगस्त 2017 को होगी जो कि वित्त वर्ष 2017-18 की तीसरी द्वैमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा होगी। इस बैठक में जो भी फैसला होगा वो 2 अगस्त 2017 को वेबसाइट के माध्यम से दोपहर 2 बजकर 30 मिनट पर प्रकाशित किया जाएगा।

क्यों हुई रेपो रेट में कटौती?

जून महीने में खुदरा महंगाई दर 1.54 फीसदी के निचले स्तर पर रही है जबकि मई महीने का औद्योगिक उत्पादन आंकड़ा 1.7 फीसदी रहा है। जून, 2017 में भारत की महंगाई दर घटकर 1.54 फीसदी रह गई। वहीं औद्योगिक उत्पादन आंकड़ों के मुताबिक मई, 2017 में फैक्टरी उत्पादन विकास दर घटकर 1.7 फीसदी रह गया, जबकि पिछले साल इसी महीने में यह आठ फीसदी था। ब्याज दरों में कटौती के पीछे महंगाई के इन आंकड़ों का अहम रोल रहा. वहीं आरबीआई को अच्छे मानसून से देश में अच्छी पैदावार की उम्मीद बरकरार है जिसके चलते आरबीआई ने ब्याज दरों में कटौती के लिए सही समय माना है।

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आरबीआई मौद्रिक नीति समीक्षा से ठीक पहले देश के अग्रणी उद्योग मंडल एसोचैम ने आरबीआई से ब्याज दरों में 25 आधार अंकों की कटौती करने का आग्रह किया है। एसोचैम ने हाल ही में सामने आए उन आंकड़ों के मद्देनजर आरबीआई से यह अनुरोध किया है, जिसके अनुसार देश की महंगाई दर पांच वर्षो के दौरान सबसे नीचे रही और फैक्टरी आउटपुट जबरदस्त रहा।

रेपो रेट (Repurchase Rate or Repo Rate)

रोजमर्रा के कामकाज के लिए बैंकों को भी बड़ी-बड़ी रकमों की ज़रूरत पड़ जाती है, और ऐसी स्थिति में उनके लिए देश के केंद्रीय बैंक, यानि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से ऋण लेना सबसे आसान विकल्प होता है। इस तरह के ओवरनाइट ऋण पर रिजर्व बैंक जिस दर से उनसे ब्याज वसूल करता है, उसे रेपो रेट कहते हैं।

जब बैंकों को कम दर पर ऋण उपलब्ध होगा, वे भी ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अपनी ब्याज दरों को कम कर सकते हैं, ताकि ऋण लेने वाले ग्राहकों में ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ोतरी की जा सके, और ज़्यादा रकम ऋण पर दी जा सके। इसी तरह यदि रिजर्व बैंक रेपो रेट में बढ़ोतरी करेगा, तो बैंकों के लिए ऋण लेना महंगा हो जाएगा, और वे भी अपने ग्राहकों से वसूल की जाने वाली ब्याज दरों को बढ़ा देंगे।

रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate)

जैसा इसके नाम से ही साफ है, यह रेपो रेट से उलट होता है। जब कभी बैंकों के पास दिन-भर के कामकाज के बाद बड़ी रकमें बची रह जाती हैं, वे उस रकम को रिजर्व बैंक में रख दिया करते हैं, जिस पर आरबीआई उन्हें ब्याज दिया करता है। अब रिजर्व बैंक इस ओवरनाइट रकम पर जिस दर से ब्याज अदा करता है, उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं।

दरअसल, रिवर्स रेपो रेट बाज़ारों में नकदी की तरलता को नियंत्रित करने में काम आती है। जब भी बाज़ारों में बहुत ज्यादा नकदी दिखाई देती है, आरबीआई रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज़्यादा ब्याज कमाने के लिए अपनी रकमें उसके पास जमा करा दें, और इस तरह बैंकों के कब्जे में बाज़ार में छोड़ने के लिए कम रकम रह जाएगी।

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