रोज़ डे : आपने जिस गुलाब को 20 - 25 रुपये में खरीदा होगा, किसान को उसके सिर्फ 2 - 5 रुपये मिलते हैं

रोज़ डे : आपने जिस गुलाब को 20 - 25 रुपये में खरीदा होगा, किसान को उसके सिर्फ 2 - 5 रुपये मिलते हैंगुलाब 

गुलाब के फूल को दुनियाभर में सबसे ज़्यादा पसंद किया जाता है। इसकी भीनी भीनी खुशबू हर किसी का मन मोह लेती है। आज़ रोज़ डे । आज के दिन लोग जिन्हें पसंद करते हैं उन्हें गुलाब देते हैं। बाज़ार में इस दिन गुलाब की कीमत काफी ज़्यादा रहती है। सामान्य दिनों में जहां इसकी एक कली 10 - 15 रुपये की मिल जाती है वहीं आज के दिन 20 से 50 रुपये तक का एक गुलाब बिकता है लेकिन क्या आपको पता है कि इस गुलाब की खेती कैसे होती है? ये कितने रंगों का होता है? गुलाब की कहानी कितनी पुरानी है और किसान से लेकर आप तक पहुंचते हुए इसकी कीमत कैसे बदल जाती है।

गुलाब वैसे तो 3.5 करोड़ साल से ज़मीन पर है लेकिन इसकी खेती करने या बगीचा लगाने का चलन 5000 साल पहले ही हुआ। इसके पहला इस्तेमाल शायद चीन में आया. आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया में सबसे पुराना गुलाब का पौधा 1,000 साल से ज्यादा पहले से है। यह पौधा जर्मनी के हिल्देशेम में मौजूद है। इससे जुड़ी ये मान्यता है कि जब तक ये गुलाब रहेगा हिल्देशेम शहर बसा रहेगा। गुलाब उन तीन फूलों में से एक है जिसका जिक्र बाइबिल में मिलता है। हिंदू धर्म में गुलाब और कमल दो फूल हैं जिन्हें काफी मान्यता दी गई है।

कैसे होती है खेती

गुलाब की खेती करने के लिए जैविक कार्बनिक पदार्थ से भरपूर ऐसी दोमट मिट्टी जिसका पीएच छह से आठ के बीच हो गुलाब के लिए उपयुक्त रहती है। मिट्टी में पानी निकलने की व्यवस्था भी सही होनी चाहिए। गुलाब के लिए शुष्क ठंडा दिन का तापमान 20 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट वाला मौसम सही रहता है। इसको लगाने का समय 15 सितंबर से 15 अक्टूबर तक है। पौधे लगाने से एक माह पूर्व दो से तीन फुट की दूरी पर दो से ढाई फुट गहरे गड्ढे बनाएं जिनकी चौड़ाई दो फुट रखें। गड्ढे में पांच किलो गोबर की खाद व 20 मिली क्लोरोपाइरीफोस मिलाकर गड्ढा भरकर पानी लगा दें। इसमें कलम लगा दें। सर्दियों में 10 दिन व गर्मियों में पांच-छह दिन के अंतर सिंचाई करते रहें। मार्च की शुरुआत में गुलाब पूरी तरह फूल बन जाता है। अगर मौसम ठंडा रहे तो ये अवधि बढ़कर अप्रैल हो जाती है।

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कैसे होता है व्यापार

किसान लगभग 1.5 रुपये में सप्लायर को गुलाब बेचता है। सप्लायर एक रुपया अपने पास रखता है और ट्रांसपोर्ट का खर्चा मिलाकर तीन रुपये में मंडी में बेचता है। इसमें एक रुपया ब्रोकर का मेंटनेंस खर्च शामिल हो जाता है। इसके बाद गुलाब का मंडी में थोक भाव 5 से 6 रुपये हो जाता है। सजावट पर 2 रुपये खर्च होने के बाद इसकी कीमत 8 रुपये हो जाती है। सामान्य दिनों में दुकानों पर इसकी कीमत 10 रुपये होती है और त्योहारी सीज़न में ये 20 से 50 रुपये तक में बिकता है। दुकान किस इलाके में है कई बार कीमत इस पर भी निर्भर करती है।

गुलाब की कली की खेती पॉलीहाउस में करना ज़्यादा सही रहता है। वैसे तो इस गुलाब की कीमत 2 से 3 रुपये है लेकिन सीज़न में किसान 5 से 6 रुपये में आराम से एक गुलाब बेच देते हैं। हालांकि बाज़ार तक पहुंचते पहुंचते इसकी कीमत बढ़ जाती है।
डॉ. आरएस कटियार, चीफ साइंटिस्ट, फ्लोरीकल्चर विभाग, एनबीआरई, लखनऊ

गुलाब की खेती करने वाले किसान गया प्रसाद बताते हैं कि हम देसी गुलाब उगाते हैं जो 50 रुपये प्रति किलो में बिक जाता है। जब कोई त्योहार होता है या किसी की शादी होती है इसी गुलाब की कीमत बाज़ार में 250 रुपये प्रति किलो तक हो जाती है।

कितने तरह के होते हैं गुलाब

गुलाब की सौ से ज्यादा अलग-अलग किस्में हैं। सबसे बड़ा गुलाब का फूल (निकिता के रुहोकसोफस्की) लगभग 33 इंच यानी तीन फीट बड़ा था। इसी तरह सबसे छोटा गुलाब चावल के एक दाने की तरह होता है। कुछ किस्मों के गुलाब के पौधे किसी बड़े पेड़ की तरह 20-25 फीट तक के हो जाते हैं। बाज़ार में लाल, गुलाबी, नारंगी, सफेद, पीला, गहरा लाल जैसे रंगों के गुलाब आसानी से मिल जाते हैं। कुछ लोगों को लगता है कि गुलाब काले रंग का भी होता है लेकिन ऐसा नहीं है। जिसे लोग काला गुलाब समझते हैं वो दरअसल, बहुत गहरे लाल रंग का गुलाब होता है जो दिखने में काले रंग का आभास देता है। नीला गुलाब सबसे पहले 2009 में जापान में उगाया गया था। इससे पहले नीला गुलाब नहीं होता था।

सबसे छोटा गुलाब साभार: इंटरनेट।

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गुलाब की हाइब्रिड किस्मों में राजहंस, जवाहर, बिरगो, गंगा सफेद, मृगालिनी गुलाबी, मन्यु डिलाइट नीला, मोटेजुमा, चार्लस मैलारिन गाढ़ा लाल, फलोरीवंडा समूह की चंद्रमा सफेद, गोल्डन टाइम्स पीला व जगुआर, बटन गुलाब समूह की क्राई-क्राई, देहली स्कारलेट तथा लता गुलाब समूह के देहली व्हाइट, पर्ल, डीरथा पर्मिन गुलाबी अच्छी किस्में हैं। मध्य सितंबर से मध्य अक्टूबर तक जमीन की सतह से 30 सेमी ऊपर से कटाई करें। सूखी व बीमार टहनियों को निकालते रहें। कटे भाग पर ब्लाइटोक्स दवा लगाएं।

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