पहाड़ियों में खत्म होती जा रही रागी और सावा जैसे मोटे अनाजों की खेती को बचाने की पहल

पहाड़ियों में खत्म होती जा रही रागी और सावा जैसे मोटे अनाजों की खेती को बचाने की पहलपहाड़ों पर मोटे अनाजों के बीजों की संरक्षण करने के लिए शुरू हुआ संयंत्र।

अापने टीवी पर मोटे अनाजों से बनने वाले खास पकवान ( जैसे कि ओट्स खीर, ओट्स मैगी और ओट्स सूप ) से जुड़े विज्ञापनों को ज़रूर देखा होगा। ओट्स की तरह ही रागी और सावा जैसे मोटे अनाजों की खेती उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में होती रही है। लेकिन महंगी यातायात व्यवस्था और किसान को उन्नत बीज न मिल पाने से इन अनाजों की पैदावार में काफी गिरावट आई है। ऐसे में उत्तराखंड में बीज प्रोसेसिंग संयंत्र की शुरूआत से किसानों को अब अच्छे किस्मों के बीज आसानी से मिल सकेंगे।

27 फरवरी को गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय पन्तनगर, ऊधमसिंह नगर, उत्तराखंड में बीज प्रोसेसिंग संयंत्र की शुरूआत की गई। संयंत्र से पहाड़ी क्षेत्रों में मोटे अनाज की खेती करने वाले किसानों को फायदा मिलने की बात कहते हुए केंद्रीय कृषि राधा मोहन सिंह ने कहा,'' पहाड़ों पर औषधीय गुण वाले पौधों, अनाजों व फसलों की किस्में सदियों से उगाई जाती रही हैं। इन फसलों में रागी (मंडुआ), सावा (झगोरा) की विशेष प्रजाति उगाई जाती हैं। उन्नत बीज न मिल पाने से इन अनाजों की खेती अब विलुप्त होने के कगार पर आ गई हैं। बीज प्रोसेसिंग संयंत्र की मदद से खत्म होते जा रहे इन अनाजों को बचाया जा सकता है।''

राधामोहन सिंह ने ट्विट कर के दी जानकारी।

कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण एपीडा के मुताबिक भारत से बाजरा,सावा, जौ, रागी और राई जैसे अनाजों का निर्यात वर्ष 2016-17 के दौरान देश में 1.6 लाख मीट्रिक टन हुआ, जिसका मूल्य 395.83 करोड़ रुपए रहा।

अभी तक मैदानी क्षेत्रों में उत्पादित किए गए बीजों को व्यवसायिक रूप से उत्तराखंड में भेजा जाता था, लेकिन एकसमान जलवायु न मिल पाने के कारण इन बीजों की पैदावार अच्छी नहीं हो पाती थी। राष्ट्रीय बीज निगम की मदद से उत्तराखंड में पहली बार बीज प्रोसेसिंग संयंत्र तैयार किया गया है। इस संयंत्र की मदद से पर्वतीय क्षेत्रों में अनाज के बीज उत्पादन में आ रही कठिनाईयां दूर हो सकेंगी। इस प्लांट की मदद से पर्वतीय क्षेत्रों के किसान अपने बीजों का विकास खुद अपने क्षेत्रों से कर सकेंगे।

गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पन्तनगर के प्रोफेसर ए. के. मिश्रा ने बताया,'' इस प्लांट की मदद से उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में विकसित होने वाले अनाजों की प्रजातियों के बीज उसी जलवायु में बनाए जाएंगे , जिससे न केवल पर्वतीय क्षेत्र का उत्पादन बढ़ाया जा सकेगा बल्कि यहां की विलुप्त हो रही रागी और सावा अनाज की विशेष किस्मों का संरक्षण भी हो सकेगा।''

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कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार ने किसानों की मदद के लिए इस वर्ष अपना बजटीय आवंटन पिछले वर्ष 2017-18 के 51,576 करोड़ से बढ़ाकर 2018 -19 में 58,080 करोड़ कर दिया है। इस बजट की मदद से कई राज्यों में कृषि बीजों का विकास करने के लिए केंद्र सरकार बीज प्रोसेसिंग संयंत्र की शुरूआत कर रही है।

रागी और सावां अनाज बच्चों और बुज़ुर्गों के शारीरिक विकास के लिए काफी असरदार होते हैं, क्योंकि इन अनाजों में कैल्शियम की मात्रा भरपूर होती है। रागी के नियमित सेवन करने से हड्डियां टूटने और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी दिक्कतों से छुटकारा मिलता है।

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