तीन तलाक बिल आज राज्य सभा में होगा पेश, विपक्ष पर टिकी उम्मीदें 

तीन तलाक बिल आज राज्य सभा में होगा पेश, विपक्ष पर टिकी उम्मीदें साभार: इंटरनेट 

लोकसभा से पारित कराने के बाद अब मंगलवार को राज्यसभा में मोदी सरकार एक साथ तीन तलाक को गैर कानूनी और गैर जमानती अपराध बनाने वाले बिल को पेश करेगी। राजनीतिक दल इसका विरोध भले ही नहीं कर रहे हों, लेकिन ज्यादातर दलों की राय है कि इस विधेयक को स्थाई समिति को भेजकर और बेहतर बनाया जाए। राज्यसभा में मजबूत विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार पर दबाव बनाने में कामयाब हो सकता है।

माना जा रहा है कि 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की राह पर चल पड़ी कांग्रेस को अब अपनी इमेज की खासी चिंता है, इसलिए वह राज्य सभा में इस बिल को लेकर सरकार के खिलाफ आक्रामक रवैया नहीं अपनाएगी, जिससे सरकार की राह कुछ आसान होगी।यदि राज्यसभा में सदन की राय बनती है कि विधेयक को संसदीय समिति या सलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए तो तृणमूल कांग्रेस भी इसका समर्थन करेगी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद तीन तलाक पर प्रतिबंध लग चुका है। इसलिए विधेयक को इसी सत्र में पारित करने की जल्दबाजी का कोई ठोस आधार सरकार के पास नहीं बनता है।

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कांग्रेस लोक सभा में बिल का समर्थन कर चुकी है

कांग्रेस ने लोक सभी में बिल का समर्थन किया था हालंकि उसे बिल के कुछ प्रावधानों को लेकर ऐतराज़ था।सरकार के लिए राहत की बात ये है कि गुजरात चुनाव में कांग्रेस ने सॉफ्ट हिंदुत्व का रास्ता अपना था जिसका उसे फ़ायदा भी हुआ था। ऐसे में राज्य सभा में वह तीन तलाक बिल को रोककर अपने इस इमेज को धराशायी नहीं करना चाहेगी। लोकसभा में जब यह बिल पारित हुआ, तब राहुल गांधी सदन में मौजूद नहीं थे। माना जा रहा है कि तीन तलाक बिल का विरोध करके राहुल गांधी अपनी छवि को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते हैं।

SC ने सरकार को कानून बनाने के लिए दिया था 6 माह का समय

सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को पहले ही असंवैधानिक करार दे चुकी है ।22 अगस्त को शीर्ष अदालत की पांच जजों की बेंच ने बहुमत से तीन तलाक को असंवैधानिक और गैर कानूनी बताया था। साथ ही मोदी सरकार से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून बनाने को कहा था। लोकसभा में तीन तलाक बिल पर चर्चा के दौरान भी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया।

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तीन तलाक बिल में ये हैं प्रावधान

  • एक साथ तीन बार तलाक (बोलकर, लिखकर या ईमेल, एसएमएस और व्हाट्सएप जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से) कहना गैरकानूनी होगा।
  • ऐसा करने वाले पति को तीन साल के कारावास की सजा हो सकती है। यह गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध माना जाएगा।
  • यह कानून सिर्फ 'तलाक ए बिद्दत' यानी एक साथ तीन बार तलाक बोलने पर लागू होगा।
  • तलाक की पीड़िता अपने और नाबालिग बच्चों के लिए गुजारा भत्ता मांगने के लिए मजिस्ट्रेट से अपील कर सकेगी।
  • पीड़ित महिला मजिस्ट्रेट से नाबालिग बच्चों के संरक्षण का भी अनुरोध कर सकती है। मजिस्ट्रेट इस मुद्दे पर अंतिम फैसला करेंगे।
  • यह प्रस्तावित कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू होगा है।

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बिल में हैं विरोधाभासी बातें

इस बिल में ऐसा बहुत कुछ है जिसका कुछ मतलब नहीं निकलता, यानी अब राज्‍यसभा को इस पर बहुत काम करना होगा, जैसे बिल की धारा 2(ख) में दी गई तलाक की परिभाषा, जिसमें कहा गया है- ‘इंस्टेंट ट्रिपल तलाक यानी ‘तलाक-ए-बिद्दत’ या तलाक का इसी तरह का दूसरा स्‍वरूप जिसमें मुस्लिम शौहर के द्वारा शादी तोड़ने का फौरी और गैर-वापसी का असर रखने वाला ऐलान किया जाता है, जिसे अधिकतर लोग तीन तलाक समझते हैं।’

हालांकि, इस परिभाषा के आधार पर विधेयक की धारा 3 में कुछ विरोधाभास नजर आता है। इसमें कहा गया है- ‘किसी व्‍यक्ति का अपनी प‍त्‍नी को तलाक देने का ऐलान करना, चाहे वे शब्‍द, बोले या लिखें हों या किसी इलेक्‍ट्रॅानिक फार्म में या किसी अन्‍य तरीके से जो भी हो, वह अवैध और शून्‍य होगा।’

अब ‘तलाक’ को यह कह कर परिभाषित किया है, ‘फौरी और गैर-वापसी का असर वाला विवाह विच्‍छेद’, तो फिर इसी बिल में इसे शून्‍य कैसे घोषित किया जा सकता है। यह परिभाषा पुनरावृत्ति-मात्र है और इसलिए ये विधेयक और उसकी धारा 3 बेमतलब साबित हो सकती है।

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