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बजट 2021 : ग्रामीण रोज़गार की मांग को पूरा करने के लिए मनरेगा में अधिक बजट की ज़रूरत

एक फरवरी को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण केंद्रीय बजट 2021 पेश करेंगी। कोरोना महामारी के दौर में यह बजट बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में ग्रामीण रोज़गार की मांग को पूरा करने के लिए बनी मनरेगा योजना के लिए सरकार कितना बजट आवंटित करती है, यह भी काफी महत्वपूर्ण पहलू होगा।

Kushal MishraKushal Mishra   30 Jan 2021 11:48 AM GMT

बजट 2021 : ग्रामीण रोज़गार की मांग को पूरा करने के लिए मनरेगा में अधिक बजट की ज़रूरतकोरोना लॉकडाउन के दौरान मददगार बनी मनरेगा के लिए इस बार केंद्रीय बजट में क्या होगा ख़ास। फोटो साभार : @TS_SinghDeo

एक फ़रवरी को केंद्र सरकार वित्त वर्ष 2021-22 का बजट पेश करेगी। यह बजट कोरोना वायरस महामारी के बीच पेश हो रहा है। इस महामारी से बचाव के लिए हुए लॉकडाउन ने लाखों लोगों से उनका काम छीन लिया था। लेकिन इस दौरान एक योजना जो लोगों को राहत दे रही थी, वो थी मनरेगा। सरकार ने वित्त वर्ष के बीच में ही इस योजना को बजट से अतिरिक्त राशि आवंटित की। अब जब एक फ़रवरी को बजट पेश हो रहा है तो ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि क्या इस बार सरकार इस योजना के बजट में कोई इज़ाफ़ा करेगी?

मनरेगा यानी महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम के तहत सरकार हर ग्रामीण परिवार को साल में 100 दिन के रोज़गार की गारंटी देती है। कोरोना संकट में लॉकडाउन के दौरान अपने गाँवों को लौटे लाखों प्रवासी मज़दूरों के लिए मनरेगा मददगार बनकर उभरी।

वित्त वर्ष 2020-21 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में मनरेगा के लिए 61,500 करोड़ रुपए आवंटित किए। कोरोना संकट शुरू होने के बाद केंद्र सरकार ने इस योजना के लिए 40,000 करोड़ रुपए के अतिरिक्त बजट का ऐलान किया। पूरे वित्त वर्ष में इस योजना के लिए कुल एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा आवंटित किए गए। इसके बावजूद वर्ष 2020 पहली छमाही में ही मनरेगा योजना में 64,000 करोड़ रुपए खर्च किये जा चुके थे, अब सवाल उठता है कि जब देश में रोज़गार की हालत अभी भी कोरोना महामारी से पहले स्तर पर नहीं पहुंच पाई है तो क्या केंद्र सरकार इस बजट में मनरेगा को दी जाने वाली राशि को बढ़ाएगी?

मनरेगा में रोज़गार की मांग अभी भी उच्च स्तर पर बनी हुई है। दिसम्बर में मनरेगा योजना की सरकारी वेबसाइट की एमआईएस रिपोर्ट को ट्रैक करने के लिए बनाए गए कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और अन्य नागरिकों के एक समूह पीपुल्स एक्शन फॉर एम्प्लॉयमेंट गारंटी (पीएईजी) ने मनरेगा पर नरेगा ट्रैकर नाम से रिपोर्ट जारी की है।

छत्तीसगढ़ राज्य में कोरोना से जुड़े नियमों का पालन करते हुए मनरेगा के तहत काम करते ग्रामीण मजदूर। फोटो साभार : @TS_SinghDeo

रिपोर्ट के निष्कर्षों में सामने आया कि मनरेगा में अब तक का रिकॉर्ड बजट दिए जाने के बावजूद देश भर में 97 लाख ग्रामीण परिवारों को एक भी दिन का काम नहीं मिल सका, जबकि उन्होंने रोज़गार की मांग की थी। इस रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि मनरेगा में रोज़गार के लिए जॉब कार्ड को लेकर आवेदन करने वाले 45.6 लाख परिवारों के जॉब कार्ड तक नहीं बन सके।

रिपोर्ट में अब तक मनरेगा में बजट की धनराशि खर्च होने को लेकर भी तस्वीर पेश की गयी है। इसमें सामने आया है कि कई राज्यों को मनरेगा के लिए मिली धनराशि वित्त वर्ष की पहली छमाही में ही खर्च हो चुकी है।

रिपोर्ट के अनुसार नवंबर तक 74,563 करोड़ यानी 71 फीसदी राशि खर्च की जा चुकी थी, जबकि कई राज्यों का मज़दूरी और सामग्री का लंबित भुगतान 9,590 करोड़ रुपए (9.1 फीसदी) बकाया है। ऐसे में राज्यों के पास मनरेगा के लिए बजट की कमी है।

नरेगा ट्रैकर की 30 नवम्बर, 2020 की रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में 97 लाख से ज्यादा ग्रामीण परिवारों को नहीं मिल सका रोजगार।

नई दिल्ली में मानव विकास संस्थान में सेंटर फॉर जेंडर स्टडीज की चेयरपर्सन और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की पूर्व प्रोफेसर आशा कपूर मेहता ने 'गाँव कनेक्शन' को बताया, "वास्तव में मनरेगा ग़रीबों के लिए एक सहारा है कि अगर कुछ न मिले तो मनरेगा तो है। इसकी जरूरत हमेशा से ज्यादा रही है, मगर कोरोना महामारी के दौरान हमें मनरेगा की असल अहमियत पता चली। हर गरीब से ग़रीब व्यक्ति को काम मिलना चाहिए और कानून के तहत राइट टू वर्क की ज़िम्मेदारी सरकार की है।"

"सरकार को मनरेगा को और आगे बढ़ाना चाहिए, जहाँ भी रोज़गार की मांग हो, बिना ढील दिए वहां लोगों को काम दिलाएं, इसलिए इसका बजट फ्लेक्सिबल (लचीला) होना चाहिए, जब तक आप अपने देश में काम के अवसर नहीं पैदा कर पा रहे हैं, तब तक सरकार को मनरेगा को बढ़ावा देना चाहिए," आशा कपूर ने आगे कहा।

वास्तव में मनरेगा गरीबों के लिए एक सहारा है कि अगर कुछ न मिले तो नरेगा उसके लिए होना चाहिए। इसकी जरूरत हमेशा से ज्यादा रही है, मगर कोरोना महामारी के दौरान हमें मनरेगा की असल अहमियत पता चली। हर गरीब से गरीब व्यक्ति को काम मिलना चाहिए और कानून के तहत राइट टू वर्क की जिम्मेदारी सरकार की है।

आशा कपूर मेहता, चेयरपर्सन, सेंटर फॉर जेंडर स्टडीज, मानव विकास संस्थान, नई दिल्ली

पिछले कुछ साल में केंद्रीय बजट से मनरेगा को मिले आवंटन पर ग़ौर करें तो हर साल मनरेगा के लिए बजट बढ़ाया जाता रहा है।

केंद्रीय बजट

मनरेगा के लिए आवंटित धनराशि

वर्ष 2016-17

38,500 करोड़ रुपए

वर्ष 2017-18

48,000 करोड़ रुपए

वर्ष 2018-19

55,000 करोड़ रुपए

वर्ष 2019-20

60,000 करोड़ रुपए


(नोट : जरूरत पड़ने पर वित्त वर्षों के बीच में मनरेगा के लिए बजट बढ़ाया भी गया)

दूसरी ओर आवंटित धनराशि के खर्च पर ग़ौर करें तो वर्ष 2018-19 में 69,619 करोड़ रुपये, वर्ष 2019-20 में 68,260 करोड़ रुपये और वर्ष 2020-21 में अब तक 89,009 करोड़ रुपये मनरेगा में खर्च किये जा चुके हैं। ऐसे में कई राज्यों के पास मनरेगा के लिए अभी भी बजट की कमी है।

आंध्र प्रदेश में मनरेगा शोधकर्ता चक्रधर बुद्धा ने 'गाँव कनेक्शन' से कहा, "असल में हर साल ऐसा होता है कि केंद्रीय बजट की आवंटित धनराशि मिलने के बाद ही पिछले सालों के मज़दूरी और सामग्री के भुगतान किए जाते हैं। अगर आंध्र प्रदेश की ही बात करें तो इस वर्ष राज्य में 25 करोड़ मानव दिवस को पूरा करने का लक्ष्य मनरेगा में तय किया गया था, यह लक्ष्य बहुत पहले ही पूरा हो जाता अगर राज्य सरकार को केंद्र सरकार से पैसा मिल जाता। वास्तव में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों में ही मनरेगा के लिए 10 से 12 हजार करोड़ रुपये के बजट की जरूरत होती है।"

मनरेगा मजदूर। फोटो साभार : @TS_SinghDeo

मानव दिवस यानी एक व्यक्ति को एक दिन का काम मिलता है तो वह एक मानव दिवस कहलाता है। मान लीजिए किसी राज्य में सरकार ने 5 करोड़ मानव दिवस रोज़गार उपलब्ध कराया और उस राज्य में मनरेगा के तहत 10 लाख मज़दूरों को काम मिला तो इसका अर्थ ये है कि उस राज्य में औसतन एक मज़दूर को 50 दिन का काम ही मिला है।

इस बार केंद्रीय बजट को लेकर मनरेगा शोधकर्ता चक्रधर कहते हैं, "ऐसे समय में जरूरत इस बात की है कि जितने दिन लोग मनरेगा में लोग रोज़गार मांगे, उन्हें उतने दिन का रोज़गार दिया जाए, कोई भुगतान लंबित होने पर उसका मुआवजा भी दिया जाए और साथ ही काम न मिलने पर बेरोज़गारी भत्ता भी लोगों को मिले, मनरेगा में काम की मांग बहुत ज्यादा है, ऐसे में सरकार को बजट में मनरेगा के लिए कम से कम दो लाख करोड़ रुपए के आवंटन के बारे में सोचना चाहिए।"

इस वित्त वर्ष में ग्रामीण परिवारों को रोज़गार मिलने के आंकड़ों को देखें तो अब तक 6.98 करोड़ ग्रामीण परिवारों को मनरेगा में रोज़गार मिला है जो वर्ष 2019-20 में 5.48 करोड़ और वर्ष 2018-19 में 5.27 करोड़ ग्रामीण परिवारों से कहीं ज्यादा है।

इसके बावजूद देश भर में लाखों की संख्या में घर वापसी करने वाले प्रवासी मज़दूर और ग्रामीण ऐसे रहे जिनको मनरेगा में मांगने के बावजूद रोज़गार नहीं मिल सका।

कोरोना संकट में लॉकडाउन के दौरान केंद्र सरकार ने 21 अप्रैल से ग्रामीणों को मनरेगा में काम करने की छूट दी थी। ग्रामीण भारत के सबसे बड़े मीडिया प्लेटफार्म गांव कनेक्शन ने 30 मई से लेकर 16 जुलाई, 2020 के बीच देश के 20 राज्यों और तीन केंद्र शासित राज्यों के 179 जिलों में 25,371 लोगों के बीच सर्वे किया। गांव कनेक्शन के इस सर्वे के दौरान 80 फीसदी ग्रामीणों ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें या उनके परिवार के किसी सदस्य को मनरेगा में काम नहीं मिला।

ऐसे में अपना रोजगार खो चुके और घर वापसी कर गाँव को लौटे प्रवासी मजदूरों और ग्रामीणों के लिए मनरेगा में रोजगार की भारी मांग शुरू से ही रही जो अभी भी बनी हुई है।

नई दिल्ली की जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी में तीन दशकों तक रहे अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे अरुण कुमार कहते हैं, "अभी भी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो शहरों को वापस नहीं आए हैं, ऐसे में उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति अभी भी बिगड़ी हुई होगी, इसलिए यह ऐसा समय है कि रोज़गार की स्थिति को और मजबूत किया जाए। सरकार 100 दिन की बजाए कम से कम 150 दिन ग्रामीणों को मनरेगा में काम दे और मनरेगा का बजट कम से कम दो गुना बढ़ाए।"

फिलहाल कोरोना महामारी के बीच इस बार केंद्रीय बजट को लेकर इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च ने 10 बिंदुओं में अपने सुझाव दिए हैं, इनमें से एक सुझाव मनरेगा को लेकर भी दिया गया है। इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के मुख्य अर्थशास्त्री सुनील कुमार सिन्हा ने कहा है कि मनरेगा में अधिक से अधिक आवंटन किया जाए क्योंकि इससे न केवल ग्रामीण परिवारों को बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन करने वाले श्रमिकों को भी एक सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जा सकेगी।

वास्तव में मनरेगा का प्रावधान यह कहता है कि जब रोजगार की मांग हो तो लोगों को काम उपलब्ध कराया जाए, तो निश्चित रूप से यह बजट की सीमा से तय नहीं होता, यह नहीं किया जा सकता कि बजट ख़त्म हो गया और हम लोगों को काम नहीं दे सकते।

रक्षिता स्वामी, राईट टू वर्क अभियान, मनरेगा

कई साल से मनरेगा के तहत कई 'राईट टू वर्क' अभियानों और मनरेगा मज़दूरों के अधिकारों के लिए काम कर रहे मनरेगा संघर्ष मोर्चा से जुड़ी, रक्षिता स्वामी का मानना है कि मनरेगा के लिए केंद्र सरकार को एक लाख करोड़ रुपए से अधिक के बजट पर ज़ोर देना चाहिए।

रक्षिता स्वामी ने 'गाँव कनेक्शन' को बताया, "कोरोना महामारी के दौरान मनरेगा के लिए एक लाख करोड़ रुपये का बजट मिला और हम देख रहे हैं कि ग्रामीण स्तर पर रोज़गार की मांग कहीं ज्यादा है इसलिए हम पीछे मुड़कर नहीं देख सकते।"

"वास्तव में मनरेगा का प्रावधान यह कहता है कि जब रोज़गार की मांग हो तो लोगों को काम उपलब्ध कराया जाए, तो निश्चित रूप से यह बजट की सीमा से तय नहीं होता, यह नहीं किया जा सकता कि बजट ख़त्म हो गया और हम लोगों को काम नहीं दे सकते। बल्कि जरूरत इस बात की है कि जरूरत पड़ने पर अधिक बजट दिया जाए, इसलिए सरकार को कम से कम एक लाख करोड़ रुपए का बजट मनरेगा के लिए आवंटित करना चाहिए।"

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