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महिलाएं बोलीं -'हम घरों में ताले लगाकर आये हैं, जब तक मोदी सरकार क़ानून वापस नहीं लेगी तब तक पंजाब वापस नहीं लौटेंगे'

ये महिला किसान झंडे लेकर सड़कों पर भी चल रही हैं और भूख लगने पर रोटियां भी बना रही हैं। ये वो महिला किसान हैं जिनका कहीं आंकड़ों में जिक्र ही नहीं है कि जीडीपी और सकल घरेलू उत्पाद में इनका कितना योगदान है? लेकिन बड़ी तादाद में महिला किसानों ने सड़कों पर उतरकर ये साबित कर दिया है कि वो खेतों में काम करने तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि ये बड़े प्रोटेस्ट का भी हिस्सेदार हैं।

Daya SagarDaya Sagar   27 Nov 2020 2:41 PM GMT

अरविंद शुक्ला/दया सागर

संगरूर पंजाब। कृषि कानूनों के विरोध में सड़कों पर उतरे हजारों किसानों के बीच कंधे से कंधा मिलाकर एक बड़ा समूह महिला किसानों का भी सड़कों पर है। पंजाब की जुझारू महिला किसान बच्चों के साथ ट्राली पर बैठकर दिल्ली की दूरी नाप रही हैं। कुछ दिल्ली तक पहुंच गयी हैं और कुछ हरियाणा और पंजाब के अलग-अलग हिस्सों में डटी हुई हैं। इनके बुलंद हौसलों के आगे झुकमे हुए आख़िरकार दिल्ली पुलिस ने बुराड़ी के निरंकारी मैदान में शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने की इजाजत दे दी है।

ये किसान दिल्ली तक न पहुंच सकें इसके लिए जगह-जगह बैरिकेटिंग लगाई गयीं। सड़क पर कई जगह गड्ढे खोदे गये, बड़े-बड़े पत्थर रखकर इनका रास्ता रोकने की पूरी कोशिश की गयी। इतना ही नहीं प्रोटेस्ट के दूसरे दिन 27 नवंबर को कई जगह किसानों पर आंसू गैस के गोले दागे गये। पानी की बौछारे मारी गईं, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में किसान बैरिकेड्स् तोड़कर, तमाम मुश्किलों से जूझते हुए दिल्ली पहुंचने में सफल रहे।

सड़कों पर हजारों की संख्या में उतरी महिला किसान?


कृषि कानूनों के विरोध में 26 नवंबर से शुरू हुए दिल्ली चलो प्रोटेस्ट मार्च को कवर करने के लिए गाँव कनेक्शन की टीम किसानो के साथ दिल्ली में है। प्रदर्शन में शामिल कई महिला किसनों की उम्र 60-70 साल या इससे भी ज्यादा है पर फिर भी वो इस किसान आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं।

ये झंडे लेकर सड़कों पर भी चल रही हैं और भूख लगने पर रोटियां भी बना रही हैं। ये वो महिला किसान हैं जिनका कहीं आंकड़ों में जिक्र ही नहीं है कि जीडीपी और सकल घरेलू उत्पाद में इनका कितना योगदान है? इकनॉमिक ग्रोथ में इनकी भूमिका नापने का कोई स्केल नहीं है, किसी दस्तावेज में इनका प्रमुखता से नाम भले ही न हो पर फिर भी ये सड़कों पर पुरुष किसानों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर इस मांग की हिस्सेदार हैं। ये मुखर होकर सरकार से सवाल कर रही हैं। बड़ी तादाद में महिला किसानों ने सड़कों पर उतरकर ये साबित कर दिया है कि वो खेतों में काम करने तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि ये बड़े प्रोटेस्ट का भी हिस्सेदार हैं।

ये झंडे लेकर भी चल रहीं और भूख लगने पर रोटियां भी बना रहीं. फोटो: दया सागर.

दिल्ली की तरफ बढ़ रहीं ट्रैक्टर पर बैठी पंजाब के मानसा जिले के हरी बुर्ज की रहने वालीं सरजीत कौर बुलंद आवाज़ में कहती हैं, "सरकार ने जितने काले कानून चलवायें हैं उनका एक भी कानून हम नहीं चलने देंगे। सरकार कितनी भी बहस कर ले लेकिन हम पीछे नहीं हटेंगे। हम अपने पूरे परिवार को लेकर जा रहे हैं इसमें हमारे पोते-पोती भी हैं, जब तक सरकार हमारी मांग नहीं सुनेगी हम तबतक वापस नहीं लौटेंगे।"

इसी गाड़ी में बैठीं बलजीत कौर सरजीत का समर्थन करते हुए कहती हैं, "हम अपने घरों में ताले लगाकर आये हैं, जब तक मोदी सरकार अपने क़ानून वापस नहीं लेगी तब तक हम पंजाब वापस नहीं लौटेंगे। हमें कितने भी दिन दिल्ली में रहना पड़े हम दिल्ली में ही रहेंगे, पर हम वापस नहीं लौटेंगे चाहें बैठे-बैठे हमें मरना ही क्यों न पड़े?"

बलजीत कौर से जब गाँव कनेक्शन ने पूछा कि जगह-जगह बैरिकेड्स् लगाये गये हैं तो आप दिल्ली तक कैसे पहुंचेंगी? इस पर बलजीत बोलीं, "हम सारी बैरिकेड्स् तोड़कर दिल्ली पहुंचेंगे। हम पीछे हटने वालों में से नहीं हैं। सरकार बड़े-बड़े लोगों का कर्ज माफ़ कर देती है पर हम गरीब किसानों के कर्ज की कोई माफी नहीं। हमारी थोड़ी जमीन है वो भी सरकार छीनने में लगी हुई है।"

ये महिला किसान सरकार के तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रही हैं। इनका मानना है कि कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग से इनका नुकसान होगा, ये नहीं चाहती इनकी खेती किसी और को दी जाए। सरजीत और बलजीत की तरह हजारों की संख्या में ये महिला किसान सड़कों पर हैं, छोटे-छोटे बच्चे इनके साथ हैं। सड़क किनारे बैठकर ये खाना बनाती हौं और फिर आगे की रास्ता नापने के लिए तैयार हो जाती हैं।

आठवीं में पढ़ने वाली यासमीन कौर भी है इस प्रोटेस्ट का हिस्सा. फोटो: दया सागर

इस भीड़ में एक बच्ची यासमीन कौर हैं जो आठवीं में पढ़ती हैं, वो कहती हैं, "हम दिल्ली जा रहे हैं, मोदी साहब ने हम किसानो के लिए जो कानून लागू किये हैं उन्हें वापस ले लें। अगर हमारा रास्ता आगे बंद होगा तो उसे तोड़कर हम आगे बढ़ जाएंगे। हम श्री गुरु गोविन्द के वारिश हैं हमें किसी से डर नहीं लगता। हम भी इन काले कानूनों का विरोध कर रहे हैं। मेरा छोटा भाई भी साथ में जा रहा है।"

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार सरजीत और बलजीत जैसी देशभर में छह करोड़ से ज्यादा महिला किसान और खेतिहर मजदूर काम करती हैं। जो हम और आप खाते हैं वो ये महिला किसान ही उगाती हैं पर फिर भी इनकी कोई गिनती नहीं होती। मुंशी प्रेमचंद की कहानियों का किसान, मैथली शरण गुप्त की कविताओं का किसान, हरित क्रांति का किसान, सरकारी नीतियों का किसान, मीडिया का किसान इन सबमें भले ही किसान के रूप में इनका चेहरा प्रमुख न रहा हो पर ये सच है कि खेतों में एक पुरुष साल में 1212 घंटे काम करते हैं वहीं महिला किसान 3485 घंटे काम करती हैं।

तीन कृषि कानूनों को सरकार वापस ले इस लिए ये प्रोटेस्ट चल रहा है. फोटो: अमित पाण्डेय

प्रोटेस्ट में शामिल अमरजीत कौर कहती हैं, "हम गलत मांग नहीं कर रहे हैं, हम अपने हक़ के लिए जा रहे हैं। इन्हें अपने बिल वापस लेने पड़ेंगे। कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग से हमारी जमीन चली जायेगी, बड़े लोग हमारी जमीन पर कब्जा कर लेंगे। हमारे पास कम जमीन है वो भी हम अगर किसी को करने के लिए दे देंगे तो फिर हम क्या खाएंगे? हमारे बच्चे इतने पढ़े-लिखे नहीं हैं कि उन्हें नौकरी मिल सके, खेतों में काम करके ही हमारा खर्च चलता है।"

सब जगह बार्डर पर लगे बैरीगेटिंग को लेकर अमरजीत कहती हैं, "अगर पंजाब वालों का दिल्ली आना मोदी सरकार को इतना ही बुरा लगता है तो बम डालकर हमें खत्म कर दें। हम सब इंतजाम लेकर जा रहे हैं वहीं रहकर रोटी बनायेंगे लेकिन वापस नहीं आएंगे। हम भूखे मर सकते हैं लेकिन अपनी जमीनें नहीं छोड़ सकते।"



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