बिहार में केला उगाने वाले किसान दिल्ली-पंजाब में मजदूरी करने की बात क्यों कर रहे हैं?

बिहार विधानसभा चुनावों के बीच वहां की ये ग्राउंड रिपोर्ट पढ़िये। पढ़िये कि आखिर क्यों बिहार में केले की खेती करने वाले किसान दिल्ली-पंजाब मजदूरी करने की बात कर रहे हैं।

Hemant Kumar PandeyHemant Kumar Pandey   21 Oct 2020 8:15 AM GMT

किशनगंज (बिहार)। "इस साल आंधी और बारिश के साथ नदी के कटाव भी हमारा काफी नुकसान किया है। नदी (कनकई) के किनारे दो बीघे खेत में केले की खेती था। इसमें आधा नदी में डूब गया। इसके अलावा पांच एकड़ खेत जो में केला लगाए थे, उसको भी आंधी और भारी बारिश के चलते काफी नुकसान पहुंचा है। करीब 500 पेड़ गिर गये।" बिहार के दिघलबैंक स्थित आठगछिया पंचायत निवासी अमीन हुसैन अपना केला का बगान दिखाते हुए कहते हैं।

अमीन हुसैन किशनगंज जिले के उन सैकड़ों किसानों में एक हैं, जो पहले धान की खेती करते थे, लेकिन अब धान की तुलना में अधिक मुनाफा होने की वजह से आजीविका के लिए केले की खेती पर निर्भर हैं। इस साल केले की खेती में नुकसान और सरकारी अनदेखी ने उनके सामने संकट की स्थिति पैदा कर दी है।

"इस बार दो लाख रुपए का केसीसी कर्ज लेकर केला लगाए, लेकिन अब नुकसान के चलते हम लोन कैसे चुका पाएंगे? अभी जो हमारी हालत है, उससे लगता है कि लोन चुकाने के लिए हम लोगों को पंजाब जाकर मजदूरी करना होगा।" अमीन कहते हैं। इससे पहले जब हमने बाढ़ प्रभावित इलाकों में अन्य किसानों से भी बात की थी तो उनमें भी अधिकांश का कहना था कि खेती योग्य जमीन रहने के बावजूद वे दिल्ली-पंजाब में रोजगार करने को मजबूर हैं। बाढ़ और अन्य कारणों से फसल को जो नुकसान होता है, इसकी भरपाई के लिए सरकार की ओर से कोई मुआवजा भी नहीं मिलता है।

आठगछिया पंचायत निवासी अमीन हुसैन अपना केला का बगान दिखाते हुए।

आज से कुछ दशक पहले बिहार में केले की खेती भागलपुर और इसके आस-पास के इलाकों में अधिक होती थी, लेकिन अब यह धीरे-धीरे राज्य के दूसरे इलाकों के किसान भी बड़े पैमाने पर केले की खेती करते हैं। इनमें किशनगंज जिला भी शामिल है। इस जिले के किसान मालभोग केले की अधिक खेती करते हैं। मालभोग केले की बाजार में अधिक मांग होती है साथ ही, इसकी कीमत भी अधिक मिलती है।

"अभी 800 रुपए कुंतल केला बिक रहा है। पिछले साल यह 2,000 रुपए था। इस साल हमारा बहुत नुकसान हुआ है, लेकिन इसके बावजूद उत्पादन अधिक है। माल बिक नहीं पा रहा। अभी भी जो बचा हुआ है, अगर उसे सही कीमत पर बेच देंगे तो हमारा नुकसान कम हो सकता है।" तलवारबंधा के रहने वाले किसान मोहम्मद इमरान आलम कहते हैं।

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इमरान पिछले 10 साल से केले की खेती कर रहे हैं। उन्होंने भी एक लाख रुपए का कर्ज लेकर इस बार खेती की थी लेकिन आंधी से उनका भी डेढ़ लाख से अधिक का नुकसान हुआ है। इसके अलावा आंधी और अधिक बारिश ने उनकी लागत को बढ़ाने का काम किया है। इमरान कहते हैं, "इससे पहले हमने कभी भी केले के पेड़ों को बांस और रस्सी का सहारा नहीं दिया था, लेकिन इस बार ऐसा करना पड़ रहा है। इसके लिए हमें खेती में अधिक पैसा खर्च करना पड़ा है।"

देश में वर्ष 2018-19 के दौरान लगभग 8.66 लाख हेक्टेयर भूमि पर केले की खेती हुई थी। उत्पादन लगभग 30,460,000 मिलियन टन था। जबकि बात अगर बिहार की करें तो यहां वर्ष 2017-18 के दौरान कुल 31,000 हेक्टेयर में केले की खेती हुई थी और उत्पादन लगभग 14,000 मिलियन टन था।

आंधी-बारिश के कारण केले की खेती करने वाले किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ा है।

वे आगे हमें बताते हैं कि लॉकडाउन खत्म होने के बावजूद केला बाहर भेजने में हमें परेशानी हो रही है। इमरान कहते हैं, "ट्रांसपोर्ट वालों का कहना है कि रास्ते में अभी भी पुलिस वाले उनकी रोक-टोक करते हैं, इसके चलते उन्हें काफी परेशानी हो रही है और वे दूसरे राज्यों में माल नहीं ले जाना चाहते हैं।"

मौसम में बदलाव ने भी किसानों की परेशानी बढ़ाने का काम किया

इस साल उत्तर और पूर्वी बिहार में मौसम में काफी बदलाव देखने को मिला है। सितंबर के आखिरी हफ्ते में भी इस इलाके के लोगों को बाढ़ की स्थिति का सामना करना पड़ा। भारी बारिश के बाद तेज धूप और गर्मी ने भी केला उत्पादक किसानों की परेशानी बढ़ाने का काम किया।

"मौसम चेंज होने के कारण समय से पहले केला पक रहा है। अभी इसके पकने का समय नहीं है, लेकिन बारिश के बाद काफी तेज धूप हो जाती है, जिसके चलते ये बिना ग्रोथ के ही पक रहा है। बाजार में इसकी अधिक कीमत नहीं है। वहीं, थोक व्यापारी इसे नहीं खरीदना चाहते।" इमरान कहते हैं।

बदलते मौसम के चलते केवल केला समय से पहले ही नहीं पक रहा है बल्कि, इसकी खेती करने में किसानों को शुरूआत से ही परेशानी का सामना करना पड़ा है।

"इस साल बेमौसम बारिश काफी हुई है। इसके चलते हम लोगों को केले की खेती करने में भी काफी पसीना बहाना पड़ा है। इस बार अधिक बारिश होने के चलते बहुत समय तक खेत में पानी लगा रहा। इसके चलते पौधा खराब होना लगा।" दिघलबैंक के किसान सफीउर रहमान कहते हैं।

मोहम्मद इमरान आलम कहते हैं कि ज्यादा गर्मी ने भी केला उत्पादकों की परेशानी को बढ़ाया है।

अक्टूबर के दूसरे हफ्ते में उनके खेत में पहुंचने के लिए हमें कीचड़ भरे रास्तों से गुजरना पड़ा। उनके बगान की मिट्टी अभी भी काफी गीली है। इसके चलते जब हम केले के पेड़ों के बीच से होकर गुजरते हैं, तो जूते-चप्पल के नीचे मिट्टी की कई परतें चढ़ चुकी होती हैं। इससे हम इस बात का अनुमान लगा सकते हैं कि बेमौसम बारिश के दिनों में इस इलाके के किसानों को केले की खेती करने में कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा होगा।

सफीउर हमें आगे बताते हैं, "इसके अलावा पौधे की बढ़ोतरी के लिए समय पर खाद भी नहीं दे पाये। इन बातों के चलते जो पौधे में ग्रोथ होना चाहिए था, वह नहीं हो पाया।"

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सफीउर रहमान अपने तहस-नहस हो चुके केले के बगान के बीच हमें बताते हैं कि आंधी और तेज बारिश के चलते उन्हें भी डेढ़ लाख रुपए से अधिक का नुकसान हुआ है। केले की खेती करने के लिए उन्होंने बैंक से 50,000 रुपए का केसीसी कर्ज लिया था। इसके अलावा बाकी रकम घर से खर्च किया था। वे बताते हैं कि अब तक वे केले की खेती पर तीन लाख रुपए से अधिक खर्च कर चुके हैं।

इन सबके के बीच भी उन्हें सरकार से कोई उम्मीद नहीं है। वे निराशा के साथ कहते हैं, "हमारा जो अब तक नुकसान हुआ है, उसकी जांच के लिए अब तक कोई अधिकारी नहीं आए है। हमें सरकार से उम्मीद भी नहीं होती है। कई बार धान की फसल बाढ़ में डूब गई। वह (कर्मचारी) लिखकर भी गया था, लेकिन हम लोगों को कुछ मिला नहीं। हम लोग खेती किसानी पर ही निर्भर हैं। अब नुकसान हुआ है तो कर्ज होगा ही।"

केला के पेड़ों को बांस के सहारे किसी तरह खड़ा किया गया है।

हमने केला उगाने वाले किसानों के नुकसान और मुआवजे को लेकर दिघलबैंक प्रखंड के विकास पदाधिकारी (बीडीओ) से जवाब चाहा तो उन्होंने इस पर टिप्पणी करने से साफ इनकार कर दिया।

डॉ. कलाम एग्रीकल्चरल कॉलेज, किसनगंज के एसोसिएट डीन सह प्रिंसिपल डॉ. वीबी झा से हमने मौमस को लेकर बात की। उन्होंने बताया, "केले की खेती निचले या मध्यम जमीन में करने को कभी नहीं कहते हैं। केले की खेती हमेशा ऊपरी जमीन में होती है। इस साल यहां (किशनगंज) में अप्रैल से लेकर अक्टूबर के पहले हफ्ते तक बारिश होती रही। इस स्थिति में जमीन में हमेशा पानी बना रहा। ये स्थिति केले के लिए काफी नुकसानदायक होता है।"

"बारिश के बाद अगर पारा बढ़ता है तो केले का पकना शुरू हो जाएगा। केले देरी से पके इसके लिए हम जमीन में नाइट्रोजन देते हैं, लेकिन किसानों को वैज्ञानिक जानकारी नहीं है, इसके चलते उनको नुकसान उठाना पड़ता है। किसान को कोई समस्या होती है तो वह इस मामले के विशेषज्ञ के पास न जाकर सीधे कीटनाशक दुकानदारों के पास पहुंच जाते हैं। मौसम में बदलाव के बावजूद अगर किसानों को सही जानकारी और जागरूकता हो तो संभावित नुकसान से बचा जा सकता है।" वे आगे कहते हैं।

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प्रखंड कृषि पदाधिकारी नरेश मंडल ने पहले तो इस बात को साबित करना चाहा कि उनके इलाके में आंधी का प्रकोप नहीं है। इसके चलते कोई नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन जब हमने कहा कि नुकसान हुआ है और हमने अपनी आंखों से देखा है तो इस पर उनका जवाब था, "इसकी रिपोर्ट जिला को भेज दी गई है।" लेकिन जब हमने नरेश मंडल से ये पूछा कि इस रिपोर्ट क्या दर्ज किया गया है? आपने इस रिपोर्ट को देखा है या नहीं? इस पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

इस तरह के कई सवाल तो इस इलाके के किसानों के दिमाग में हमेशा ही उठते रहते हैं कि हर बार जब उनका नुकसान होता है तो उन्हें सरकार देखने के लिए क्यों नहीं आती? अगर आती भी है तो नुकसान और मुआवजे की बात रिपोर्ट के पन्नों में ही क्यों सिमट कर रह जाती है? कृषि से संबंधित अधिकारी इन रिपोर्टों को पढ़ते भी हैं या नहीं?

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