दोष शिक्षामित्रों का नहीं,सरकारों का है

दोष शिक्षामित्रों का नहीं,सरकारों का हैgaoconnection

आए दिन सड़कों पर शिक्षामित्रों की भीड़ दिखाई देती है, यह शिक्षा-मित्र की भूमिका तो नहीं है। ऐसे हालात पैदा करने के लिए सरकारें जिम्मेदार हैं जिन्होंने सोचा था अठारह सौ रुपया हर महीने देते रहेंगे और महीनों का काम लेते रहेंगे। अर्थात सरकारों ने शिक्षित बेरोजगारों को ठगने का प्रयास किया था। दांव उल्टा पड़ गया। 

अनेक साल पहले तत्कालीन सरकार ने नियमित शिक्षित नियुक्त करने के बजाय एक योजना बनाई कि गाँवों के शिक्षित बेरोजगारों को ग्यारह महीने के लिए ग्राम प्रधान और प्राइमरी स्कूल के प्रधानाध्यापक/ प्रधानाध्यापिका की संस्तुति पर नियुक्त किया जाए। शर्त यह थी कि अभ्यर्थी प्रधान के परिवार का न हो और ग्यारह महीने के अन्त में दुबारा नए सिरे से नियुक्ति हो। ऐसा हुआ नहीं। अनेक बार उन्हीं शिक्षामित्रों को फिर से नियुक्त कर लिया गया और उसी पंचायत में बेहतर शिक्षा वाले अभ्यर्थी देखते ही रह गए। उनके आवेदन ही नहीं लिए गए।  

शिक्षामित्रों की समझ में आने लगा कि नियमित अध्यापक और अध्यापिकाएं उनसे दस गुना वेतन लेकर वही पढ़ाती हैं जो वे पढ़ाते हैं और कभी आए कभी आए भी नहीं। यह विसंगति असहनीय थी। शिक्षामित्रों ने संगठित होकर बहुत बड़ा वोट बैंक बना लिया जो किसी भी पार्टी के लिए आकर्षक था। ग्यारह महीने के बजाय साल भर की नौकरी होने लगी और हर साल नियुक्ति के बजाय लगातार नियुक्ति होने लगी। जो वंचित रह गए थे उनके लिए रेलगाड़ी छूट गई और जो पिछले दरवाजे से आ गए थे वे अपनी सम्भावनाएं तलाशने लगे। नए प्रधान चुने गए लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाए कि सरकारी राजाज्ञा देखकर उसके उनुसार काम करें। 

वोट बैंक हथियाने के चक्कर में राजनैतिक दलों ने उनके नियमितीकरण की कात उठाई। उन्हें प्रशिक्षित करके अर्ह बनाकर नियुक्ति आरम्भ हुई। अदालतों का हस्तक्षेप होता रहा लेकिन जिन पदों को विज्ञापित करके भरा जाना चाहिए था उन्हें कार्यरत शिक्षामित्रों में से भरा गया। अब कोई विकल्प नहीं है सिवाय सभी शिक्षामित्रों को नियमित करके पूरा वेतन देने के। ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता की बातें करना कहां तक जायज है। यह पत्रकारों के लिए रिसर्च का विषय है। इससे सुर्खियां भले ही न बनें, सच्चाई सामने आ सकती है।

शिक्षामित्रों का प्रावधान गलत नहीं था लेकिन इस प्रावधान को लागू करने का तरीका गलत रहा। उचित होता शिक्षामित्रों की नियुक्ति, उनका वेतन, उन्हें निकालने की व्यवस्था सब कुछ पंचायत पर छोड़ दिया गया होता और पंचायत निधि में बजट का प्रावधान कर देते। लेकिन सरकारी अधिकारी और कर्मचारी ऐसा विकेन्द्रीकरण कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे। 

शिक्षा ही नहीं अब तो मित्रों की लाइन लग गई है- किसान मित्र, बैंक मित्र, पंचायत मित्र जो सरकार बदलने के साथ ही बनते और जाते रहते हैं। कुछ मामलों में तो स्थायी सोच होना चाहिए। कम से कम शिक्षा में। 

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