Election results 2018: लोकसभा चुनाव से पहले किसानों की पहली जीत ?

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   14 Dec 2018 11:00 AM GMT

Election results 2018: लोकसभा चुनाव से पहले किसानों की पहली जीत ?

लखनऊ। राजस्थान के नागौर में एक चुनाव सभा को संबोधित करते हुए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था "कुछ लोग ऐसे हैं जिनको मालूम नहीं है कि चने का पौधा होता है या पेड़, जो मूंग और मंसूर में फर्क नहीं समझते वो आज देश को किसानी सीखाने के लिए घूम रहे हैं।"

चुनाव खत्म हो चुके हैं। परिणाम भी आ चुके हैं। किसानों ने प्रधानमंत्री के आरोपों को दरकिनार करते हुए यह बता दिया है कि किसानों को इसकी चिंता नहीं है कि राहुल गांधी को खेती आती है कि नहीं, लेकिन देश की सरकार ने उनके लिए क्या किया, इसका हिसाब वे जरूर रखते हैं, जैसा कि उन्होंने तेलंगाना में किया।

अक्टूबर के महीने में गाजियाबाद, उसके बाद 29 और 30 नवंबर को दिल्ली में दो दिन तक हुए किसान रैली पर अगर आपने गौर किया होगा तो समझ गये होंगे कि किसान कितना परेशान है। जिस समय खेत को किसानों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, उस समय किसान दिल्ली की सड़कों पर था। इससे पहले सितंबर महीने में भी लगभग 30,000 किसान 15 दिन तक पैदल और ट्रैक्टर से दिल्ली पहुंचे। वे सैकड़ों किमी की यात्रा करके सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए देश की राजधानी पहुंचे थे। इस रैली में मध्य प्रदेश के भी हजारों किसान पहुंचे थे, इससे पहले मध्य प्रदेश के किसानों ने गांव बंद करके भी अपना विरोध जताया था। दिल्ली में हुई रैली में किसान बाहुल्य मालवा इलाके से भी किसान पहुंचे थे, सभी में नाराजगी थी। मालवा इलाके में इस बार बीजेपी बुरी तरह हारी है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ के किसान भी परेशान हैं।

मध्य प्रदेश में 126 सीटें ग्रामीण क्षेत्रों में आती हैं जिनमें से कांग्रेस ने 68 पर जीत दर्ज की है जबकि 2013 में 38 सीटों पर ही जीत मिली थी, तब 37 फीसदी ही मत कांग्रेस के पक्ष में था। इस कांग्रेस के वोटों में चार फीसदी का इजाफा हुआ है और उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों का 41 फीसदी मत मिला है। वहीं भाजपा को 2013 में 87 ग्रामीण सीटें मिली थीं जो इस बार घटकर 57 पर पहुंच गयी। मत भी 45 से घटकर 40 फीसदी पर पहुंच गया।

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सरकार फसल बीमा की बात करती रहती है, लेकिन फसल बीमा से किसानों को कम बीमा कंपनियों को ज्यादा फायदा है। कृषि मंत्रालय के आंकड़े के हिसाब से 2016 और 2017 में खरीफ फसल के लिए जो बीमा हुए थे उसमें बीमा कंपनियों को 10000 करोड़ के करीब फायदा हुआ है। इससे पता चलता है कि किसान फसल बीमा को लेकर जो सवाल उठा रहे हैं वो सही है। रैली के दौरान कई किसानों ने कहा था कि फसल बीमा नहीं बल्कि फ्रॉड बीमा है।

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में शहरी के मुकाबले ग्रामीण आबादी ज्यादा है। यहां अब भी 70 से 80 फीसदी ग्रामीण पूर्ण रूप से कृषि पर निर्भर हैं। पिछले साल मध्य प्रदेश के मंदसौर में विरोध प्रदर्शन के दौरान गोली लगने से किसानों की मौत ने किसानों को बीजेपी से दूर कर दिया।

किसान कैसे सबसे बड़ा फैक्टर साबित हुआ इसका उदाहरण तेलंगाना के परिणामों से भी लगाया जा सकता है। तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) पार्टी एक फिर सरकार बनाने जा रही है। के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) एक बार फिर प्रचंड बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं।

लेकिन अगर आंकड़ों की मानें तो मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से 15 सालों में कृषि विकास दर में लगातार बढ़ोतरी हुई है। पिछले 10 साल से कृषि में यह प्रदेश नंबर वन बन गया, लेकिन फिर भी यहां के किसानों की स्थिति अच्छी नहीं हुई। इसका सबसे बड़ा कारण उत्पादन का उचित दाम नहीं मिलना। जिससे किसानों की आय में वृद्धि नहीं हुई जिस हिसाब से खेती करने में खर्च होते हैं। उस हिसाब से फसल की कीमतें नहीं बढ़ी। इसलिए किसानों ने नाराज होकर शिवराज सरकार के खिलाफ वोट दिया।

दिल्ली में किसानों ने पिछले दिनों सरकार की नीतियों और आपनी मांगों को लेकर किया था प्रदर्शन।

इस बारे में मध्य प्रदेश किसान कांग्रेस के अध्यक्ष केदार सिरोही कहते हैं "कागजी आंकड़ें शहर के लोगों को दिखाने के लिए थे। किसानों ने बता दिया है कि जमीनी हकीकत कुछ और ही है। ये जीत पूरी तरह से किसानों की जीत है। प्रदेश की शिवराज सिंह सरकार ने किसानों से जो वादाखिलाफी की थी उनका फल उन्हें मिल गया है। यह रिजल्ट यह भी बताता है कि जिन मुद्दों को लेकर सड़क पर थे वे सही थे, किसान परेशान थे, उनको उपज का सही मूल्य नहीं मिल रहा था, इसलिए उन्होंने कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया।"

मध्य प्रदेश के मालवा और निमाड़ा क्षेत्रों में 66 सीटें हैं। यहां 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को महज नौ सीटें ही मिली थीं जिनकी संख्या इस बार 35 पहुंच गयी, जबकि भाजपा 56 से 28 पर सिमट गयी। इसी तरह महाकौशल की 38 सीटों में से इस बार 24 पर कांग्रेस का कब्जा हो गया है जबकि 2013 में इस क्षेत्र से इनके खाते में 13 सीटें ही थीं। भाजपा को इस क्षेत्र में किसानों की नाराजगी झेलनी पड़ी और संख्या 24 से 13 पर आ गयी।

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छत्तीसगढ़ के रमन सिंह भले ही राज्य में चाउर (चावल) वाले बाबा के नाम से मशहूर हों, लेकिन किसानों की नाराजगी उन पर इस बार भारी पड़ी है। किसानों की नाराजगी सरकार के खिलाफ वोटों में निकल कर आई। किसान लगातार फसलों के दाम को लेकर बीजेपी के खिलाफ प्रदर्शन करते रहे जिसका खामियाजा भारतीय जनता पार्टी को उठाना पड़ा है। चुनाव से ठीक पहले किसानों ने घर-घर जाकर रमन सिंह के खिलाफ पर्चा बांटा था।

10 सितंबर को लगभग दो हजार किसानों का एक जत्था 300 किलोमीटर का सफर करके रायपुर पहुंचा और सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। चुनावी साल में किसानों का यह रवैया सरकार के लिए बड़ी परेशानी का सबब बना।

छत्तीसगढ़ के मौजूदा परिणामों पर नजर डालेंगे तो 53 ग्रामीण सीट जहां किसानों की संख्या ज्यादा है उसमें से कांग्रेस ने 42 सीटें जीतीं। वजह ये दो घोषणाएं- किसानों की कर्जमाफी और धान का समर्थन मूल्य 2500 रुपए करना। धान के समर्थन मूल्‍य को बढ़ाने वाली घोषणा का इतना असर हुआ कि किसान चुनाव तक धान बेचने नहीं पहुंचे। प्रदेश में 35 लाख किसान हैं, इसे ही ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में किसानों को ही केंद्र में रखा और बाजी अपने पक्ष कर लिया।

इस बारे में स्वराज इंडिया राष्ट्रीय अध्यक्ष योगेंद्र यादव कहते हैं "यह तय हो गया है कि 2019 का लोकसभा चुनाव अब हिंदू-मुसलमान के मुद्दे पर नहीं, किसान और नौजवान के मुद्दे पर होगा। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ तीनों राज्यों में भाजपा के सिंहासन को हिलाने का काम किसान और ग्रामीण वोटर्स ने किया है। परिणामों और सर्वेक्षणों, दोनों से स्पष्ट है कि बीजेपी के खिलाफ गांव देहात और गांव में भी किसानों के बीच गुस्सा अपेक्षाकृत ज्यादा था।"

मृतक किसानों के परिजन मुआवजे की मांग कर रहे हैं।

योगेंद्र यादव आगे कहते हैं "वसुंधरा राजे सिंधिया की सरकार के खिलाफ उमड़ते भारी जनाक्रोश और शिवराज सिंह चौहान के शासन में चहुंओर फैल चुके ग्रामीण-संकट को अगर कांग्रेस भुनाने में नाकाम रही तो समझिए कि इस पार्टी के साथ कोई भारी गड़बड़ है। कांग्रेस बेशक पिछले पांच साल से विपक्ष में हैं लेकिन वह कभी विपक्ष की भूमिका निभाते हुए सड़कों पर ना दिखी। छत्तीसगढ़ की कहानी तनिक अलग है। यहां कांग्रेस ने पांच सालों में जमीनी स्तर के आंदोलन चलाये, विरोध-प्रदर्शन भी किये।"

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रमन सिंह ने दावा किया था कि किसानों को उनकी मांग के अनुरूप 21 सौ रुपए प्रति कुंतल धान मूल्य व बोनस सरकार देगी लेकिन यह दांव भी कारगर साबित नहीं हुआ। छत्तीसगढ़ प्रगतिशील किसान संगठन के संयोजक राजकुमार गुप्त कहते हैं "हमने धान का 21 सौ रुपए कुंतल मूल्य नहीं मांगा था। सरकार ने अपने पिछले चुनावी घोषणा पत्र में खुद ही धान का दाम 21 सौ रुपए देने और प्रति वर्ष तीन सौ रुपए बोनस देने का वादा किया था। यह वादा पूरा नहीं किया। जब चुनाव नजदीक आ गए तो दो साल का बोनस थमा दिया। किसानों ने इस धोखे को बखूबी समझा।"

अब एक नजर राजस्थान पर भी डालते हैं। जीरे और मूंगफली की खेती के लिए पहचान रखने वाले इस राज्य के किसान भी परेशान रहे। बाजार में बिकने वाली मूंगफली किसानों से 35 से 40 रुपए खरीदी गयी। हालांकि डैमेज कंट्रोल के लिए वसुंधरा राजे ने चुनाव से ठीक पहले कर्जमाफी की घोषणा करके किसानों को लुभाने का प्रयास किया लेकिन वो नाकाफी साबित हुआ। यहां के 153 ग्रामीण सीटों में से भाजपा के पास 123 सीटें थीं। इस बार कांग्रेस 63 सीटों से आगे हो गई है। किसान आंदोलन से ग्रामीण नाराज हैं। कांग्रेस के कर्ज माफी का वादा यहां भी काम आया।

राजस्थान में किसान कितने नाराज थे इसका अनुमान इससे ही बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है कि अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) को भी दो सीटों पर जीत मिली है। बीकानेर जिले की श्री डूंगरगढ़ और हनुमानगढ़ जिले की भद्रा सीट पर माकपा के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है। 2013 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी।

राजस्थान में माकपा के पार्टी सचिवालय सदस्य रविंद्र शुक्ला कहते हैं "इस बार भी हमने पूरे पांच साल जमीन पर काम किया और राजस्थान में बड़े आंदोलन किए। इनमें किसानों के आंदोलन प्रमुख थे जिनकी वजह से हमें यह सफलता मिली। शुक्ला ने कहा कि हमने किसान आंदोलन में पानी, बिजली और फसल के भाव को प्रमुखता से उठाया था। उन्होंने कहा कि भाजपा और कांग्रेस की आर्थिक नीतियों में बिलकुल भी अंतर नहीं है। वहीं, भाजपा सांप्रदायिक और हिंदुत्व की राजनीति करती है जिसे लोग अब नकारने लगे हैं।"

किसान कैसे सबसे बड़ा फैक्टर साबित हुआ इसका उदाहरण तेलंगाना के परिणामों से भी लगाया जा सकता है। तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) पार्टी एक फिर सरकार बनाने जा रही है। के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) एक बार फिर प्रचंड बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। केसीआर पिछली बार सत्‍ता में आने के बाद किसानों को उनकी जमीन के आधार पर रुपए देने की स्‍कीम लेकर आए थे। ये स्‍कीम पुरानी एमएसपी और अन्‍य सब्‍सिडी व्‍यवस्‍था से एक कदम आगे थी। इसके तहत किसानों को उनके फसल के सीजन के आधार पर रुपए दिए जाते हैं। एक एकड़ पर 4000 रुपए देने का प्रावधान है। ये रुपए साल में दो बार खरीफ और रबी के सीजन में दिया जाता है। ऐसे में किसान को एक एकड़ जमीन पर 8000 रुपए साल में मिलना तय है। अगर किसी किसान के पास पांच एकड़ जमीन है तो साल में 40 हजार रुपए उसे मिलेंगे। ये किसानों के लिए बड़ी राहत है।


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कृषि मामलों के जानकार देविंदर शर्मा कहते हैं "तेलंगाना में किसानों को प्रति एकड़ पर मिलने वाले राशि ने केसीआर की काफी मदद की है। किसानों की नीतियों पर उनके फैसले की वजह से उनकी पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ तेलंगाना में सरकार बना रही है। ऐसे में सभी पार्टियों को ये समझ लेना चाहिए कि किसानों को अब हल्के में नहीं लिया जा सकता।"

वहीं, भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौ. राकेश टिकैत ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि किसान क्रांति यात्रा के दौरान भाजपा ने किसानों पर लाठियां चलवाईं, जिसका बदला धरतीपुत्र ने चुनाव में ले लिया है। उन्होंने कहा, अभी तक पांच राज्यों में चुनाव नतीजे भाजपा के खिलाफ आए हैं। हार के लिए भाजपा स्वयं जिम्मेदार है। हार से सबक लेकर भाजपा किसानों का उत्थान करे, वरना लोकसभा चुनाव में किसान पूरी तस्वीर ही बदल देंगे।"

कांग्रेस ने सभी राज्यों के अपने घोषणापत्रों में किसानों को ही केंद्र में रखा। उदाहरण के तौर पर आप छत्तीसगढ़ में दोनों पार्टियों के घोषणापत्रा देख सकते हैं, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी कांग्रेस का घोषणापत्र कुछ ऐसा ही था-

कांग्रेस के जनघोषणा पत्र में किसानों के लिए प्रमुख वादे

  • किसानों का कर्जा माफ- सरकार बनने के 10 दिनों के भीतर किसानों का कर्जा माफ किया जाएगा।
  • फसल खरीदी का उच्चतम समर्थन मूल्य
  • धान - 2500 रुपए प्रति कुंतल
  • मक्का - 1700 रुपए प्रति कुंतल
  • सोयाबीन - 3500 रुपए प्रति कुंतल
  • गन्ना - 355 रुपए प्रति कुंतल
  • चना- 4700 रुपए प्रति कुंतल
  • बिजली बिल हाफ

अब एक नजर भाजपा के घोषणा पत्र पर भी

  • अगले पांच सालों में किसानों को दो लाख नए पंप कनेक्शन।
  • छत्तीसगढ़ को जैविक खेती के प्रदेश के रूप में विकसित करने के लिए तेजी से प्रयास
  • दलहन और तिलहन किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदी
  • 60 साल से अधिक आयु के लघु एवं सीमांत किसानों व भूमिहीन कृषि मजदूरों को एक हजार रुपए प्रतिमाह पेंशन

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