इस पानी से आप कपड़े धुलना भी पसंद नहीं करेंगे, लोग पीने को मजबूर हैं... देखिए वीडियो

दुनिया की सबसे बड़ी नदियों में शुमार गंगा और यमुना का संगम होता है, यहां प्रयाग के तट पर दुनियाभर के लोगों का सैलाब उमड़ता है.. देश के पहले प्रधानमंत्री इसी इलाहाबाद से थे। लेकिन इसी इलाहाबाद का एक इलाका है जो बूंद-बूंद पानी को तरस रहा है, ये पानी के लिए घंटे लाइन लगाते हैं और ये पानी निचोड़ कर पीते हैं...

शंकरगढ़ (इलाहाबाद)। इलाहाबाद से 45 किलोमीटर दूर शंकरगढ़ इलाके में जमकर खनन किया गया। इसका असर धीरे-धीरे सामने आया और कुंओं, तालाबों में पानी नहीं बचा। शंकरगढ़ के कई गाँव ऐसे हैं, जहां पानी के लिए गाँव में सिर्फ एक हैंडपंप है। एक हैंडपंप पर 800 ग्रामीण निर्भर हैं। कुओं और तालाबों में पानी नहीं है और हज़ारों ग्रामीण पानी की कमी से जूझ रहे हैं।

शंकरगढ़ में ग्राम पंचायत जनवा का एक गाँव है बुद्धनगर। गाँव के समरजीत सिंह (35 वर्ष) बताते हैं, " गाँव में एक मात्र हैंडपंप पर लगभग 800 ग्रामीण आश्रित हैं और इसी से पानी पीते हैं। इसके अलावा पानी का कोई और ज़रिया नहीं है। गाँव में पांच कुंए हैं, जिसे गाँव वालों ने ही खोदा है और पांचों सूखे पड़े हुए हैं। बरसात के समय में जब उन कुंओं में पानी भर जाता है तो पानी की किल्लत की वजह से हम उसी पानी को ख़ुद भी पीते हैं और मवेशियों को भी पिलाते हैं।" (देखिए वीडियो)

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इसी गाँव के कृष्ण कुमार (32 वर्ष) बताते हैं, "हमारा क्षेत्र कहने के नाम पर तो तराई क्षेत्र है, लेकिन यहाँ की स्थिति बिल्कुल बुंदेलखंड की तरह है। यहां न तो कोई ट्यूबवेल है और न ही पानी की कोई व्यवस्था। यहाँ कुछ अल्पकालिक (बरसाती) नदियां तो हैं, लेकिन उनमें कभी भी पानी नही रहता है।"

देखिए शंकरगढ़ का दर्द बताता वीडियो

शंकरगढ़ में 203 गाँव हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 24.25 लाख हैंडपंप हैं और औसतन 66 लोग एक हैंडपंप पर निर्भर हैं। इस हिसाब से देखें तो शंकरगढ़ के इलाक़े में प्रादेशिक औसत के मुक़ाबले कई गुना ज़्यादा लोग एक हैंडपंप से पानी पीने के लिए मजबूर हैं।

शंकरगढ़ में 203 गाँव हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 24.25 लाख हैंडपंप हैं और औसतन 66 लोग एक हैंडपंप पर निर्भर हैं। इस हिसाब से देखें तो शंकरगढ़ के इलाक़े में प्रादेशिक औसत के मुक़ाबले कई गुना ज़्यादा लोग एक हैंडपंप से पानी पीने के लिए मजबूर हैं। इससे पता चलता है कि क्षेत्र में हैंडपंप की संख्या कम होने से लोगों को इस परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

इस पानी से आप कपड़े धुलना भी पसंद नहीं करेंगे।

जब ग्राम पंचायत जनवा के प्रधान श्रवण कुमार से गाँव में हैंडपंप न लगने की वजह पूछी गयी तो उन्होंने कहा कि, "समस्या ये है कि हैंडपंप विधायक निधि से आता है। ग्राम पंचायत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। अगर व्यवस्था होती तो मैंने एक और हैंडपंप लगवा दिया होता। मैंने विधायक को हैंडपंप के लिए लिखा था, लेकिन ऊपर से मदद न मिलने की वजह से एक भी नया नल नहीं लग पाया।"

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शंकरगढ़ क्षेत्र बारा विधानसभा के अंतर्गत आता है। पानी की समस्या पर स्थानीय विधायक अजय कुमार का कहना है, "जब से मैं विधायक हुआ हूँ तब से सरकार ने हैंडपंप देना बंद कर दिया है। 2016 के आख़िर में 100 हैंडपंप मुझे मिले थे तो वो मैंने कई जगह लगवाए भी।"

ग्रामीण बताते हैं कि हम गंदा पानी पीने को मजबूर हैं और इसकी वजह से कोई ना कोई बीमारी होती रहती है। आशा बताती (40 वर्ष) हैं, "जब गंदा पानी पिएंगे तो बीमारी तो होगी ही और हमारे पास पैसा भी नहीं है कि इलाज करा सकें। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए, नहीं तो आने वाले समय में हमें कई और भी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।"

ये कहानी सिर्फ़ एक क्षेत्र की नहीं है। भारत के तमाम गाँव ऐसी ही स्थिति में जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। आज भी बुंदेलखंड के सभी इलाक़ों में पानी नहीं पहुंचाया जा सका है। राजनीतिक निष्क्रियता और प्रशासनिक लापरवाही की वजह से इन इलाक़ों में लोगों को एक-एक बूंद के लिए तरसना पड़ रहा है।

यहां कुओं और तालाबों में भी नहीं बचा है पानी।

पानी की कमी से हो रही है गाय-भैंसों की मौत

शंकरगढ़ में पानी उपलब्ध न होने की वजह से मवेशियों पर गहरा प्रभाव पड़ा है। गाँव की 60 वर्षीय केला बताती हैं, "इसी गाँव में पिछले साल 20 से 25 मवेशी की मौत पानी की कमी की वजह से हो गयी थी। चारा न होने के कारण मवेशी पॉलिथिन और कपड़ा-लत्ता खाने को मजबूर हो जाते हैं, जिससे उनकी मौत कुछ ही महीनों में हो जाती है। स्थिति इतनी दयनीय हो गयी है कि जब गाय भैंस मर जाते हैं तो उनकी गली हुई लाश में माँस की जगह सिर्फ़ कपड़े और पॅालिथिन का ढेर दिखाई देता है।"

बारिश पर निर्भर है खेती

बुद्धनगर गाँव के राजेंद्र कुमार (60 वर्ष) बताते हैं, "यहाँ खेती पूरी तरीक़े से बारिश पर निर्भर है। पानी की कमी की वजह से यहाँ किसान अपने खेतों में सिंचाई तक नहीं कर पाते हैं। खुद लोगों ने कुएं और तालाब बनाए हैं, जब बारिश का पानी इनमें भरता है तो किसान सिंचाई कर पाते हैं। इसके अलावा हमारे पास पानी की व्यवस्था करने का कोई ज़रिया नहीं है।"

रिपोर्ट- शुभम कौल, कुछ महीनों पहले गांव कनेक्शन में ये स्टोरी मूल रुप से प्रकाशित हुई थी)


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