मुजफ्फरपुर त्रासदी: अस्पतालों का चक्कर लगाते  2 बेटे खोने वाले पिता का दर्द, शव ढोने वालों के कांपते हाथ

मुजफ्फरपुर त्रासदी: अस्पतालों का चक्कर लगाते 2 बेटे खोने वाले पिता का दर्द, शव ढोने वालों के कांपते हाथ

बिहार में अपने दो बच्चों को खोने वाले इस पिता का दर्द बताता है कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था कैसी है? हालात इतने बदतर हैं कि अस्पतालों में शवों को ढोने वाले लोग कहने लगे हैं कि बच्चों के शव उठाते वक्त उनके कलेजे फटते हैं..

Arvind Shukla

Arvind Shukla   20 Jun 2019 2:34 PM GMT

चंद्रकांत मिश्रा / अरविंद शुक्ला

वैशाली/मुजफ्फरपुर/लखनऊ। वैशाली जिले के हरिवंशपुर गांव में रहने वाले चतुरी साहनी अपने को दुनिया का सबसे बदनसीब पिता मानते हैं। 24 घंटे के अंदर चमकी बुखार (एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम) ने उनके दो बेटों की जान ले ली, और वो कुछ कर नहीं पाए।

"बड़े वाले बेटे (7 साल) की बॉडी (शव) को लेकर सरकारी एंबुलेंस से घर पहुंचे ही थे, दफनाने का इंतजाम कर रहे थे, जब तक छोटे (डेढ़ साल) की तबीयत बिगड़ गई। तुरंत लेकर अस्पताल भागे। पीएमसीएच में उसकी भी मौत हो गई।" इतना बताते-बताते चतुरी सुबकने लगते हैं।

चतुरी पटना से करीब 60 किलोमीटर दूर वैशाली जिले में भगवानपुर प्रखंड के हरिवंशपुर गांव में रहते हैं। ये वही ग्राम पंचायत है, जहां चतुरी के मुताबिक 16 बच्चों की मौत हुई है। अपने बच्चों की जान बचाने के लिए कई परिवार गांव छोड़ गए हैं। मुजफ्फरपुर जिले के बाद सबसे ज्यादा मौतें बिहार के वैशाली जिले में हुई हैं। वैशाली पहले मुजफ्फरपुर का ही हिस्सा था, 1972 में ये अलग जिला बना।

चतुरी लोगों के घरों के छोटे-मोटे आयोजनों में खाना बनाने का काम करते हैं। छप्पर के घर में रहने वाले चतुरी अपनी किस्मत के साथ सरकार, डॉक्टर सबसे नाराज हैं। चतुरी के बच्चों की त्रासदी बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की कड़वी हकीकत है।

चतुरी बीमार होने पर अपने बच्चे को सबसे पहले लेकर लालपुर के एक निजी अस्पताल जाते हैं। जहां से उसे वैशाली जिले के मुख्यालय हाजीपुर के सदर अस्पताल ले गए। सदर अस्पताल से पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (पीएमसीएस) रेफर किया। लेकिन 25 किलोमीटर दूर पटना अस्पताल पहुंचने के लिए चतुरी के पास पैसे नहीं थे, वो अपने बच्चे को वापस घर ले आते हैं।

चतुरी के भाई सुशील सैनी बताते है, "भइया के पास पैसे-वैसे नहीं थे कैसे ले जाते, तो घर ले आए लेकिन यहां उसकी तबीयत बिगड़ रही थी, फिर हम लोगों ने पैसे का इंतजाम किया और मुजफ्फरपुर के केजरीवाल अस्तपाल ले गए। लेकिन वहां एडमिट नहीं किया और मेडिकल कॉलेज रेफर किया जहां उसकी रात तीन बजे मौत हो गई।"

चतुरी के साथ अस्तपाल में उनकी पत्नी चंचल देवी और डेढ़ साल का एक बेटा था। एंबुलेस में बच्चे का शव लाते ही छोटे बेटे की भी तबीयत बिगड़ गई। उसमें भी (एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम) चमकी बुखार के लक्षण दिखाई दिए थे। शव का दाहसंस्कार छोड़ वो अपने छोटे बेटे को बचाने में जुट जाते हैं।

बड़े बेटे का नहीं कर पाए थे अंतिम संस्कार, छोटे को भी हुआ चमकी बुखार

"शव का दास संस्कार छोड़ छोटे को लेकर हम लोग लालपुर पहुंचते हैं लेकिन वहां सब बंद था (डॉक्टरों की हड़ताल थी) किसी तरह सदर अस्पताल (जिला मुख्यालय) पहुंचे। वहां डॉक्टरों ने आला (स्टेथोस्कोप) भी नहीं लगाया। कहा पीएमसीएच लेकर जाए। वहां भी कोई दवा नहीं मिली। एक-दो घंटे में कोई मरीज आता था। और 12 बजे मेरा बेटा डेड गया। डॉक्टर ने कहा इसे लेकर जाओ यहां से। हमने एंबुलेंस मांगी तो बोले एंबुलेस सिर्फ जच्चा-बच्चा (प्रसूता) के लिए हैं। हम 2200 रुपए में निजी गाड़ी से बच्चे का शव लेकर आए। मेरे बच्चे को सही से इलाज मिलता तो वो बच जाता।" चतुरी उस दिन की पूरी आपबीती बताते हैं।

चतुरी का दर्द वीडियो में यहां देखिए

बड़ी बहन का शव लेकर गई थी एंबुलेंस, छोटी बहन को लाना पड़ा अस्पताल

मुजफ्फरपुर के मेडिकल कॉलेज में कई चतुरी मिल जाएंगे। मुजफ्फरपुर के औरई प्रखंड की कोठिया गांव में रहने वाली सीमानी (9 साल) मेडिकल कॉलेज में भर्ती है, उसे बेड नहीं मिला जमीन पर पड़े गद्दे पर इलाज हो रहा है। सीमानी की छोटी बहन की चमकी से मौत हो गई थी, एंबुलेंस उसके शव को छोड़ने उसके गांव गई थी, वापस आते वक्त वो सीमानी को लेकर आई, क्योंकि उसे भी बुखार हो गया है। एक बच्ची की मौत, और दूसरे के बीमार होने से उसकी मां सदमे में चली गई है। जिनके बच्चों की मौत हुई है या जो भर्ती हैं, ज्यादातर बेहद गरीब लोग हैं। जिनमें से कुछ मजदूरी करते हैं, कुछ रिक्शा चलाते हैं। इनमें से कई लोग कर्ज लेकर आए हैं।


एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम यानी चमकी बुखार के बारे में अभी तक डॉक्टरों को कोई सटीक जानकारी नहीं है। कुछ लक्षण इंसेफ्लाइटिस से मिलते हैं इसलिए इसे एईएस कहा जाता है। जब बीमारी का पता नहीं है तो अब तक टीका भी नहीं बना है। चिकित्सक अपनी भाषा में इसे हाईपोग्लेशिमिया कहते हैं। हाइपोग्लेशियमा वो स्थिति है जब रक्त में ग्लूकोज की मात्रा हद से ज्यादा कम हो जाती है। लेकिन बच्चों के माता-पिता इसे जानलेवा बुखार ही कहते हैं।

राष्ट्रीय बाल कल्याण कार्यक्रम के सलाहकार डॉ अरुण सिन्हा ने मीडिया को बताया, "यह ब्रेन टिश्यू से संबंधित मामला लग रहा है। आखिर यह बीमारी क्या है इस पर अध्ययन की जरूरत है। अभी तक बीमारी के लक्षणों के आधार पर इलाज किया जा रहा है।"

'स्वस्थ बच्चों पर कम होता है चमकी का अटैक'

बीमारी का सीधा संबंध कुपोषण और प्राथमिक इलाज से है। मुजफ्फरपुर और वैशाली के साथ दूसरे कई जिलों से बच्चों की मौत की खबरें आ रही हैं। बिहार शरीफ जिले में जिला सिविल सर्जन डॉ.परमानन्द चौधरी अपने बयान में बताते हैं, "चमकी बुखार होने का सटीक कारण अभी पता नहीं चलग सका है लेकिन बच्चों के सुपोषित और स्वस्थ रहने पर इस रोग के होने की संभावना कम रहती है।"

बच्चों की मौत को लेकर सरकारों का रवैया हमेशा सवालों के घेरे में रहा है। यही वजह रही की बच्चों के 10 दिन बाद मुजफ्फरपुर पहुंचे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भारी विरोध का सामना करना पड़ा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन भी लोगों की नाराजगी झेल चुके हैं। लोगों के सवाल वाजिब भी हैं क्योंकि कृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (SKMCH) में सबसे ज्यादा मौत हुई हैं। बिहार का एक मात्र सरकारी अस्पताल जहां इस बीमारी से लड़ने के लिए कुछ बेहतर सुविधाएं वहां ऐईएस के लिए 32 बेड ( आधुनिक आईसीयू) है। जबकि वहां इन दिनों करीब 400 बच्चे भर्ती हैं।

एक एक बेड़ पर 4-5 बच्चे भर्ती कराए गए हैं। कई बच्चों का फर्श तक पर इलाज हो रहा है। नाराज परिजन अस्पातल में डॉक्टरों और दवाओं की कमी तक आरोप लगाते हैं। केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन ने दिल्ली से 5 विशेष टीमें बिहार भेजी हैं जिनमें 10 शिशुरोग विशेषज्ञ भी हैं। इन टीमें में एम्स, एनसीडीसी, आईसीएमआर, विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेषज्ञ भी शामिल हैं जो बीमारी पर शोध करेंगे। कई जिलों विशेष आईसीयू बनाने की बात है। एसकेएमसीएच में के बेड़ों की संख्या 750 से बढ़ाकर 2500 की जाएगी। लेकिन इनके लिए डॉक्टर कहां से आएंगे, ये सवाल भी लोग लगातार उठा रहे हैं।


बिहार में 28,391 लोगों पर एक एलोपैथिक डॉक्टर, चाहिए 1681 पर एक

बिहार देश के उन राज्यों में शामिल है, जहां डॉक्टरों की सबसे ज्यादा कमी है। मार्च 2018 में बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने विधानसभा में एक प्रश्न के जवाब में कहा था कि बिहार में प्रति 17,685 लोगों पर एक डॉक्टर है। जबकि प्रदेश में 6830 डॉक्टर कार्यरत है। बिहार के स्वास्थ्य मंत्री तब अपने जवाब में ये भी कहा था कि देश में कुल 10 लाख डॉक्टर रजिस्टर्ड हैं, लेकिन बिहार में इनकी संख्या 4,0043 है।

हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट गंभीरता को और बढ़ाती है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सेंट्रल ब्यूरो आफ हेल्थ इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 28,391 लोगों पर एक एलोपैथिक डॉक्टर है जबकि पूरे देश की बात करें तो औसत आंकड़ा 11,082 आबादी पर महज एक डॉक्टर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों के मुताबिक यह अनुपात एक प्रति एक हजार आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए। इंडियन मेडिकल काउंसिल के मुताबिक 1681 व्यक्ति पर एक चिकित्सक की आवश्यकता होती है।

2011 की जनगणना के मुताबिक बिहार की आबादी 10 करोड़ 38 लाख से ज्यादा है। इस हिसाब के बिहार के लिए करीब 65 हजार डॉक्टर होने चाहिए। लेकिन हैं उसके आधे ही। 2017 में बिहार के अख़बार प्रभात ख़बर ने डॉक्टरों की कमी को लेकर पूरी खबर प्रकाशित की थी। रिपोर्ट में लिखा है, "बिहार राज्य हेल्थ सर्विस एसोसिएशन के डॉ रंजीत कुमार ने कहा कि निबंधित चिकित्सकों में बहुत लोग दूसरे राज्य या विदेशों में चले गये हैं। इसमें से बहुत वैसे चिकित्सक हैं जिनकी मृत्यु हो गयी है। सैकड़ों की संख्या में डॉक्टर सक्रिय रूप से सेवा से अलग हो गये हैं. राज्य में स्वास्थ्य सेवा देने वाले चिकित्सकों की संख्या करीब 25-30 हजार है।"

बिहार में 8 मेडिकल कॉलेज 10 करोड़ की आबादी के लिए चाहिए 55 मेडिकल कॉलेज

बिहार में कृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (SKMCH) जैसे 8 मेडिकल कॉलेज हैं। मानकों के अनुसार प्रदेश में 55 मेडिकल कॉलेज होने चाहिए। बिहार में 4 साल पहले केंद्र सरकार ने एम्स बनाने की घोषणा की थी, लेकिन सियासी लड़ाई उसकी नींव तक नहीं रखी जा सकी। भारत की ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पर गांव कनेक्शन ने नई सरकार को गांव का एजेंडा में कई सुझाव दिए थे

सुशील साहनी की माने तो उनके जैसे अति करीब माता-पिता भी सरकारी अस्तपालों की जगह निजी डॉक्टरों पर ज्यादा भरोसा करते हैं क्योकिं वहां कोई इंतजाम तक तो होता नहीं है। इस बीमारी के लिए अब लोग जल्द मानसून आने का दुआ कर रहे हैं।

बुधवार को गांव कनेक्शन की टीम मुजफ्फरपुर के मुशहरी स्थित सामुदायिक स्वास्थ केंद्र पहुंची तो वहां सन्नाटा था, अस्पताल में मौजूद डॉक्टरों ने कहा कि तापमान गिरने से मरीजों की संख्या कम हुई है। डॉक्टर और जानकार भी मानते हैं सब मौसम पर निर्भर है। सोशल मीडिया पर बिहार त्रासदी को लेकर हंगामा मचा है। लोग कह रहे मंगल मिशन नहीं, इन बच्चों की जान बचाइए।


बच्चों के शव उठाने वाले ट्राली मैन के कंपाते हैं हाथ

पूरे देश की निगाहें मुजफ्फरपुर के मेडिकल कॉलेज पर है, जहां हर दिन कुछ कुछ घंटों में सफेद कपड़ों में लिपटे बच्चों के शव बाहर निकलते हैं। अस्पातल में बच्चों को एबुंलेंस उतारकर वार्ड में पहुंचाने और या किसी बच्चे की मौत पर उसके शव को बाहर निकालने के लिए 30 ट्राली मैन तैनात है। लगातार शवों को देखकर ट्राली मैन भी भगवान से रहम की दुआ कर रहे हैं।

35 साल के सुरेंद्र कुमार अपनी लड़खडाती आवाज में कहते हैं, "भइया अब हालात देखा नहीं जा रहा है। इतना बच्चों को दम तोड़ता देख कलेजा फट रहा है। बच्चा लोग की डेड बॉडी उठाते हुए हाथ कांपने लगता है। लेकिन किसी तरह खुद को मजबूत कर उन्हें लाते हैं।"

चमकी वही बुखार है जिसने 2017 में यूपी के गोरखपुर 100 से ज्यादा बच्चों की जान ली थी। 2019 से पहले 2014 में भी चमकी (दिमागी बुखार) ने कहर बरपाया था। ये बीमारी अप्रैल से लेकर जून तक होती है। यही सीजन लीची की कटाई का भी होता है इसलिए चमकी और लीची को लेकर लगातार सवाल उठते रहते है लेकिन डॉक्टर और लीची से जुड़े वैज्ञानिक इसे नकारते रहे हैं। वैसे तो देश के कई हिस्सों में लीची होती है लेकिन मुजफ्फरपुर में शाही लीची होती है, यहां लीची अनुसंधान केंद्र भी है।

'बच्चों की मौत से लीची का कनेक्शन नहीं'

लीची रिचर्स इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. विशाल नाथ के मुताबिक अगर लीची की मौतों से कोई कनेक्शन नहीं है, ये मजह संयोग है जहां सबसे ज्यादा मौते हो रही है वहीं सबसे ज्यादा लीची होती है।" लीची खाली पेट खाने पर छोटे बच्चों को नुकसान करती है, इसलिए बिहार सरकार के बाकायदा एक एडवाइजरी भी जारी की है। बच्चों के माता-पिता भी कहते अगर लीची का मौत से मतलब नहीं। चतुरी साहनी के भाई सुशील साहनी कहते हैं, अगर लीची खाने से बच्चे मर रहे होते तो गांव के सभी बच्चे, बड़े बूढ़े मर जाते, क्योंकि लीची तो यहां सब खाते हैं।"

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