"शराब पिलाकर रेप कराते थे, मना करने पर काट दी उंगलियां", 15 साल की लड़की ने रोते हुए कहा

उफ! इतनी दरिंदगी... ये एक ऐसी लड़की की आपबीती है, जिससे 2 साल थर्ड डिग्री टार्चर देकर जिस्मफरोशी कराई गई। पढ़िए #रक्तरंजित सीरीज का अगला पार्ट

लखनऊ। "शराब पिलाने के बाद मुंह में कपड़ा ठूंस कर टेप लगा देते थे, एक दिन में तीन से चार लोगों के साथ सोना पड़ता था, हमने मना किया तो कैंची से मेरे एक हाथ की उंगली काट दी।" इतना बताते-बताते पीड़ित लड़की ने फफक-फफक कर रोना शुरु किया। करीब पंद्रह साल लड़की ने जो कुछ कहा उसके शरीर के जख्म उससे ज्यादा की गवाही दे रहे थे।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक घर में झाड़ू पोछा करने वाली एक लड़की से जबरन जिस्मफरोशी कराई जा रही थी। मना करने पर उसपर ऐसे जुल्म ढाए जाते थे, कि सोच कर रूह कांप जाए।

लखनऊ के त्रिवेणीनगर-1 में सुधीर गुप्ता के घर में झाड़ू-पोछा का काम कर रही नेहा (15 वर्ष,बदला हुआ नाम) ने अपने हाथों के जख्म दिखाते हुए कहा, "सुधीर गुप्ता ने हमारे पैर पकड़े, उनकी बेटी स्वेता गुप्ता ने हाथ पकड़े और पत्नी अनीता गुप्ता ने कैंची से हमारे दाहिने हाथ की उंगली काट दी, दूसरे हाथ की उंगली तोड़ दी।" नेहा के शरीर में मारपीट के कई जख्म थे कुछ घाव ताजे थे तो कुछ पुराने। हर घाव से पस निकल रहा था उसके चेहरे में गर्म चिमटे और किचन के दूसरे नुकीले बर्तनों के कई सारे काले निशान थे।

नेहा को हर दिन घर का काम और बाहर से आने वाले तीन चार लोगों के साथ जबरन सेक्स करने पर मजबूर किया जाता था। 11 अगस्त को किस्मत ने नेहा का साथ दिया और वो गेट खुला देखकर काल कोठरी से भाग पड़ी। किसी तरह वो अपनी बड़ी बहन के पास पहुंची और पुलिस को इस हैवानियत की जानकारी हुई। पीड़ित बच्ची को 12 अगस्त को आपकी सखी आशा ज्योति काउंसलिंग केंद्र में भेजा गया।

"इनके यहाँ धंधा चलता है, हर दिन बाहर से 6- 7 आदमी और दो-तीन लड़कियाँ आती हैं, इसी पैसे से इनके घर का खर्च चलता है। ये लोग कह रहे थे कि तुम्हारा चेहरा बिगाड़ देंगे जिससे तुम्हें कोई पहचान न पाए।"पीड़ित ने कहा

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लखनऊ के त्रिवेणीनगर की झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाली नेहा की माँ का बचपन में ही देहांत हो गया पिता और भाई मानसिक रूप से विक्षिप्त हैं। बड़ी बहन की शादी हो गयी। गरीबी का आलम ऐसा था कि मजबूरी में नेहा को झाड़ू-पोछा करने के लिए सुधीर गुप्ता के घर जाना पड़ा। नेहा ने अपने आंसू पोंछते हुए बताया, "इनके यहाँ धंधा चलता है, हर दिन बाहर से छह सात आदमी और दो तीन लड़कियाँ आती हैं, इसी पैसे से इनके घर का खर्च चलता है। ये लोग कह रहे थे कि तुम्हारा चेहरा बिगाड़ देंगे जिससे तुम्हें कोई पहचान न पाए।"

नेहा के हर शब्द के साथ उसके साथ दो साल तक हुए जुर्म के घाव का दर्द साफ़ झलक रहा था, "मेरे घरवाले जब इनसे मेरे बारे में पूछते थे तो सुधीर गुप्ता कहते कि हमारे यहाँ नहीं है। मैं किसी तरह दो साल बाद बंद कमरे से निकल पाई।"

आपकी सखी आशा ज्योति केंद्र लखनऊ में ये पीड़िता जाँच अधिकारी द्वारा 13 अगस्त को रात 9:30 बजे सौपी गयी। काउंसलिंग कर रही केंद्र की प्रशासिका अर्चना सिंह ने बताया, " बच्ची के शरीर में बहुत सारे जख्म हैं जिसमें से पस और खून निकल रहा है। इसके दोनों हाथ की उंगलियां पूरी तरह से खराब कर दी हैं, बच्ची शारीरिक रूप से जितना परेशान है उतनी ही मानसिक रूप से चोटिल भी है।"

"एक कमरा जो बहुत सजा-धजा था उसी में इन लोगों को लड़कियों के साथ मिलवाया जाता था। जो लोग आते थे वो बहुत गंदे तरीके से हमारे साथ गलत काम करते थे, बहुत दर्द होता था, घाव हो गये हैं।" ये बताते हुए वह फफक-फफक कर रोने लगी।

अर्चना सिंह आगे बताती हैं, वो लगातार रोते हुए कह रही थी सुधीर गुप्ता का परिवार उसका चेहरा खराब करने कोशिश में था ताकि उसकी बहन उसे पहचान न पाए। मानसिक रूप से बच्ची को स्वस्थ्य करने के लिए कम से कम छह महीने काउंसलिंग की जरूरत है। शरीर के जख्म डॉक्टर जल्दी भर देंगे लेकिन जो इसे भावनात्मक नुकसान हुआ है, उसमें काफी वक्त लगेगा।'

लखनऊ में थाना अलीगंज क्षेत्र में गल्ला मंडी चौकी इंचार्ज नेपाल सिंह ने बताया, "सुधीर गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया गया है। लड़की ने बताया है कि उसके साथ गलत काम कराया गया। यह एक गम्भीर अपराध है, जाँच चल रही है। उम्र परीक्षण के बाद पाक्सो लगाने पर फैसला होगा।"

दो साल से एक कमरे में बंद नेहा को कई बार तीन चार दिनों तक खाना नहीं मिलता था। नेहा ने बताया, "केवल हम मरे नहीं हैं बाकि कोई कसर नहीं छोड़ी इन्होंने। जवान और बुड्ढ़े दोनों तरह के लोग आते थे, एक कमरा जो बहुत सजा-धजा था उसी में इन लोगों को लड़कियों के साथ मिलवाया जाता था। जो लोग आते थे वो बहुत गंदे तरीके से हमारे साथ गलत काम करते थे, बहुत दर्द होता था, घाव हो गये हैं।" ये बताते हुए वह फफक-फफक कर रोने लगी।

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बाल कल्याण समिति की सदस्य संगीता शर्मा ने बताया, "इस तरह के मामलों में हमारी कोशिश रहती है कि सबसे पहले पीड़िता की काउंसलिंग हो और इलाज हो। जब पीड़िता सहज स्तिथि में आ जाती है तब उसके परिवार की पूरी जानकारी करते हैं। इसके बाद ये फैसला लेते हैं कि इसे कहाँ रखना है जहाँ वो सुरक्षित रह सके।" उन्होंने आगे बताया, "अगर परिवार के साथ बच्ची रहती है तो उसका लगातार फालोअप करते हैं अगर उसे बालिका गृह में रखना होता है तो फिर वहाँ रखते हैं जहाँ उसकी पूरी देखरेख होती थी।"

आली संस्था की वकील रेनू मिश्रा ऐसे केस के कानून पहलू के बारे में बताती हैं। "इस तरह की घटनाओं में दोषी को कम से कम 20 साल की सजा या फिर मृत्युदंड की सजा हो सकती है। इस केस में धारा 323, 325, 342, 504, 506, 376, 307 और 370 काम के दौरान ट्रैफिकिंग लगनी चाहिए।"

नेहा उस कैद से निकलने के बावजूद बहुत डरी-सहमी है, वो चाहती है उन्हें फांसी की सजा मिले। नेहा ने बताया, 'एक दिन रात में मुझे गाड़ी की डिग्गी में बैठाकर ले गये, एक बुजुर्ग डॉक्टर ने हमारी कटी हुई उँगलियों में पट्टी की। घर में 11 बजे से लोग आना शुरू कर देते थे और शाम आठ नौ बजे जाते थे, ये हर दिन का काम था।"

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