क्या आपको भी याद है गाँव में गाए जाने वाला आल्हा गीत 

एक छोटे से गाँव की रहने वाली शीलू ने जब आल्हा गायिका बनने का सपना देखा तो उसने नहीं सोचा था कि वो दूसरी लड़कियों के लिए मिसाल बनने वाली हैं। ढोलक, झांझड़ और मंजीरे की संगत में आल्हा गायक तलवार चलाते हुए जब ऊंची आवाज़ में आल्हा गाते हैं, तो माहौल जोश से भर जाता है।

शीलू सिंह राजपूत ने सबसे पहले आल्हा अपने गाँव में आए आल्हा के मशहूर गायक लल्लू बाजपेई से सुना था। शीलू बताती हैं, "आल्हा गाते हुये देखा तो मैंने कहा पापा से कि मुझे भी आल्हा गाना है, तो पापा ने कहा कि नहीं ऐसी बात मत करो, क्योंकि आल्हा तो बस आदमी ही गाते हैं, लड़की नहीं गा सकती और उनके पास जाओगी तो वो डाटेंगें भी।"

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आल्हा लोकगीत की एक विधा है, जिसकी शुरूआत बुंदेलखंड के महोबा में हुई थी, आल्हा व उदल महोबा के राजा परमाल के सेनापति थे। बस यही से आल्हा गीत की शुरूआत हुई। शीलू से पहले इस गीत को सिर्फ पुरुष गाया करते थे, लेकिन आज शीलू भी आल्हा की प्रसिद्ध गायक हैं। लेकिन शीलू की राह इतनी आसान नहीं थी।

आल्हा गायक बनाने में उनके पिता ने भी उनका पूरा सहयोग किया। शीलू बताती हैं, "मेरे पापा मुझे सड़क किनारे खेत में ले गए, इसलिए क्योंकि वहां पर लोग आते जाते रहते थे। लकड़ी में कपड़ा बांधकर माइक बनाया और लकड़ी की तलवार बनायी। जब मैं गाती तो लोग हंसते की क्या ड्रामा हो रहा है। बस यही से मेरी शुरूआत हुई।"

वो आज जब मंच पर तब दांत भीचते हुए तलवार भांजती हैं, मंच के सामने बैठी भीड़ तालियां बजाती रह जाती हैं। अपने घर की लकड़ी की दहलीज लांघकर इस मंच तक पहुंचने के लिए शीलू को कई जतन करने पड़े, ताने सहने पड़े। गांव और रिश्तेदार तो दूर घर के लोगों का विरोध झेलना पड़ा।

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दो भाइयों की वीरगाथा है आल्हा गीत

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड कभी जाएं, तो लोकगीत आल्हा ज़रूर सुनिएगा। वीर रस से भरे हुए ये लोक गीत बुंदेलखंड का अभिमान भी हैं और पहचान भी। ढोलक, झांझड़ और मंजीरे की संगत में आल्हा गायक तलवार चलाते हुए जब ऊंची आवाज़ में आल्हा गाते हैं, तो माहौल जोश से भर जाता है। ये गीत कई सदियों से बुंदेलखंड की संस्कृति का हिस्सा रहे हैं।

आल्हा बुंदेलखंड के दो भाइयों (आल्हा और ऊदल) की वीरता की कहानियां कहते हैं। यह गीत बुंदेली और अवधी भाषा में लिखे गए हैं और मुख्यरूप से उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड और बिहार व मध्यप्रदेश के कुछ इलाक़ों में गाए जाते हैं। आल्हा और ऊदल बुंदेलखंड के दो वीर भाई थे। 12वीं सदी में राजा पृथ्वीराज चौहान से अपनी मात्रभूमि को बचाने के लिए दोनों वीरता से लड़े। हालांकि इस लड़ाई में आल्हा और ऊदल की हार हुई, लेकिन बुंदेलखंड में इन दोनों की वीरता के किस्से अब भी सुनने को मिल जाते हैं। इन्हीं दोनों भाईयों की कहानियों को कवि जगनिक ने सन 1250 में काव्य के रूप में लिखा, वही काव्य अब लोकगीत आल्हा के नाम से जाना जाता है।

उदाहरण के तौर पर:

'' खट्-खट्-खट्-खट् तेगा बाजे

बोले छपक-छपक तलवार

चले जुनब्बी औ गुजराती

ऊना चले बिलायत क्यार।''

बुंदेली भाषा में लिखे गए इस गीत में आल्हा और ऊदल भाइयों को युद्ध में लड़ते हुए बताया गया है। आल्हा गीत के इस छंद में यह बताया जा रहा है कि दोनों भाई युद्ध करते हुए तेज़ी से अपनी तेगा (लंबी तलवार) चलाते हैं। युद्ध में इस्तेमाल होने वाली भारतीय (जुनब्बी और गुजराती) तलवारें ऐसी चलती हैं, कि उनके आगे विदेशी तलवारें भी कम लगती हैं।

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