इनके हौसले को सलाम करिये, 10 वर्षों से बिस्तर पर लेटे-लेटे बच्चों को दे रही हैं शिक्षा

इनके हौसले को सलाम करिये, 10 वर्षों से बिस्तर पर लेटे-लेटे बच्चों को दे रही हैं शिक्षानेशनल पब्लिक स्कूल।

सहारनपुर के एक प्राइवेट स्कूल की प्रिंसिपल पिछले 10 वर्षों से बिस्तर पर लेटे-लेटे टैबलेट की मदद से बच्चों को पढ़ाती हैं। बच्चों के अलावा वो समय-समय पर स्कूल के शिक्षकों को भी गाइड करती रहती हैं। इनके शरीर का निचला हिस्सा लकवे की बीमारी से पीड़ित है। लेकिन इसे आपनी कमजोरी न समझकर पिछले 10 वर्षों से वो लगातार अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहीं है।

2007 में आया था लकवे का अटैक

गाँव कनेक्शन संवाददाता से बातचीत के दौरान उमा शर्मा (64 वर्षीय) ने बताया कि 2 मार्च 1989 को मैंने नेशनल पब्लिक स्कूल में प्रिंसिपल के पद पर कार्यभार संभाला और उसके बाद से अब तक अपनी सेवाएं दे रही हूं। साल 2007 में लकवे का अटैक आने के बाद मेरे शरीर के नीचे का हिस्सा बेजान हो गया। लेकिन चेहरा बच जाने की वजह से मैं आराम से बोल सकती हूं।

टैबलेट दिखातीं उमा शर्मा।

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परेशानियां आने के बावजूद फर्ज से नहीं हटीं पीछे

उमा शर्मा ने बताया कि 1992 में पति की मौत के बाद बेटा ही घर का सहारा था लेकिन 2002 में बेटे की भी मृत्यु हो गई। उसके कुछ साल बाद तीन बेटियों में से एक की ससुराल में मौत हो गई और 2007 में उमा को लकवा मार गया। इतनी तकलीफें आने के बावजूद भी उमा अपने फर्ज से पीछे नहीं हटीं।

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टैबलेट की मदद से करती हैं पूरे स्कूल की माँनीटरिंग

उमा शर्मा के बिस्तर पर आने के बाद समस्या आई कि अब स्कूल को संभालेगा कौन? वहां पर उमा का साथ दिया स्कूल के संस्थापक सुरेन्द्र चौहान ने। हालांकि उमा शर्मा बिस्तर से उठ नहीं सकती थी इसलिये उस समय संस्थापक ने दो कम्प्यूटर खरीदा एक कम्प्यूटर स्कूल में और एक उमा के घर पर। नेटवर्किंग के जरिये वीडियो कांफ्रेंसिंग द्वारा उमा शर्मा स्कूल की मॉनीटरिंग करती थीं साथ ही कम्प्यूटर के जरिये बच्चों पर भी निगाह रखती थीं।

स्कूल की सीसीटीवी फुटेज।

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शिक्षकों से भी बच्चों के बारे में जानकारी लेती रहती थीं और पढ़ाई में कमजोर बच्चों को घर पर बुलाकर पढ़ाई पर ध्यान देने के लिये भी समझाती थीं। हादसे के बाद संस्थापक ने उमा शर्मा को प्रिंसिपल से डायरेक्टर के पद पर नियुक्त कर दिया था। बाद में जब टैबलेट का जमाना आया तब पूरे स्कूल में सीसीटीवी कैमरे लगा दिये गए जिससे अब वो बच्चों की काउंसलिंग करती हैं साथ ही बच्चों को गाइड करती हैं।

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संवाददाता ने संस्थापक सुरेन्द्र चौहान से बात की तो उन्होंने बताया कि वो अपनी योग्यता और काबिलियत की वजह से आज तक इस स्कूल में हैं। मुझे ऐसा कभी भी नहीं लगा कि उनके स्कूल में न आने से कोई परेशानी हुई।

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