दुर्घटना के बाद ऐसे पहुंचाएं अस्पताल, बचाई जा सकती है जान 

लखनऊ। कई बार ये देखा जाता है कि दुर्घटना के बाद मरीज को किसी भी हालत में कैसे भी अस्पताल तक पहुंचाए जाने का प्रयास किया जाता है लेकिन अस्पताल पहुंचाने से पहले मरीज की जान बचानी है तो कुछ बातों का ध्यान रखना होगा। लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज के ट्रॉमा सेंटर इंचार्ज और ट्रॉमा सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ संदीप तिवारी ने गाँव कनेक्शन को बतायाकि दुर्घटना के बाद मरीज को किन सावधानियों के साथ अस्पताल तक ले जाकर मरीज की जान बचाई जा सकती है।

डॉ संदीप तिवारी बताते हैं, "पिछले वर्ष के आंकड़ों के अनुसार भारत में सड़क हादसे में 1,49,000 हजार लोगों ने अपनी जान गवाई थी। ये आंकड़ा किसी आतंकवादी हमले, महामारी से कम नहीं है। आंकड़ों में बताई गई मौतों में 80 प्रतिशत मौतों को रोका जा सकता है।"

हमेशा से ये कहा जाता है कि 'रोकथाम इलाज से बेहतर है'। इसके लिए सबसे ज्यादा जरुरी है कि हमारी दुर्घटना न होने पाए। कुछ लोगों की ऐसी मानसिकता होती है कि हमारी कभी भी सड़क दुर्घटना नहीं हुई है और न ही कभी भी होगी। ऐसा बिलकुल भी नहीं है दुर्घटना कभी भी किसी के साथ और किसी भी समय हो सकती है। लोगों को ज्यादातर देखा गया है कि वो सड़क के किसी भी नियम का पालन नहीं करते हैं। उन्हें लगता है अगर उनसे हेलमेट लगाने को कहा गया है तो इससे उनकी सुरक्षा नहीं होती बल्कि चालान वसूले जाने का रास्ता है। हेलमेट न लगा कर चलना सड़क दुर्घटना में होने वाली मृत्यु का कारण है।

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कुछ लोग रफ़्तार में चलने के शौक़ीन होते हैं उनके साथ दुर्घटना होने की संभावना बहुत ज्यादा हो जाती है। अगर हम अपनी रफ़्तार को एक किलोमीटर प्रति घंटा बढ़ाते हैं तो उनके साथ दुर्घटना होने की संभावना दो से तीन प्रतिशत बढ़ जाती है। मैंने बस लोगों को समझाने के लिए 100 किलोमीटर की दूरी 100 किमी/घंटा की रफ़्तार से तय की और दोबारा वही दूरी 80 किमी/घंटा की रफ़्तार से तय की समय की बचत मात्र 15 मिनट था तो मात्र कुछ मिनटों के लिए हम अपनी जान को दांव पर क्यों लगाते हैं? शराब पीकर गाड़ी चलाना भी इन दुर्घटनाओं का एक कारण है। शराब पीने से हमारे रेफ्लेक्सेस कम हो जाते हैं। आज कल के लोग गाड़ी चलाते समय कई काम करते हैं जिससे वो दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं।

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जो लोग सडकों पर रात में निकते हैं ख़ास तौर पर वो लोग जो पैदल और साइकिल से चल रहें है वो कभी भी गाढ़े रंग के कपड़े पहनकर न निकले। गाढ़े रंग के कपड़ों को रात में वाहन चालक देख नहीं पाता है और दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। इसलिए बचाव के लिए हल्के रंग के कपड़े ही पहन कर निकलें।

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हमारे देश में सबसे दुर्भाग्य चीज ये है कि यहाँ पर प्री-हॉस्पिटल केयर की व्यवस्था नहीं है। प्री-हॉस्पिटल केयर व्यवस्था का मतलब ये है कि मरीज को दुर्घटनास्थल से अस्पताल ले जाने के बीच में क्या इलाज किया गया है? कई बार ऐसा होता है कि दुर्घटना होने के बाद व्यक्ति कई घंटों तक सड़क पर तड़पता रहता है क्योंकि कभी एम्बुलेंस नहीं पहुँच पाती है कभी घर वाले नहीं पहुँच पाते हैं।

लोग उसके पार उसकी मदद करने के लिए इसलिए नहीं आते हैं क्योंकि उन्हें डर लगता है कि पुलिस उनसे पूछताछ करेगी। आपको बता दूं अब ऐसा बिलकुल नहीं है सुप्रीम कोर्ट के अनुसार उस व्यक्ति से किसी भी प्रकार की कार्यवाई या पूछताछ नहीं की जायेगी। उस व्यक्ति को अच्छे नागरिक की संज्ञा दी जायेगी और अगर वह सरकार के सामने आता है तो उसे सम्मानित भी किया जायेगा। इसलिए अब डरने की जरुरत नहीं है लोगों की मदद करें।

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दुर्घटना के बाद ऐसे पहुंचाएं अस्पताल

कई बार ऐसा होता है कि एम्बुलेंस नहीं पहुँच पाने के कारण व्यक्ति को लोग अपनी गाड़ी में लेकर आटे हैं तो उन्हें उस वक्त कुछ बातों का ध्यान जरुर रखना चाहिए। सबसे पहले व्यक्ति अगर किसी गाड़ी में फंसा है तो उसे गाड़ी से निकालने की जरुरत होती है क्योंकि जितनी देर वो गाड़ी में फंसा रहेगा उसकी जान जाने का खतरा उतना ही बढ़ता जाएगा। जो लोग दुर्घटना का शिकार हुए हैं उनको सड़क के किनारे लेकर आना चाहिए सड़क के बीच में नहीं बिठाए रहना चाहिए। जो लोग घायल हुए हैं उन्हें सीधे लिटा देना चाहिए और जो लोग भी बेहोश हो गए हैं उन्हें सीधे नहीं लिटाना चाहिए उनके सुरक्षित अवस्था पेट के बल होती हैं। उन्हें पेट के बल लिटा देना चाहिए इस अवस्था में व्यक्ति का मुंह नीचे की तरफ रहे।

ज्यादातर देखा गया है कि दुर्घटना के बाद मौतें खून के रिसाव से हो जाती है। इसलिए अगर दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के शरीर के किसी भी हिस्से खून का रिसाव हो रहा है तो उसे किसी कपड़े से बांध देना चाहिए। खून का रिसाव चाहे जितना बड़ा हो अगर पांच से दस मिनट तक उसपर दबाव देख कर रोक लिया जाये तो खून का रिसाव बंद हो जाता है।

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अगर व्यक्ति के शरीर की कोई हड्डी टूट गयी है और अंदर से खून का रिसाव हो रहा है तो उस समय व्यक्ति की हड्डी को किसी पेड़ की टहनी या डंडे से बांध देना चाहिए। अगर ये चीजें उपलब्ध नहीं हैं तो दोनों पैर को एक दूसरे से बांध देना चाहिए। इससे व्यक्ति को आसानी से अस्पताल तक पहुंचाया जा सकता है।

मरीज को सड़क से उठाकर गाड़ी या एम्बुलेंस तक ले जाने की एक प्रक्रिया होती है उसे ऐसे हीं नहीं उठाकर गाड़ी में भर लेना चाहिए। कभी भो दो लोग मिलकर की व्यक्ति को न उठायें। दो लोग मरीज को हांथ और पैर पकड़कर उठाते हैं इससे मरीज का झुला बन जाता है। कम से कम चार लोग मरीज को मिलकर उठायें।

पहला व्यक्ति मरीज की गर्दन और सिर को पकड़े रहे, जिससे उसका सिर नीचे की तरफ न लटकने पायें। दूसरा व्यक्ति पीठ को और सीने को संभालता है। तीसरा आदमी कमर को सम्भालता है और चौथा आदमी पैर को पकड़कर संभालता है। ऐसे उठाने से मरीज एक दम सीधा रहता है अब इन इस मरीज को तीन तक गिनकर सीधे ही गाड़ी में लिटा देना चाहिए। क्योंकि हेड इंजरी (सिर में चोट) के बाद रीढ़ की हड्डी टूटने और गले की हड्डी टूटने की सम्भावना बढ़ जाती है और इसके बाद व्यक्ति की मृत्यु तुरंत हो जाने की संभावना बढ़ जाती है। इन सावधानियों के साथ व्यक्ति की जान बचाई जा सकती है।

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