छत्तीसगढ़ को क्यों कहा जाता है धान का कटोरा ? #GaonYatra

गांव यात्रा गांव कनेक्शन की नई सीरीज है। जिसमें किसान और गांवों की समस्याएं, अनछुए मुद्दे, चौपालों की बतकही और प्रगतिशील किसानों की कहानियां देखने को मिलेंगी। भाग-1

धमतरी (छत्तीसगढ़)। अगर आप दिल्ली-मुंबई जैसे बड़े शहर में रहते हैं और चावल के शौकीन हैं तो संभव है कि आप के पोहे, पुलाव, बिरयानी या फिर खिचड़ी का चावल धमतरी का हो।

धमतरी, प्राकृतिक रूप से बेहद खूबसूरत और आदिवासियों की धरती छत्तीसगढ़ का एक जिला है। रायपुर से करीब 70 किलोमीटर आगे धमतरी पड़ता है। छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, इस कटोरो में सबसे ज्यादा धान धमतरी से आता है, क्योंकि यहां साल में दो बार धान की खेती होती है।

ये भारत के उन खूबसूरत ग्रामीण इलाकों में से एक है जहां, प्रकृति की सादगी ही उसकी सुंदरता बनती है। धमतरी शहर के चारों तरफ धान की सैकड़ों मिले हैं। उसकी एक सीधी वजह यहां धान की बंपर पैदावार है। धमतरी भारत के उन इलाकों में से भी एक है जहां गर्मियों के सीजन में भी धान की खेती होती है। यानि साल में दो बार यहां धान उगाया जाता है।

धमतरी से मगरलोड गांव की तरफ अभी हमारी गाड़ी कुछ देर आगे ही बढ़ी थी कि एक खेत में कई दर्जन महिलाएं धान की रोपाई करती नजर आईं। पानी भरे खेतों में छप-छप के बीच महिलाएं अपनी ही धुन में गुनगुना रहा थीं..

छत्तीसगढ ला कहिए भइया धान के कटोरा

मोरे छत्तीसगढ़ के भुइयां भइया धान के कटोरा

हमन रहैते उमरदा गांव में, ठेकेदारिन ठेका लेते

धान के कटोरा भइया ओ भइया धान के कटोरा

ये उमरदा गांव था, जहां के किसान ब्रह्मानंद साहू के खेत में उस दिन धान की रोपाई हो रही थी। उमरदा गांव की पार्वती देवी ने धान लगाने का ठेका लिया था। महिलाएं यहां खेती की रीढ़ हैं। धान की नर्सरी (पौध) से लेकर रोपाई और कटाई तक सारी जिम्मेदारी महिलाएं ही उठाती हैं।


उम्र के करीब 4 दशक पार कर चुकी पार्वती देवी खेत में काम कर रही 25 महिलाओं की अगुवा थीं। पार्वती बताती हैं, "4000 रुपए प्रति एकड़ में रोपाई का ठेका लिया है। अगर शाम तक सवा से डेढ़ एकड़ खेत लग जाएगा तो हर महिला को 200 रुपए मिल जाएंगे।" पार्वती ठेकेदार हैं, लेकिन जो मजदूरी मिलती है वो सब में बराबर बंटती है। पार्वती के मुताबिक जब खेतों में काम होता है काम लगातार मिलता है वर्ना बाद में मुश्किल हो जाता है।

धमतरी में हमारे साथी, सारथी और वरिष्ठ पत्रकार पुरुषोत्तम ठाकुर बताते हैं, "रोपाई का काम यहां महिलाओं को ही करना है। इसलिए नहीं की महिलाएं ये काम अच्छे से कर पाती हैं कि छत्तीसगढ़ में रोपाई को पुरुष अपने लिए बहुत छोटा काम मानते हैं। वो बाहर जाकर मजदूरी कर लेंगे लेकिन रोपाई नहीं करेंगे।"

हमने कई पुरुषों से बारे में पूछा लेकिन वो कुछ बोले नहीं, बस इतना ही कहा कि "वो शुरु से करती आ रही हैं.." कोई पुरुष हां करता तो समझाते जरुर कि पानी भरे खेत में ऊपर से पड़ती धूप के बीच लगातार कई-कई घंटे झुके रहना आसान नहीं होता।

रोपाई को दरकिनार करें तो पुरुष खेतों में खूब पसीना बहाते हैं। धान, गेहूं, मक्का और चना यहां बहुतायत होती है। गर्मियों में भी धान की खेती के बारे में पूछने पर खेत के मालिक ब्रह्मानंद साहू बताते हैं, "हमारे खेत की जो मिट्टी है इसमें चने और गेहूं का पौधा अच्छे पनपता नहीं है। धान अच्छा हो जाता है। इस सीजन में धान की फसल में रोग भी कम लगते हैं। मैंने मिट्टी की जांच भी कराई थी।" ब्रह्मानंद ने इस बार 4 एकड़ में धान लगाए हैं। वैसे तो धमतरी में पिछले कई दशकों से साल में दो बार धान की खेती होती आ रही है। यहां की जलवायु और गगरेल डैम की वजह से पानी की उपलब्धता बड़ी वजह है।


धमतरी के अलावा छत्तीसगढ़ के उत्तरी क्षेत्र सरगुजा, सूरजपुर, बलरामपुर, जशपुर के एक बड़े हिस्से में साल में दो बार धान की खेती होती है। बस्तर में जगदल कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक धर्मपाल किरकेट्टा बताते हैं, "छत्तीसगढ़ का बड़ा हिस्सा लो लैंड (जलभराव) वाला है। जिसके चलते गर्मियों में कई इलाकों में खेतों में पानी रहता है। अब लगातार जल दोहन के चलते जलस्तर नीचे जा रहा है। लेकिन कुछ हिस्सों में हालात वैसे ही है। धमतरी के साथ एक प्लस प्वाइंट ये है कि यहां गगरेल डैम है, जहां नहरों का जाल है और पानी की उपलब्धता धान की खेती को बढ़ाती है।"

प्राकृतिक हालातों के अलावा इस साल जो सबसे बड़ा कारण धान की बंपर रोपाई का रहा वो धान छत्तीसगढ़ की नई सरकार में धान का 2500 रुपए कुंतल का रेट। तीन बार के सीएम रहे डॉ. रमन सिंह को मात देकर सत्ता में आए भूपेष बघेल ने आते ही धान की सरकारी कीमत 2500 रुपए कर दी। ये केंद्र सरकार के तय न्यूनतम समर्थन मूल्य से 750 रुपए यानि करीब 42 फीसदी ज्यादा है।

पूरे देश में धान की सबसे ज्यादा कीमत के फैसले को ब्रह्मानंद किसान के हित में बताते हैं, लेकिन सरकार से उपज खरीद की बढ़ाने की सलाह देते हैं। "सरकार एक एकड़ से किसान से 14 कुंतल 80 किलो ही खरीद रही है। जबकि पैदा होता है 30-21 कुंतल है। ऐसे में जो बाकी 12-15 कुंतल बचाता है वो उसे मंडी में 1600-1700 में बेचना पड़ता है। सरकार को खरीद बढ़ाकर प्रति एकड़ 22-23 कुंतल करनी चाहिए।"


स्थानीय पत्रकार पुरुषोत्तम खेतों से लौटते वक्त कई मिल दिखाते हुए कहते हैं, "अकेले धमतरी में ही 150-200 धान मिल होंगी। आप अगर बोरी में धान लाते हैं या सरकारी कोटे से धान लेने जाते हैं तो एक बार उसकी बोरी पर ध्यान दीजिएगा शायद उसमें धमतरी की मुहर लगी हो।"

छत्तीसगढ़ में धान मिलों का भी पुराना इतिहास है। 1935 में भी यहां 46 चावल मिलें थीं।

छत्तीसगढ़ में प्रदेश सरकार कृषि विभाग की आत्मा परियोजना के अंतर्गत औषधीय गुण वाले धान की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इनमें जवा फूल, जीरा फूल, तुलसी मंजरी, कस्तूरी, बादशाह भोग, लाल चावल, काला नमक चावल आदि शामिल हैं।

छत्तीसगढ़ में करीब 43 लाख किसान परिवार हैं और धान यहां की मुख्य फसल है। छत्तीसगढ़ में करीब 3.7 मिलियन हेक्टेयर में धान की खेती होती है। जिसमें ज्यादा एरिया वर्षा की खेती पर आधारित है। धान यहां की मुख्य फसल है। छत्तीसगढ़ में बीजेपी सरकार भी धान के प्रति कुंतल पर 200 रुपए प्रति कुंतल का बोनस देती थी। हालांकि लगातार जलदोहन के चलते और कई जिलों में 2017-18 में सूखे जैसे हालातों के चलते पूर्ववर्ती रमन सिंह सरकार ने गर्मियों के धान पर प्रतिबंध भी लगाया था।

उस वक्त कांग्रेस विधेयक और अब वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सरकार पर आड़े हाथ लिया था, उनका कहना था कि जब तक किसानों को वैकल्पिक फसलें, नई तरह की खेती न बताई जाए धान लगाने से नहीं रोका जाना चाहिए।

अतिरिक्त सहयोग - पुरुषोत्तम सिंंह ठाकुर, दिवेंद्र सिंह

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