देश के लिए खेल चुका खिलाड़ी अब गाँव के युवाओं को सिखा रहा फुटबॉल

कैमूर (बिहार)। एक छोटे से गाँव में रहने वाले 32 वर्षीय दीपक रावत पिछले पांच वर्षों से गाँव के उन युवा खिलाड़ियों की प्रतिभा को निखारने में लगे हुए हैं, जिनके पास फुटबॉल खेलने के लिए गाँव में न तो कोई सुविधा है और न ही कोई संसाधन।

दीपक बिहार राज्य के कैमूर जिले के देवहलिया गांव में रोजाना सुबह और शाम युवा खिलाड़ियों को फुटबॉल सिखाने के लिए जाते हैं। अपने सफर की शुरूआत के बारे में दीपक गाँव कनेक्शन को बताते हैं, "जब मै सातवीं की पढ़ाई कर रहा था तब फुटबॉल खेल रहा हूं, जिसमें मै 2001 में स्कूल की तरफ से स्टेट खेला 2004 में भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) पटना में सलेक्शन हुआ। जिसके बाद मै 2005 में जूनियर नेशनल (अंडर 19) समस्तीपुर, नेशनल आफ आल इंडिया (अंडर 21) जमालपुर मुंगेर बिहार में खेला। इसके साथ ही वर्ष 2012 में मै बिहार की तरफ से संतोष ट्राफी भी खेल चुका हूं।"

नेशनल खेलने के बाद भी दीपक को नौकरी नहीं मिली, जिसके बाद उन्होने गाँव के युवाओं को फुटबॉल सिखाना शुरू कर दिया। "जब मै गाँव आया तब देखा कि हमारे गांव के युवा फुटबॉल खेल तो रहे थे मगर खेल का नियम और सही तरीका नहीं पता था। वह केवल मनोरंजन की तरह खेल रहे थे। तब मैंने सोचा की फुटबॉल सिखाऊंगा और इसी में इनका कैरियर बनाऊंगा। आज यहां खेलने वाले खिलाड़ी नेशनल तक खेल चुके है, "दीपक ने आगे बताया।

दीपक से फुटबॉल सीखे अमजद अंसारी पिछले दो वर्षों से फुटबॉल खेल रहे है और कई बार नेशनल भी खेल चुके है। अंसारी बताते हैं, "आज गुरु के बदौलत मैं यहां तक पहुंचा हूं।"


दीपक के पिता रिटायर सैनिक हैं, मगर इस मंहगाई के दौर में घर की जरूरत पेंशन से पूरी नहीं हो पाती, जिसके चलते मजदूरी भी करना पड़ती है। फिर भी किसी तरह दो कमरे सरकार की मदद से बना है। घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण दीपक को शहर से गाँव आना पड़ा। जहां पर युवाओं को फुटबॉल सिखाना शुरू कर दिया।

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वहीं दीपक से फुटबॉल की ट्रेनिंग ले रहे शैयद कहते हैं, "पिता मजदूरी करते है इतना पैसा नहीं की बाहर जाकर खेल सकूं। हमे यहां सीखकर ही आगे बढ़ाना है।"

दीपक ग्रामीण युवाओं को फुटबॉल सिखाने के लिए चंदा भी इकट्ठा करते हैं, ताकि विदेश से उनके लिए फुटबॉल भी मंगवा सके। दीपक गाँव कनेक्शन को बताते हैं, "गांव में प्रतिभा की कमी नहीं है मगर सरकार की योजनाएं बड़े शहरों और जिलों तक ही रह जाती है, जिसके चलते गांव की प्रतिभा गांव तक ही सिमट कर रह जाती है। आज गांव के लोगों की मदद से चंदा इकट्ठा कर के हम जर्सी से लेकर फुटबॉल खरीदते हैं।"

दीपक के पास आज दस से ज्यादा बच्चे सीखने आते हैं। दीपक के पिता बताते हैं, "जो मेरा बेटा आज कर रहा है उससे बहुत खुश हूं।" 75 साल के पिता की आंखो में बेटे के जज्बे का सम्मान दिखा। मगर एक धीमी आवाज में उन्होंने कहा कि आप जो कर रहे हैं इससे उसकी नौकरी लग जाएगी क्या?

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