भारत समेत दुनिया के कई देशों में होने वाला है खाने का संकट, ये है वजह

भारत समेत दुनिया के कई देशों में होने वाला है खाने का संकट, ये है वजहमधुमक्खी

लखनऊ। दुनिया में उगाए जाने वाले 80 प्रतिशत फल एवं सब्जियों में परागण (पॉलिनेशन) मधुमक्खियों से होता है, लेकिन खेतों में हानिकारक कीटनाशकों के प्रयोग, मोबाइल फोन के बढ़ते चलन और मधुमक्खियों में फैलने वाली बीमारियों के कारण इनकी संख्या लगातार घटती जा रही है। इससे वैश्विक खाद्य आपूर्ति पर संकट मंडराया जा रहा है।

यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टीकल्चर साइंस, बागलकोट के कीट विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर जाननेश्वर गोपाली बताते हैं,“भारत में पिछले एक दशक में करोड़ों की संख्या में मधुमक्खियां खत्म हो चुकी हैं। मधुमक्खियों की घटती संख्या से पूरे देश में फल एवं सब्जी उत्पादन पर गहरा असर पड़ा है। देश में सबसे अधिक दक्षिणी राज्यों ( कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और आंध्रप्रदेश) में मधुमक्खियों की संख्या तेज़ी से घटी है। इन राज्यों में पिछले पांच वर्षों में 60 फीसदी मधुमक्खियां खत्म हो चुकी हैं।”

भारत में पिछले एक दशक में करोड़ों की संख्या में मधुमक्खियां खत्म हो चुकी हैं। मधुमक्खियों की घटती संख्या से पूरे देश में फल एवं सब्जी उत्पादन पर गहरा असर पड़ा है।
डॉ. जाननेश्वर गोपाली, कीट वैज्ञानिक

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कर्नाटक की यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टीकल्चर साइंस, बागलकोट में कीट विभाग की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 150 मिलियन हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में खेती होती है, जिसमें 60 मिलियन हेक्टेयर कृषि क्षेत्र से अधिक में होने वाली खेती मधुमक्खियों द्वारा होने वाले परागण पर निर्भर है। इनमें से सूरजमुखी, सरसों, ककड़ी और धनिया जैसी सब्जियां व सेब, अंगूर और आम जैसे फलों के लिए परागण बेहद आवश्यक हैं।

“भारत में मधुमक्खियों की घटती संख्या का मुख्य कारण खेती में रसायनिक कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल है। हानिकारक कीटनाशकों के फसलों में छिड़काव के कारण मधुमक्खियां उनके संपर्क में आ जाती हैं, जिससे उनकी मौत हो जाती है। फ्लोरा का कम होना भी मधुमक्खियों के खत्म होने की मुख्य वजहों में से एक है।” डॉक्टर जाननेश्वर गोपाली ने आगे बताया।

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वैश्विक स्तर पर कृषि में मधुमक्खियों की भागीदारी पर काम कर रही अमेरिका की संस्था यूएस एग्रीकल्चर रिसर्च सर्विस के अनुसार वर्ष 2009 -10 की सर्दियों के दौरान मधुमक्खियों में फैलने वाली बीमारी कालोनी कोलेप्स डिसऑर्डर सीसीडी और मोबाइल फोन से निकलने वाली तरंगों से मधुमक्खियों के एक तिहाई हिस्से की मृत्यु हो गई, जिसका असर वैश्विक खाद्य आपूर्ति पर आज भी दिखता है।

दुनिया में उगाए जाने वाले 80 प्रतिशत फल एवं सब्जियों में परागण मधुमक्खियों से होता है।

तेज़ी से घट रही मधुमक्खियों की संख्या के बारे में बताते हुए उत्तर प्रदेश में मधुमक्खी पालन व शहद के व्यवसाय में पिछले 10 वर्षों से बड़े स्तर पर काम रहे व्यवसाई राकेश गुप्ता बताते हैं,'' आज लोगों के बीच दो तरह की मधुमक्खियां हैं। एक व्यवसायिक मधुमक्खी और दूसरी प्राकृतिक मधुमक्खी। खेतों में कीटनाशक और फसल अवशेषों को जला देने से बड़ी संख्या में लोगों ने प्राकृतिक मधुमक्खियों को खत्म कर दिया है। बंद डिब्बों में शहद उत्पादन के लिए व्यवसायिक मधुमक्खियों को शहद निकालते समय धुंवा करके मार डाला जाता है।''

वैश्विक स्तर पर तेज़ी से खत्म हो रही मधुमक्खियों पर वल्र्ड ऑर्गेनाईज़ेशन फॉर एनिमल हेल्थ, पेरिस ने मधुमक्खियों के मृत्युदर पर शोध की इस शोध में सामने आया कि सिर्फ कीटनाशकों के प्रयोग से ही नहीं बल्कि ग्लोबल वार्मिंग, बेक्टीरियल व वाइरल बीमारियां और दुनियाभर में कम हो रहे वनस्पति व जल संसाधनों की वजह से पूरी दुनियां में पोलिनेटर मधुमक्खियों की संख्या घट रही है।

''जैविक खेती को बढ़ावा देने से मधुमक्खियों की घटती संख्या पर काबू पाया जा सकता है। खेती में रसायनिक कीटनाशकों का प्रयोग कम करना होगा। सब्जियों व फलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए में सरकार को भी मधुमक्खी संरक्षण पर जल्द ही कोई ठोस कार्ययोजना बनानी होगी नहीं, तो भारत भी उन यूरोपियाई देशों में शामिल हो जाएगा, जहां मधुमक्खियां विलुप्त होने के कगार पर हैं।'' डॉ. जाननेश्वर गोपाली ने बताया।

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