धान के पुआल को बिना जलाए धन कमा सकते हैं किसान

धान के पुआल को बिना जलाए धन कमा सकते हैं किसानफोटो: इंटरनेट

लखनऊ। दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में धुंध के कारण आजकल तूफान मचा हुआ है। जहरीलों गैसों के मिश्रण वाली धुंध से लोग परेशान हैं, इसके लिए पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के पुआल जलाने वाले किसानों को जिम्मेदार माना जा रहा है। विशेषज्ञ बता रहे हैं कि खरीफ फसल में धान की कटाई के बाद खेत में बचे हुए पुआल, जिसे पराली भी कहते हैं, उसको किसान बड़ी मात्रा में जला रहे हैं, जिसके धुंए और राख से स्मॉग फैल रहा है, लेकिन किसान धान के पुआल को जलाए बिना ही जहां पैसा कमा सकते हैं, वहीं पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचा भी सकते हैं।

जलाने से नष्ट हो जाते हैं पौषक तत्व

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली से सूक्ष्म जीव-विज्ञान संभाग की रिपोर्ट के अनुसार, धान के पुआल को जलाने से एक बहुत बड़ी आर्थिक हानि होती है क्योंकि इसमें लगभग 51.76 प्रतिशत आर्गेनिक कार्बन, 0.65 प्रतिशत नाइट्रोजन, 0.20 प्रतिशत फस्फोरस और 0.30 प्रतिशत पोटाश होता है। इसे जलाने से पौषक तत्व नष्ट हो जाते हैं।

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जलाने से निकलती हैं जहरीली गैसें

दूसरी तरफ इसको जलाने से बहुत ही जहरीली गैसें जैसे कार्बनडाइऑक्साइड, कार्बनमोनोऑक्साइड, नाइट्सऑक्साइड, मीथेन, बैंजीन और एरोसोल निकती है। ये गैसें हवा में मिलकर उसे प्रदूषित कर देती है और पूरा वातावरण दूषित हो जाता है। इन जहरीली गैसों के कारण जीवों में तरह-तरह की बीमारी जैसे त्वचा, आंखों की बीमारी, सांस-फेफड़े की बीमारियां और कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियां फैलती हैं।

चारा, कंपोस्ट खाद और ईंधन के रूप

हालिया जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, अकेले पंजाब राज्य में हर वर्ष लगभग 197 लाख टन धान का पुआल जला दिया जाता है, जिसके कारण हर साल उत्तर भारत में नवंबर महीने में धुंध की खतरनाक समस्या पैदा हो रही है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक सत्य प्रकाश त्यागी ने बताया, ''किसान धान की पुआल जलाने की जगह इस पुआल को मवेशियों के चारा, कंपोस्ट खाद बनाने और बिजलीघरों में ईधन के रूप में इस्तेमाल करके लाभ कमा सकते हैं।''

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खेत की नमी को सूखने से रोकता है

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने धान के पुआल को किसान कैसे अपने लिए उपयोगी बना सकते हैं, इसको लेकर एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें बताया गया है कि पुआल को अगर किसान खेत में बिना जलाए छोड़ दें तो यह खेत को फायदा पहुंचाएगा। इस रिपोर्ट के अनुसार पुआल खेत की नमी को सूखने से रोकता है। यह कीड़े-मकोड़ों से भी खेत को बचाता है और पुआल खेत में सड़कर उर्वरक का काम करता है।

मृदा की उर्वराशक्ति बनाए रखना चुनौती

धान के पुआल में सिलिका 11-15 प्रतिशत, लिगनिन 12 प्रतिशत, सेलूलोज 40 प्रतिशत, हेमिसेलूलोज 20 प्रतिशत पाया जाता है। कृषि विभाग के अनुसार हर साल एक हेक्टेयर में हर साल लगभग 6-7 टन प्रति चावल और 4-5 टन प्रति हेक्टेयर गेहूं पैदा होने से लगभग 300 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 किलोग्राम फास्फोरस और 300 किलोग्राम पोटाश जमीन से कम हो जाता है। ऐसे में देश की हर साल बढ़ती जनसंख्या के लिए अधिक अनाज उत्पादन के लिए मृदा की उर्वराशक्ति को बनाए रखना व उत्पादन बढ़ाना सबसे बड़ी चुनौती है।

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और वातावरण भी शुद्ध रहेगा

इस चुनौती से निपटने के लिए फसल अवशेषों और दूसरे जैविक कचरे का कम्पोस्ट खाद बनाकर उसका उचित प्रबंधन करना होगा। इससे जहां मृदा को जरूरी पौषक तत्व उपलब्ध होंगे, मृदा की उर्वराशक्ति बनी रहेगी, पौषक तत्वों की हानि नही होगी और वातावरण शुद्ध रहेगा।

गड्ढा विधि से कंपोस्ट बनाने की सलाह

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली देश में कृषि की आधुनिक तकनीकियों के प्रचलन से देश के उत्तरी मैदानी भागों में भी धान की खेती करने का चलन काफी बढ़ गया है, जिसके परिणामस्वरुप धान के पुआल की मात्रा में काफी वृद्धि हुई है। देश में लगभग 3,000 मिलियन टन जैविक अपशिष्ट हर साल पैदा हो रहा है, इस समस्या से निपटने के लिए धान के पुआल से कंपोस्ट बनाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली के वैज्ञानिकों ने गड्ढा विधि से किसानों को कंपोस्ट बनाने की सलाह दी है।

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