ऐसी स्थति में तो लागत निकालना भी मुश्किल

ऐसी स्थति में तो लागत निकालना भी मुश्किलफोटो: विनय गुप्ता।

लखनऊ। रबी सीजन की प्रमुख सब्जियों में आलू, टमाटर और प्याज किसानों की स्थिति पूरे देश में खराब है। बंपर पैदावार के बाद भी किसानों के चेहरे पर खुशी गायब है। स्थिति यह है कि मुनाफा तो छोड़िए किसानों की लागत तक नहीं निकल रही है।

मंडी में सवा दो रुपए प्याज बेचा

मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के कनाडिया गाँव किसान दिलीप पाटीदार ने बताया, ''इस साल चार बीघे में प्याज की फसल लगाई थी, पैदावार भी अच्छी हुई, लेकिन जब मंडी में बेचने की बारी आई तो सवा दो रुपए किलो प्याज बेचने पर हम लोग मजबूर थे। स्थिति यह है कि प्याज उगाने से अभी तक घाटे में हूं।''

टमाटर एक रुपए किलो खरीदने को तैयार नहीं

ऐसा सिर्फ हाल सिर्फ इनका ही नहीं है, बल्कि झारखंड की राजधानी रांची से 40 किलोमीटर दूर बुंडू के किसान मनोज सिंह मुण्डा ने गाँव कनेक्शन को बताया, ''हमारे गाँव में सबसे ज्यादा सब्जियों की खेती होती है, इस साल तीन बीघे में टमाटर की फसल लगाई थी, अच्छी पैदावार भी हुई, लेकिन अपने क्षेत्र की सब्जियों की प्रसिद्ध मंडी भुईयांडीह में टमाटर बेचने गया तो एक रुपए किलो भी खरीदने को आढ़ती तैयार नहीं थे।'' उन्होंने बताया, “मजबूरी में हम ही नहीं, बल्कि गाँव के लोग खेत में ही टमाटर को छोड़ दिए।“

मटर में भी लागत नहीं निकाल पा रहे किसान

देश की प्रमुख मंडियों में पंजाब की मटर ने दस्तक दे दी है, इस साल के रबी सीजन में पंजाब में मटर की बंपर पैदावार हुई, लेकिन इसके बाद भी यहां के किसान परेशान हैं। होशियापुर जिले के कस्बा टांडा के गाँव घुल्ला के किसान गुरबीर सिंह ने बताया, ''मटर की अच्छी पैदावार होने पर लगा था कि इस बार अच्छी कमाई होगी, लेकिन मटर का दाम काफी गिर गया है। मटर तुड़ाई के लिए मजदूरों को प्रति किलो 4 रुपए से लेकर 7 रुपए किलो देना पड़त रहा है, लेकिन मंडी में मटर 8 से लेकर 10 रुपए किलो बिक रही है। ऐसे में लागत निकलना मुश्किल हो रहा है।''

किसानों के साथ किस तरह का मजाक

तीन राज्यों के किसानों का यह बयान यह बताता है कि हमारे देश में किसानों के साथ किस तरह का मजाक किया जा रहा है। किसान जब अपनी फसल का उत्पादन अच्छा करता है तो दाम गिरा दिया जाता है, जिससे उसकी लागत निकलना मुश्किल हो जाती है, वहीं वही फसल बाद में अधिक दाम में बेची जाती है।

उत्पाद और विपणन संबंधी नीतियों में सामंज्स्य नहीं

झारखंड की राजधानी स्थित बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, झारखंड के डिपार्टमेंट आफ एग्रीक्ल्चर इकोनामिक्स के पूर्व विभागाध्यक्ष, प्रो. डा. रामप्रवेश सिंह ने बताया, '' अक्सर यह देखा जाता है कि जब उत्पादन में वृद्धि होती है तो मूल्यों में गिरावट आ जाती है, जैसे इस समय देश के अनेक हिस्सों में प्याज, आलू और टमाटर के दामों में देखा जा रहा है। सरकार की उत्पाद और विपणन संबंधी नीतियों में सामन्जस्य नहीं होने के कारण उत्पादन बढ़ने से किसानों को फायदा कम नुकसान ज्यादा हो रहा है।''

सिर्फ डेढ़ हजार रुपए कमा पाते हैं किसान

उन्होंने आगे बताया, “एक तरफ जहां सरकार किसानों की आय दोगुनी करने की योजनाएं चला रही है, वहीं स्थित यह है खेती में मुनाफा तो छोड़िए किसानों की लागत भी नहीं निकल रही है। घाटा का सौदा बनती खेती से किसान निराश हो रहे हैं। भारत में किसानों की हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लगभग 17 राज्यों के किसान महीने में औसतन सिर्फ डेढ़ हजार रुपए कमा पाते हैं।“ उन्होंने बताया, “किसानों की आय 2022 में अगर दोगुनी करनी है तो कृषि में निवेश 22 प्रतिशत बढ़ाने के साथ ही कृषि का विविधकरण और प्रतिस्पर्घी बाजार मूल्य बनाना होगा। जिससे बेहतर उतपादन करके किसान बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकें।“

ऐसा होता दिख नहीं रहा है

साल 2004 में केन्द्र सरकार की तरफ से किसानों के लिए गठित एमएस स्वामीनाथन आयोग में काम कर चुके किसान नेता और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव अतुल कुमार अंजान ने बताया, ''अगले 5 सालों में किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य पाना है तो उसके लिए जरूरी है कि किसानों की हर महीने की एक न्यूनतम आय सुनिश्चित हो लेकिन ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है।'' उन्होंने कहा, “भारत में भले ही आधे से ज्यादा आबादी खेती के काम पर निर्भर है, पर यहां के किसानों की हालत अमेरिका और यूरोप की तुलना में बहुत ज्यादा खराब है। अमेरिका में किसान की आय वहां के लोगों की औसत आय से 150 गुना ज्यादा है। इसकी बड़ी वजह उनकी उत्पादन क्षमता नहीं बल्कि उन्हें वहां की सरकार से मिलने वाली मदद है।“ अतुल कुमार अंजान ने कहा, “साल 2022 तक किसानों को आय दोगुनी करने के लिए अगले पांच सालों में कृषि विकास दर को 14 प्रतिशत तक रखना पड़ेगा, जबकि अभी की हकीकत ये है कि हमारी कृषि विकास दर सिर्फ 4.1 प्रतिशत है।“

किसानों पर 12.69 लाख करोड़ का कर्ज

खेती में लगातार हो रहे घाटे से देश किसान कर्ज में डूब रहा है और आत्महत्या भी करने पर मजबूर है। केन्द्रीय कृषि मंत्रालय की हालिया जारी रिपोर्ट के अनुसार, पूरे देश में 12.69 लाख करोड़ रुपए का कर्ज किसानों पर है। जिसमें से 7.75 लाख करोड़ जहां फसली कर्ज है, वहीं 4.85 लाख करोड़ टर्म लोन है। पूरे देश में किसानों का क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों से 1.45 लाख करोड़ लोन दिया गया है, वहीं सहकारी बैंक की तरफ से 1.58 लाख करोड़ और व्यवसायिक बैंकों की तरफ से 9.57 लाख करोड़ रूपए का कर्ज दिया गया है। पूरे देश में 4,68,48,100 किसान परिवार कर्ज में डूबे हैं।

किसान कर्ज के दुश्चक्र में फंस गए

कृषि नीतियों के जानकार देविंदर शर्मा ने बताया, ''सरकार की आर्थिक नीतियों का नतीजा है कि किसान कर्ज में डूबा है। सरकार ने किसानों को जान-बूझकर गरीब रखा गया। कृषि को व्यवस्थित तौर पर आर्थिक रूप से अलाभप्रद बनाया गया, जिसके कारण किसान कर्ज के दुश्चक्र में फंस गए। स्थिति यह है कि पिछले एक दशक में कृषि ऋणग्रस्तता में 22 गुना की बढ़ोतरी हुई है।“

आय से ज्यादा कर्ज का भार

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय ने देश के ग्रामीण क्षेत्र में 2013 के दौरान किए सर्वेक्षण में जो आंकड़े इकट्ठे किए और उसका जब विश्लेषण किया गया तो पाया गया कि किसानों की औसत मासिक आमदनी मात्र 6426 रुपए है, जबकि औसत किसान परिवारों पर 47000 रुपए का कर्ज बकाया है। सातवें वित्त आयोग ने केन्द्रीय कर्मचारियों के लिए जो न्यूनतम वेतन निर्धारित किया है उसके मुताबिक सरकारी कर्मचारियों को 18000 रुपए मूल वेतन मिलेगा और इसमें विभिन्न भत्तों को जोड़ने जाने पर उनको हर महीने कम से कम 25 से 30 हजार रुपए सैलरी मिलेगी। ऐसे में समझा जा सकता है कि देश में किसान क्यों खेती छोड़ना चाहते हैं।

तंत्र, नाकाफी और अप्रभावी

नीति आयोग में लैंड पॉलिस सेल के प्रमुख डॉ. टी. हक ने हाल वर्ष 2022 में किसानों की आय दोगुनी करने को लेकर नीति आयोग को जो सुझाव दिया है, उसमें बताया गया है कि कृषि उपज की कीमत और विपणन व्यवस्था में सुधार किसानों की आय बढ़ाने की कुंजी है। अभी किसानों की विभिन्न फसलों का समर्थन मूल्य मुहैया कराने का जो तंत्र है, वह नाकाफी और अप्रभावी है।

नीति आयोग ने दिए हैं सुझाव

नीति आयोग को सुझाव दिया गया है कि एक ऐसा सिस्टम विकसित किया जाए जिसमें किसानों की बाजार तक सीधी पहुंच हो जाए और किसान अपने उत्पाद का मूल्य तय कर सकें। किसान को उनकी उपज का सही दाम मिले इसके लिए सरकार दाम स्थिरता कोष के गठन के बारे में विचार करे। ऐसा होने पर किसानों को अपनी लागत से कम कीमत पर अपने उत्पाद बचने की नौबत नहीं आएगी।

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