गन्ना किसानों को रेड रॉट से होने वाले नुकसान बचाने के लिए वैज्ञानिकों की पहल

उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद ने रेड रॉट रोग प्रतिरोधी नई किस्म के 300 क्विंटल बीज को गन्ना समितियों के माध्यम से किसानों में बांटा है। साथ ही जिन किसानों के पास बीज पहुंच गया है, उनके जरिए भी दूसरे किसानों तक बीज पहुंच रहा है।

Ramji MishraRamji Mishra   30 Nov 2021 12:46 PM GMT

शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश)। गन्ना किसानों के लिए पिछले कुछ वर्षों में रेड रॉट यानी लाल सड़न रोग एक बड़ी परेशानी बन गई है, लेकिन इस परेशानी का भी हल वैज्ञानिकों ने ढूंढ़ लिया है, और अब इस हल को ज्यादा से ज्यादा किसानों तक पहुंचाने का प्रयास जारी है।

रेड रॉड यानी लाल सड़न रोग से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर ने गन्ने की नई किस्म विकसित की है। इस किस्म का नाम को. शा. 13235 है। जहां को का मतलब कोयंबटूर और शा का मतलब शाहजहांपुर है।

दरअसल गन्ने की एक ही किस्म 'को 0238 किस्म' को बार-बार लगाने से गन्ने में रेड रॉट बीमारी का प्रकोप बढ़ने लगा है। यूपी ही नहीं दूसरे पंजाब, हरियाणा जैसे दूसरे राज्यों में भी यह रोग फैलने लगा है।

गन्ने को तोड़ेंगे तो आसानी से टूट जाएगा और चीरने पर एल्कोहल जैसी महक आती है।

गन्ना की किस्म 0238 को गन्ना प्रजनन संस्थान के करनाल क्षेत्रीय केंद्र पर विकसित किया गया था, साल 2009 के बाद उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड जैसे कई राज्यों तक गन्ने की किस्म पहुंच गई। पश्चिमी व पूर्वी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर जिलों में किसान इसी किस्म की खेती करते हैं। जैसे-जैसे सभी जिलों में इस किस्म का रकबा बढ़ा वैसे वैसे ही इस में बीमारियां बढ़ने लगी, सबसे ज्यादा असर रेड रॉट (लाल सड़न) का रोग रहा है।

गन्ना विकास परिषद के वैज्ञानिक डॉ अनिल सिंह बताते बताते हैं, "जो अभी तक किसानों द्वारा को. 0238 किस्‍म लगभग 86% क्षेत्रफल में बोया जाता रहा है इसमें रेड रॉट नाम की बीमारी एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। को शा 13235 किस्म अब किसानों को को.0238 के विकल्प के रुप में मिली है।"

वो आगे कहते हैं, " को. शा. 13235 किस्म के एक गन्ने का वजन लगभग 1 किलो से डेढ़ किलो के बीच होता है। अगर इस किस्म की पैदावार की बात की जाए तो 1000 से 1200 कुंतल प्रति हेक्टेयर इसकी उपज है। इसके साथ यह किस्म कीट एवं रोग रोधी है। नवविकसित गन्ना किस्मों को त्वरित रूप से बीज उत्पादन टिशू कल्चर विधि से बीज तैयार करने का कार्य शोध परिषद द्वारा किया जा रहा है। जिसमें नवीन किस्मों का बीज किसानों को जल्द से जल्द पहुंचाने का कार्य किया जा रहा है।"

ऐसी विकसित होती है गन्ना की नई किस्म

अनिल सिंह आगे बताते हैं कि एक गन्ने की किस्में विकसित करने में लगभग 8 वर्ष लग जाते हैं। एक साथ हजारों गन्ने के जीनोटाइप का परीक्षण किया जाता है। इसके बाद जिन जीनोटाइप का निर्धारित मानक के अनुरूप उपज चीनी परता और कीटरोधी व रोगरोधी होती है, उन्हीं जीनोटाइप को किस्म के रूप में सामान्य खेती के लिए बीज गन्ना और गन्ना किस्‍म स्वीकृति उप समिति द्वारा स्वीकृत की जाती है।

वहीं गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर के प्रसार अधिकारी डॉ. संजीव कुमार पाठक कहते हैं कि पिछले कुछ सालों से लाल सड़न बीमारी आ जाने से इस किस्म की लाइफ बहुत अधिक नही है। ऐसे में हमारे सामने चुनौती थी किसानों को इससे निजात दिलाने की। अथक प्रयास के बाद 2019 के बाद हमने को शा 13235 विकसित करने में सफलता मिल गई।


डॉ संजीव आगे कहते हैं, "एम एस 6847 और को. 1148 के संकरण के बाद इसे तैयार किया गया। इसके बाद हमारे सामने इसे तेजी से किसानों तक पहुंचाना चुनौती थी। हमने किसानों तक पहुंचाने के लिए युद्व स्तर पर काम किया। हमने पहले 300 कुंतल बीज गन्ना समितियों के माध्यम से वितरित किया गया। 2021 में एक करोड़ सिंगल बड हमने गन्ना विकास परिषद द्वारा किसानों तक पहुंचाया गया। आने वाले सालों में हम और तेज काम कर रहे हैं। साथ ही जो किसान बीज ले जा चुके हैं उनके माध्यम से भी एक किसान से दूसरे किसान तक इसका बीज पहुंचेगा और हम लाल सड़न रोग से निपटने में किसानों की मदद करने के अपने प्रयास में पूरी तरीके से सफल होंगे।

गन्ने की फसल में किसी बीमारी के लगातार बढ़ते रहने के पीछे की कहानी समझाते हुए उत्तर प्रदेश के गन्ना शोध परिषद के संयुक्त निदेशक डॉ वीरेश सिंह बताते हैं, "किसी भी समय जो एक गन्ने की प्रजाति होती है उसे लगातार लगाने से उसमें कुछ समय बाद बीमारी आ जाती हैं। उसमें कीट का प्रकोप भी बढ़ने की बड़ी संभावना रहती है। गन्ने की किस्म भी समय के साथ धीरे धीरे परिवर्तित होती है। इसका उत्पादन भी प्रभावित होता है।"

वो आगे समझाते हैं, "उदाहरण के लिए इस क्षेत्र में को 0238 ने एक लंबा एरिया कवर कर लिया है। बड़े पैमाने पर इसकी खेती हुई। लेकिन इसमें कई साल से बड़े रोग और बीमारी देखने को मिली है। जो तेजी से फैले हैं और यह सब हुआ है केवल एक ही किस्म पर निर्भर होने से। मैं गांव कनेक्शन के माध्यम से यह अनुरोध करूंगा कि कभी किसी एक ही किस्म का उत्पादन ना किया जाए। इसीलिए तीन नई किस्म लाई गई हैं। इनमें से सबसे अच्छी किस्म है को. शा. 13235। इसके अलावा लखनऊ से विकसित को एलके 14201 तीसरी किस्म को. 15023 यह विकल्प के रूप में दी गई हैं। जिस खेत में बीमारी है उसमें एक साल तक पहले कोई और फसल की जाए उसके बाद सामान्य की किस्म लगाई जाए। इसके बाद ही गन्ने की इस किस्म की बुवाई की जाए। साथ ही जिस खेत में बीमारी है उसमें अंकुश का प्रयोग किया जाए और ज्यादा खाद का प्रयोग ना किया जाए।

परिषद द्वारा गन्ना किसानों गन्ना विकास विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों चीनी मिल के प्रतिनिधियों को नवविकसित तकनीक का प्रशिक्षण कार्य भी किया जाता है। इसके अलावा इस परिषद द्वारा पश्चिमी मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश के चीनी मिल क्षेत्रों में कीट और रोग प्रबंधन के लिए सर्वेक्षण कर त्वरित निदान के सुझाव दिए जाते हैं। शोध परिषद द्वारा जैव उत्पाद जैसे एजोटोवैक्टर, पी एस वी, ट्राईकोडरमा और आर्गेनोडी कंपोजर (अंकुश), ड्राईकोकार्ड, बवेरिया, वैसियाना तथा मेटाराईजियम का उत्पादन का कार्य किया जा रहा है। जिससे गन्ना किसान व चीनी मिल लाभान्वित हो रहे हैं।

उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद द्वारा अब तक विकसित गन्ना किस्मों की बात की जाए तो 1918 से अब तक 230 किस्में विकसित की जा चुकी हैं। यह किस्में उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश, बिहार और राजस्थान में भी उपयोग में लाई जाती हैं।

इस समय परिषद द्वारा और भारत सरकार द्वारा नोटिफाइड की गई 65 गन्ना किस्में सामान्य खेती के लिए उत्तर प्रदेश में स्वीकृत हैं इनमें से 29 किस्में शीघ्र पकने वाली और 36 किस्में मध्य देर से पकने वाली किस्म की हैं। इन सभी स्वीकृत किस्‍म की सफलतापूर्वक खेती की जा रही है।

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