खेती के विकास का टिकाऊ रास्ता

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खेती के विकास का टिकाऊ रास्ताgaon connection, गाँव कनेक्शन, संवाद, sanvad, do took, manjit thakur

इन दिनों एक लंबी यात्रा पर हूं। इस चार राज्यों के इस सफर के ज़रिए भारत के विकास की रफ़्तार को नापने की कोशिश कर रहा हूं। आज किस्सा पंजाब का। देश में हरितक्रांति आई तो पंजाब-हरियाणा ने खेती के नए तरीकों को गले लगाया और अनाज की कमी से जूझ रहे देश का पेट भरने के लिए भरपूर पैदावार दी। पर हरितक्रांति के हल्ले में एक गलती होती चली गई। 

पैदावार बढ़ाने के लिए रासायनिक खाद-कीटनाशकों का भरपूर इस्तेमाल हुआ। वैज्ञानिकों ने उस समय बताया और खेतिहर

अपनाते गए। संकर बीज, रसायन, रासायनिक खाद। उपज बढ़ी पर उसका असर पड़ा ज़मीन पर, लोगों पर, उनकी सेहत पर और पानी पर। 

आज की तारीख में देश में रासायनिक खाद के इस्तेमाल का औसत 128 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। दक्षिणी पंजाब और उत्तरी हरियाणा में उर्वरकों के इस इस्तेमाल का आंकड़ा कुछ और ज्यादा ही है। पूरे पंजाब राज्य में औसत रूप से 250 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर और हरियाणा में 207 किलोग्राम की खपत होती है। नतीजा यह हुआ सिंचाई के लिए खेतों में खुला पानी छोड़ देने की आदत और पंजाब, हरियाणा में पहले से पानी की कमी से रासायनिक खाद और कीटनाशकों का जहर जानवरों से होता हुआ, अनाज से इंसानों में प्रवेश कर गया। 

पंजाब में इस जहर का असर लोगों की सेहत पर पडऩा शुरू हो गया। कैंसर रोगियों की तादाद यहां सबसे अधिक है। बठिंडा के आस-पास के कई गाँव तो ऐसे हैं जहां कैंसर के रोगी सैकड़ों की तादाद में हैं। बठिंडा से चल बीकानेर जाने वाली एक ट्रेन का नाम ही कैंसर एक्सप्रेस हो गया है। कैंसर रोगी बीकानेर इलाज कराने जाते हैं। आज तो पंजाब के इस विकास को अब टिकाऊ शक्ल देने के बारे में सोचने वाले कुछ किसानों की कहानी। 

हम बठिंडा के कलालवालां गाँव पहुंचे तो वहां मुलाकात हुई भोला सिंह, जगदेव सिंह और उनके भतीजे रॉबिन सिंह से। इन लोगों ने जैविक खेती शुरू की। सब्जी, गेहूं, या गुलाब की खेती हो इन लोगों ने रासायनिक खादों का इस्तेमाल बंद कर दिया। जगदेव सिंह के परिवार का खास है उनका जैविक कीटनाशक। इन लोगों ने जीव अमृत नाम से एक ऐसा खास घोल तैयार किया है जो मिट्टी के पोषक तत्वों को बढ़ा देता है। हमारे कहने पर इन लोगों ने वह मिश्रण बनाना हमें भी सिखा दिया है। उनके मुताबिक, यह मिश्रण हर राज्य के किसानों के काम आना चाहिए। 

जीव अमृत के लिए 10 किग्रा देसी (संकर नहीं) गाय का गोबर, 10 किग्रा गोमूत्र, दो मुट्ठी नदी या नहर की बिना रसायन वाली मिट्टी, एक किग्रा गुड़ या दो लीटर गन्ने का रस, एक किग्रा फलीदार आटा और इसमें 200 लीटर पानी मिलाकर छाया में 48 घंटे के लिए छोड़ दीजिए और हर बारह घंटे में एक बार लकड़ी से चला दें। ठीक 48 घंटे बाद इस जीव अमृत को 15 लीटर पानी में 2 लीटर मिलाकर एक एकड़ में छिड़काव करने से फसल पर दस दिनों के भीतर असर दिखने लगता है। मेरी सलाह है कि इसको बनाने का खर्च बेहद कम है तो क्यों न इस्तेमाल कर के देखा जाए। रसायनों पर सब्सिडी के लिए हो-हल्ला नहीं होगा। सरकार का बोझ दो तरफ से कम होगा। रसायनों के इस्तेमाल से होने वाले सेहत के नुकसान पर दवाओं का खर्च कम होगा सो घलुए में।

(लेखक पेशे से पत्रकार हैं ग्रामीण विकास व विस्थापन जैसे मुद्दों पर लिखते हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

 

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