क्या आपने कांग्रेस के बदलावों को नोटिस किया?

क्या आपने कांग्रेस के बदलावों को नोटिस किया?गाँव कनेक्शन

असम चुनावों के बाद मैंने अख़बारों के संदर्भ में कई विश्लेषणों को पढ़ा। सारे विश्लेषण जीत के आधार पर ही होते हैं। किस तरह जीता गया अब यह सवाल गौण हो गया है। वर्ना कोई इस बात की समीक्षा करता कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विरासत का राष्ट्रवाद के नाम पर भगवाकरण कर बंगाल में बीजेपी को क्या मिला। तमाम फाइलों के पन्ने सार्वजनिक किए गए, किसी को पता चला कि नेताजी की मौत कैसे हुई थी। सरकार ने बताने का जिम्मा जनता और टीवी एंकरों के सर डाल दिया। 

जीत के वक्त विशेषणों की माला कांग्रेस ने भी पहनी है इसलिए उसे बीजेपी को पहनते देख ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। 2009 के चुनाव में मनमोहन सिंह की चुप्पी ही खूबी बन गई कि कम बोलते हैं मगर काम करते हैं। 2004 के चुनाव के पहले शाइनिंग इंडिया का अभियान चला था। विदेशी बहू का नारा ज़ोर पर था। सोनिया गांधी को हिन्दी तक नहीं आती थी। तब भी कांग्रेस जीत गई। वाजपेयी हारकर नेपथ्य में चले गए। सोनिया की जीत ने आडवाणी को अप्रासंगिक बना दिया। सुषमा स्वराज ने सोनिया के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता रोक दिया। सोनिया ने रास्ता छोड़ दिया और त्याग की देवी बन गईं। फिर इन आरोपों से घिर गईं कि सत्ता प्रधानमंत्री निवास से नहीं दस जनपथ के सोनिया निवास से चलती है। 

वाजपेयी के राष्ट्रीय राजनीति में छाने से पहले पीवी नरसिंहा राव के नेतृत्व में ग़ैर गांधी मगर कांग्रेसी सरकार बनकर जा चुकी थी। राव भी मनमोहन सिंह की तरह न बोलने वाले नेता थे। इस पर पीएचडी होनी चाहिए कि कैसे राव और मनमोहन सिंह जैसे नेता राजनीति में बग़ैर संवाद के कामयाब हुए! दोनों ही उदाहरण हैं। बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद कौन जानता था कि कांशीराम साइकिल चला चलाकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में हिन्दुत्व को धाराशाही कर देंगे और कांग्रेस बीजेपी को गौण। कौन जानता था कि गुजरात से आए अमित शाह 15 साल बाद कांशीराम की बसपा को शून्य पर पहुंचाकर हिसाब चुकाएंगे और यूपी की लोकसभा की 71 सीटों को जीत लेंगे। 2017 में उत्तर प्रदेश में बीजेपी हार गई तब विश्लेषणों में बीजेपी को लेकर क्या कहा जाएगा। 2019 की संभावना ख़त्म?

अगर कांग्रेस के खत्म होने पर जश्न मनाया जा रहा है तो इस बात का शोक क्यों नहीं कि अब राष्ट्रीय विपक्ष की भूमिका कौन निभायेगा? कांग्रेस मुक्त भारत घोर रूप से अलोकतांत्रिक नारा है। एक वक्त में दो सीटों पर पहुंच कर बीजेपी ने विपक्ष की कमी महसूस नहीं होने दी थी। संख्या के बग़ैर भी विपक्ष हो सकता है। यह भी इसी देश का इतिहास है। क्या कांग्रेस ऐसा कर पा रही है? जनता नहीं चाहती कि कांग्रेस मिट जाए वर्ना उसके इन चुनावों में 100 से अधिक विधायक नहीं जीतते। बंगाल में वो बिना नेताजी की फाइल खोले बीजेपी से अधिक सीट नहीं जीतती। कांग्रेस को अपनी ग़लतियों और घोटालों पर सार्वजनिक रूप से बात करनी होगी। युवा और ईमानदार नेताओं को खड़ा करना होगा।

आलोचक कांग्रेस को लेकर बेहद बेरहम हैं। यह अच्छा है लेकिन क्या कांग्रेस बिल्कुल नहीं बदल रही होगी। मैं पार्टी को अंदर से नहीं जानता। राहुल से कभी मिला नहीं लेकिन उनसे मिलकर आने वालों से मिला हूं। राहुल गांधी ने पत्रकार से लेकर समाजसेवियों तक से मुलाकात की है। कई लोग राहुल से प्रभावित लगे मगर उन्हें यह बात हैरान करती है कि जो बंदा व्यक्तिगत बातचीत में मुद्दों को लेकर राजनीतिक रूप से समझदार दिखता है वो समझदारी उसके भाषणों और रणनीतियों में क्यों नहीं दिखती है। कई लोगों से कहा कि अगर आप राहुल से प्रभावित हैं तो लिखते क्यों नहीं। वो कांप उठते हैं। कौन लिखेगा राहुल के बारे में, गाली पड़ेगी।

राहुल को समझना पड़ेगा। उनको अपनी कहानी खुद लिखनी होगी। बहुत हद तक मोदी ने भी बग़ैर सकारात्मक प्रेस के अपनी कहानी लिखी। ये और बात है जब वे गुजरात से दिल्ली के लिए निकले तो आलोचकों के बराबर बड़ी संख्या में समर्थक भी तैयार थे। मीडिया के साथ सोशल मीडिया आ गया था।हो सकता है राहुल बहुत कुछ कर रहे हों लेकिन सतह पर कांग्रेस की जड़ता टूटती नहीं दिखती है। उनके भाषणों में राजनैतिक ख़ालीपन है। संभावनाएं नहीं दिखती हैं। सवाल यह बनता है कि राहुल ने नाम से तरुण और उम्र से बुजुर्ग गोगोई को क्यों छूट दी जिन्हें जनता 2014 के लोकसभा चुनाव में नकार चुकी थी। प्रधानमंत्री मोदी होते तो आडवाणी की तरह गोगोई को भी किनारे लगा देते।

राहुल को अपना करिश्मा राज्यों से साबित करना होगा। अभी वे दिल्ली से उड़ते हैं, राज्यों में भाषण देते हैं और शाम को दिल्ली आ जाते हैं। उन्हें तो चुनाव के वक्त एक राज्य में डेरा डाल लेना चाहिए। यूपी और पंजाब के चुनाव उनके लिए फिर से मौका लेकर आ रहे हैं। क्या वे इसे भी गंवा देंगे?

कांग्रेस कई बार हारकर खड़ी हुई है और फिर खड़ी हो सकती है। आज का राजनीतिक भारत कांग्रेस से कहीं ज्यादा कांग्रेस युक्त भारत है। क्या राजनीति जोड़तोड़, अपराधी, पैसे के ज़ोर से मुक्त हो गई है। आज किस दल में हाईकमान कल्चर नहीं है। किस दल में एक नेता का कल्चर नहीं है। कांग्रेस को कांग्रेस से ही लड़ना होगा। वर्ना एक दिन उसे भाजपा होना पड़ जाएगा जैसे भाजपा कांग्रेस जैसी होती जा रही है। इंदिरा गांधी के दौर के कई अक्स भाजपा में दिखने लगे हैं। कांग्रेस को अपने भीतर के नरम हिन्दुत्व और नरम मुस्लिम परस्ती को उखाड़ फेंकना होगा। अजमल जैसों से सामने से लड़ना होगा जैसा कांग्रेस के उम्मीदवार ने अजमल को हराकर किया है। लोग कांग्रेस के हारने से खुश नहीं है। बिहार में एक रिक्शेवाले से कहा था कि मोदी जी से इतना क्यों गुस्सा में है कि वोट नहीं देंगे। उसने तुरंत टोक दिया और कहा हम जनता हैं। हम नेता से गुस्सा नहीं करते। गुस्सा करेंगे तो कोई हमारे लिए बचेगा ही नहीं। 

मैं यह लेख लिखने से पहले कांग्रेस की वेबसाइट पर गया। मुझे वेबसाइट ने प्रभावित किया है। पार्टी का संक्षिप्त इतिहास बनाने के लिए स्लाइड लगाए गए हैं जिसे देखकर कहा जा सकता है कि कांग्रेस की वेबसाइट अब नेहरू गांधी परिवार से लदी फदी नहीं है। वे उतने ही हैं जितने होने चाहिए। नेहरू से पहले पंडित मदन मोहन मालवीय हैं। गांधी अंबेडकर पूना पैक्ट का ज़िक्र है और डॉक्टर अंबेडकर की तस्वीर है। नेहरू मंत्रिमंडल से उनके इस्तीफा देने का प्रसंग है और तस्वीर है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की स्लाइड में अध्यक्ष चुने जाने से लेकर आईएनए बनाने और निधन के संदर्भ में जानकारी है। शास्त्री जी और नरसिंहा राव का भी ज़िक्र है। सरदार पटेल और हैदराबाद का विलय भी है।

क्या किसी ने कांग्रेस में इस बदलाव को नोटिस किया? राम गुहा का हाल ही में एक लेख पढ़ा कैसे कांग्रेस अपने इतिहास से जुड़े नायकों की उपेक्षा करती रही और बीजेपी ने एक-एक कर उन्हें हड़प लिया। यह तारीफ का विषय है या निंदा का। इसका भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए कि बीजेपी ने नेताजी, अंबेडकर, पटेल को लेकर क्या इंसाफ कर दिया। क्या इन नायकों के साथ यही इंसाफ है कि इनकी जयंती मने और मूर्ति बने? चाहे कांग्रेस करे या बीजेपी करे, मैं साफ-साफ कहता हूं कि वर्तमान की चुनौतियों पर पर्दा डालने के लिए इतिहास का इस्तेमाल हो रहा है। सबकी मूर्तियां गाँव - गाँव गली-गली में बिखरी पड़ी हैं। डॉक्टर अंबेडकर की मूर्ति सब लगाते हैं मगर जातिगत हिंसा आज भी हकीकत है।

नोट-  कांग्रेस की वेबसाइट पर 2002 के गुजरात दंगों का ज़िक्र है। यहीं पर लगा कि पार्टी ने इतिहास बताते समय अपनी ईमानदारी से चूक गई। उसे 84 के सिख विरोधी दंगों की भी स्लाइड लगानी चाहिए थी और आपातकाल की भी। इन दोनों पर मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने अगर माफी मांगी है तो स्लाइड लगानी चाहिए थी। कांग्रेस को अपनी गलतियों का सामना करना चाहिए तभी वो संभावनाओं को समझ पाएगी।

(लेखक एनडीटीवी में सीनियर एक्जीक्यूटिव एडिटर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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