जब फिल्मों ने उठाई इमरजेंसी के खिलाफ आवाज तो जानिए क्या हुआ उनका नतीजा ?

जब फिल्मों ने उठाई इमरजेंसी के खिलाफ आवाज तो जानिए क्या हुआ उनका नतीजा ?फिल्म इंदू सरकार में इमरजेंसी के दौरान लोगों का विद्रोह दिखाया जाएगा 

लखनऊ। इस साल 28 जुलाई को इमरजेंसी पर आधारित फिल्म ला रहे हैं निर्माता-निर्देशक मधुर भंडारकर। फिल्म का ट्रेलर हाल ही में रिलीज किया गया है जिसमें शुरुआत ही इस डायलॉग से होती है, ‘देश में गांधी के मायने बदल चुके हैं।’

फिल्म एक ऐसी महिला की कहानी है जो इमरजेंसी के खिलाफ लोगों की आवाज बनती है। इसमें लीड रोल कर रही हैं कीर्ति कुल्हरी, जो एक विद्रोही कवियत्री का किरदार निभा रही है। देश में इमरजेंसी का दौर है, इस दौरान कुछ ऐसा घटित होता है कि वो सरकार और इमरजेंसी का विरोध करना शुरू कर देती है। उसे जेल भी जाना पड़ता है जहां उसे भयानक यातनाएं भी दी जाती हैं।

पेज थ्री, कॉर्पोरेट, हिरोइन और फैशन जैसी फिल्में बना चुके नेशनल अवॉर्ड विनर मधुर भंडारकर की ये फिल्म कई मायनों में खास है क्योंकि हिंदी सिनेमा में ऐसी गिनी-चुनी इमरजेंसी और सरकार के खिलाफ आवाज उठाती हैं।

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यहां देखें फिल्म का ट्रेलर

अपनी फिल्म को पास कराने में मधुर सेंसर बोर्ड से ज्यादा जुगत न लगानी पड़े क्योंकि केंद्र में अभी बीजेपी की सरकार है लेकिन पहले की फिल्मों को काफी फिल्म पास कराने में काफी मशक्कत करनी पड़ी।

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इमरजेंसी पर बनी फिल्म आंधी बैन हो गई, फिल्म किस्सा कुर्सी का के प्रिंट जला दिए गए।

नसबंदी

1978 में आई निर्देशक आईएस जौहर की फिल्म नसबंदी में इमरजेंसी के दौरान भारत के नागरिकों पर होने वाली ज्यादतियों को दिखाया गया था। फिल्म इमरजेंसी पर कटाक्ष करती है जिसमें सरकार के नसबंदी को अनिवार्य करने को मुख्य मुद्दा बनाया गया था। फिल्म के सभी कैरेक्टर नसबंदी के लिए लोगों को ढूंढते हैं। इसके लिए आईएस जौहर ने उस दौर के सभी पॉपुलर हीरो के डुप्लीकेट को शामिल किया था।

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सरकार पर कटाक्ष करने वाले लिरिक्स को उस दौर के हास्य कवि हुल्लड़ मोरादाबादी ने लिखा था। नसबंदी कैंप से बाहर आता हुआ व्यक्ति जिसके हाथ में ट्रांजिस्टर, डालडा और कैश है वह फिल्म का टाइटल सॉन्ग गा रहा है, ‘क्या मिल गया सरकार को इमरजेंसी लगा के, नसबंदी करा के हमारी बंसी बजा के।’

इसी तरह एक और गीत है फिल्म का जिसके बोल कुछ ऐसे हैं,

देखी कहीं कलम बंदी,

देखी कहीं जुबां बंदी

डर की हुकूमत हर दिल पर थी

सारा हिंदुस्तान बंदी

फिल्म को उस समय बैन कर दिया गया था जब सत्ता परिवर्तन के बाद फिल्म से बैन उठाया गया तो फिल्म को काफी पॉपुलैरिटी मिली थी।

किस्सा कुर्सी का

उसी समय अमृत नाहटा फिल्म किस्सा कुर्सी का लेकर आए। फिल्म में शबाना आजमी और मनोहर सिंह मुख्य भूमिका में थे। फिल्म सत्ता की शक्ति का गलत फायदा उठाने पर कटाक्ष करती है। इमरजेंसी लागू करने पर कांग्रेस सरकार पर यह फिल्म राजनीतिक कटाक्ष थी। फिल्म में संजय गांधी के ऑटो मैन्युफैक्चरिंग प्लान का मजाक उड़ाया गया था। फिल्म को सेंसर बोर्ड के पास अप्रैल 1975 में सर्टिफिकेशन के लिए ले जाया गया था। हालांकि संजय गांधी के उग्र समर्थकों ने फिल्म के प्रिंट और सभी कॉपी लेकर जला दी थीं।

आंधी

संजीव कुमार और सुचित्रा सेन की मुख्य भूमिका वाली फिल्म आंधी नेशनल इमरजेंसी के दौरान बैन कर दी गई थी। फिल्म इंदिरा गांधी के जीवन पर आधारित बताई जा रही थी और इसके साथ ही उनके पति से उनके रिश्ते का सच दिखाती थी। फिल्म पर बैन से लोगों में इसके प्रति उत्सुकता जगी लेकिन 1977 में कांग्रेस में बुरी हार के बाद फिल्म से बैन हटा दिया गया।

हजारों ख्वाहिशें ऐसी

2005 में आई फिल्म हजारों ख्वाहिशें ऐसी भी इमरजेंसी की पृष्ठभूमि पर आधारित थी, खासकर फिल्म का सेकेंड हाफ जिसमें इमरजेंसी के भयानक दौर का बहुत करीब से आंकलन किया गया था। तब फिल्म के डायरेक्टर सुधीर मिश्रा ने कहा था कि फिल्म इमरजेंसी के बुरे दौर से गुजर रही पीढ़ी की प्रति क्रिया पर आधारित थी। हजारों छात्रों पर बुरा प्रभाव पड़ा था, न्यूजपेपर सेंसरशिप और जबरन नसबंदी जैसी अभियानों से देश का युवा गुस्से में उबल रहा था।

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बीच में कई ऐसी फिल्में आईं जिसमें इमरजेंसी का मेसेज दिया गया। इसमें सत्यजीत रे की 1980 में आई फिल्म हीरक राजार देशे (इमरजेंसी के छिपे इरादे) और 1988 में मलयालम फिल्ममेकर शाजी करुण की अवॉर्ड विनिंग फिल्म पिरावी शामिल है। इस फिल्म में पी राजन केस के मुद्दे को उठाया गया था, एक इंजीनियरिंग कॉलेज स्टुडेंट जिसकी मौत पुलिस कस्टडी में हो गई थी।

इमरजेंसी के दौरान भी फिल्म इंडस्ट्री इंदिरा गांधी के सपोर्ट में थी

हालांकि बैन और कड़े नियमों से बावजूद फिल्म इंडस्ट्री इंदिरा गांधी सरकार के सपोर्ट में थी। इसका जिक्र अभिनेता देवानंद ने अपनी आत्मकथा रोमांसिंग विद लाइफ में किया था।

उन्होंने आगे लिखा, फिल्म इंडस्ट्री के ज्यादातर लोग चाहते थे कि इंदिरा गांधी सत्ता में बनी रहें। राजनीतिक प्रचार की ताकत हो या, सत्तारुढ़ नेताओं के साथ चलना, इंदिरा गांधी ने अपने करिश्माई व्यक्तित्व से लोगों को बांध लिया था।

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