बड़े ग़ुलाम अली खां, नेहरू से लेकर जिन्ना तक सब जिनके फैन थे

Jamshed QamarJamshed Qamar   25 April 2017 10:44 AM GMT

बड़े ग़ुलाम अली खां, नेहरू से लेकर जिन्ना तक सब जिनके फैन थेबड़े गुलाम अली खां साहब

बात उस दौर की है जब के. आसिफ मुगल ए आज़म बना रहे थे। फिल्म के एक गाने में उन्हें अक्बर के नवरत्नों में से एक तानसेन को भी गाते दिखाना था। एक्टर तो उन्होंने ढूंढ लिया था लेकिन 'तानसेन की आवाज़' की तलाश जारी थी। क्लासिकल गायकों में उस वक्त, सबसे बड़ा नाम उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खां का था। के. आसिफ के ज़हन में खां साहब का नाम आया लेकिन वो जानते थे कि खां साहब फ़िल्मों में नहीं गाएंगे। उस दौर में फिल्मों को बहुत अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता था लेकिन आसिफ भी अपनी धुन के पक्के थे।

एक रोज़ पहुंच गए उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खां साहब के पास और आपनी ख्वाहिश बताई, खां साहब ने इंकार कर दिया। आसिफ ज़िद करने लगे तो खां साहब ने उन्हें टालने का एक तरीका सोचा। उन्होंने ऐसी फीस बताई कि वो खुद ही लौट जाएं। हिंदी फिल्मों का ये वो दौर था जब मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर को बड़ी-बड़ी फ़िल्मों में गाने के पांच सौ रुपये मिलते थे। पांच सौ रुपये उस वक्त के हिसाब से बड़ी रक़म भी थी। खां साहब ने के आसिफ से कहा, "ठीक है मैं गा दूंगा, फीस की बात कर ली जाए" के आसिफ बोले, "जी, बिल्कुल आप बताइये, क्या फीस लेंगे", खां साहब ने कहा, "पच्चीस हज़ार रुपये"। आसिफ साहब खामोश हो गए तो खां साहब ने कहा "रहन देते हैं फिर, कोई बात नहीं"। खां साहब उठ कर जाने लगे तो आसिफ ने कहा, "खां साहब, आपकी आवाज़ बेशकीमती है, मैं तैयार हूं"। ये शान थी बड़े ग़ुलाम अली खां साहब की। बाद में वो फ़िल्म में तानसेन की आवाज़ बनें और वो गाना अमर हो गया।

बड़े गुलाम अली खां साहब का जन्म 2 अप्रैल 1902 को हुआ था। परिवार में पहले से ही माहौल संगीतमय था। उनके वालिद अली बख्श खां, चाचा काले खां और दादा शिंदे खां भी पारंपरिक गायन से ताल्लुक रखते थे। कहा जाता है कि उनके वालिद कश्मीर के महराजा के दरबार में गाते थे और इसीलिए उन्हें कश्मीरी घराने का भी कहा जाता है, लेकिन खां साहब की पैदाइश के बाद परिवार पटियाला आ गया और इस तरह घराने का नाम भी बदलकर पटियाला घराना हो गया। कम लोग जानते हैं कि खा साहब ने अपने संगीत की शुरुआत सारंगी बजाने से की थी और उनके उस्ताद का नाम आशिक अली खान था।

बड़े गुलाम अली खां

बड़े गुलाम अली खां की आवाज़ को पहचान 1919 में लाहौर के संगीत सम्मेलन में मिली। इसके बाद कलकत्ता और इलाहाबाद में हुए ऐसे ही संगीत आयोजनों ने उन्हें मशहूर कर दिया। 1947 में भारत के बंटवारे के बाद बड़े ग़ुलाम अली खां पाकिस्तान चले गए थे, लेकिन उन्हें वहां का माहौल पसंद नहीं आया इसलिए वो वापस हिंदुस्तान आ गए। खां साहब की आवाज़ के नेहरु और जिन्ना दोनों दीवाने थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू को खां साहब पंडित जी कहते थे। कई जगह इस बात का ज़िक्र मिलता है कि पंडित नेहरु ने खां साहब से कई बार व्यक्तिगत तौर पर मुलाकात की।

बड़े ग़ुलाम अली खां

संगीत की दुनिया की, इस सबसे करिश्माई आवाज़ को साल 1962 में पद्मभूषण भी मिला। खां साहब ने 25 अप्रैल 1968 को हैदराबाद में दुनिया को अलविदा कह दिया। इंटेरनेट पर खां साहब का एक बेहद दुलर्भ इंटरव्यू मौजूद है, इसमें उन्होंने अपनी ज़िंदगी से जुड़े तमाम पहलुओं पर बात की है। आप भी सुनिये

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