Jamshed Qamar

Jamshed Qamar

Jamshed works as a script writer and journalist for Gaon Connection



  • किताबें मांगने, गिरने, उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे उनका क्या होगा?

    तेज़ रफ्तार ज़माने में इंसान की राब्ता किताबों से छूटता जा रहा है। किताबों के कई विकल्प वक्त के साथ-साथ इजाद कर लिये गए लेकिन जो बात किताबों में है वो किसी और चीज़ में नहीं। लाइक्स, शेयर और कॉमेंट की इस दौड़ में पढ़ने का मतलब दरअसल स्क्रीन देखना हो गया है, वो चाहे मोबाइल की स्क्रीन हो या कंप्यूटर...

  • आज ये सात शेर याद कर लीजिए, काम आएंगे

    14 फरवरी यानि इश्क़ का दिन। इज़हार और इक़रार के बीच की खामोशी को तोड़ने का दिन, दिल के जज़्बात बयां करने का दिन, मुहब्बत करने का दिन। वो तमाम लोग जो अपने दिल की बात साल भर नहीं कह पाते ये दिन उनका भी है। लेकिन सोचिए कितना अच्छा हो कि अगर इश्क़ के इज़हार में शायरी भी शामिल हो जाए। शायरी उलझी हुई...

  • क़िस्सा मुख़्तसर : जब फ़ैज़ से मिली शबाना आज़मी ...

    फ़ैज़ उन दिनों मॉस्को फ़िल्म फ़ैस्टिवल में शिरकत कर रहे थे। वहां शबाना आज़मी समेत हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की भी तमाम हस्तियां मौजूद दी। शबाना को जब 'फैज़ चाचा' के वहां होने के बारे में पता चला तो उन्होने मिलने की ख़्वाहिश ज़ाहिर करते हुए ख़त भेजा। फ़ैज़ साहब, अपने ख़ास दोस्त क़ैफी आज़मी की बेटी शबानी...

  • कांग्रेस के स्थापना दिवस पर 133 साल पुरानी एक तस्वीर का इतिहास

    भारतीय इतिहास की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस आज अपना स्थापना दिवस मना रही है। कांग्रेस अध्यक्ष के रुप में राहुल गांधी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। आइये इस मौके पर हम एक बार अतीत के पन्नों को फिर से खंगालते हैं और जानने की कोशिश करते हैं क्या है कांग्रेस का इतिहास। कांग्रेस का...

  • स्मिता कहा करती थीं कि जब मैं मर जाऊंगी तो मुझे सुहागन की तरह तैयार करना

    स्मिता पाटिल शायद अकेली एक्ट्रैस थीं जिन्हें कॉमर्शियल फिल्में कुछ खास पसंद नहीं थीनसीरुद्दीन शाह, एक इंटरव्यूहिंदी समानांतर सिनेमा में अलग पहचान बनाने वाली स्मिता पाटिल का फ़िल्मी सफ़र यूं तो सिर्फ 10 साल का था, लेकिन अदाकारी इतनी कमाल थी कि उनकी फ़िल्में आज भी...

  • मिर्ज़ा ग़ालिब के दस सबसे बेहतरीन शेर

    उर्दू अदब मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी के बग़ैर अधूरी है। ग़ालिब की शायरी ने उर्दू अदब को नए पंख और नया आसमान दिया। कम लोग जानते हैं कि ग़ालिब की शायरी का बड़ा हिस्सा फारसी में है, उर्दू में उन्होंने बहुत कम लिखा है, लेकिन जितना लिखा है वो ही आने वाले कई ज़मानों तक लोगों को सोचने पर मजबूर करने के लिए...

  • ग़ज़ल निदा फ़ाज़ली की, आवाज़ मोदी जी की 

    कभी किसी को मुकम्‍मल जहां नहीं मिलता कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलतानिदा फ़ाज़लीइस शेर को हमने-आपने शायद हज़ारों बार सुना होगा। हम में से तमाम लोग तो इस शेर को ग़ालिब का समझते हैं। ये शेर हिंदी उर्दू के कद्दावर क़लमकार निदा फ़ाज़ली का है। आज उनकी सालगिरह है। 12 अक्टूबर 1938 को...

  • Birthday Special : ये थी बॉलीवुड के लिए रेखा की पहली वीडियो 

    आज रेखा का जन्मदिन है। रेखा, 10 अक्टूबर 1950 को चेन्नई में तमिल अभिनेता जेमिनी गनेशन और तेलगु अभिनेत्री पुष्पावली के घर जन्मीं थी। वो तेलगू को अपनी मातृभाषा मानती हैं, हालांकि हिंदी, तमिल और अंग्रेज़ी भी अच्छे से बोल लेती हैं।बाल कलाकार के तौर पर वो पहली बार तेलगु फिल्म 'रंगुला रतलाम' में...

  • "मैंने फाउंटेनपेन उसके हाथ में रख दिया, उसे जैसे ज़माने की दौलत मिल गई"

    सूरज क्षितिज की गोद से निकला, बच्चा पालने से। वही स्निग्धता, वही लाली, वही खुमार, वही रोशनी। मैं बरामदे में बैठा था। बच्चे ने दरवाजे से झांका। मैंने मुस्कुराकर पुकारा। वह मेरी गोद में आकर बैठ गया। उसकी शरारतें शुरू हो गईं। कभी कलम पर हाथ बढ़ाया, कभी कागज पर। मैंने गोद से उतार दिया। वह मेज का पाया...

  • पत्रकार महात्मा गांधी , जिन्होंने अख़बार के लिए कभी विज्ञापन नहीं लिया 

    बीसवीं सदी की शुरुआत में, एक दौर था जब गांधी जी को भारत में कोई नहीं जानता था। वो उस वक्त अफ़्रीका में वकालत करते थे। ये वही दौर था जब अफ़ीका में भी अश्वेत लोगों के खिलाफ ज़ुल्म की कहानियां पूरी दुनिया सुन रही थी। गांधी जी ने ऐसे में अपनी वकालत के ज़रिये उन्हे उनका हक़ दिलाने की कोशिश की। इसी...

  • वो फिल्मी हस्तियां जिनकी ज़िंदगी की Happy Ending नहीं हुई

    कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलताये शेर कहने को तो महज़ चंद अल्फाज़ हैं लेकिन देखा जाए तो ये इस कायनात की सबसे बड़ी हकीकत है। औऱ ये हक़ीकत सिर्फ आम लोगों के लिए नहीं खास लोगों के लिए भी है। फ़िल्मी दुनिया के हर जगमगाते सितारे के लिए भी ज़िंदगी फूलों की सेज...

  • "फैज़ साहब, आप लिखते ख़ूबसूरत हैं, पढ़ते बहुत ख़राब हैं" 

    फ़ैज़ अहमद फैज़ साहब के बारे में एक बात दीगर किताबों और हवालों से आती है कि वो जितना बेहतरीन लिखते थे उतना ही ख़राब पढ़ते थे। बताया जाता है कि अपनी कीमती से कीमती नज़्म और ग़ज़ल को वो यूं पढ़ते थे जैसे अख़बार पढ़ रहे हों। इस बारे में एक वाक्या भी अक्सर मुशायरों में याद किया जाता है।फैज़ अहमद फैज़...

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