Jamshed Qamar

Jamshed Qamar

Jamshed works as a script writer and journalist for Gaon Connection



  • कांग्रेस के स्थापना दिवस पर 133 साल पुरानी एक तस्वीर का इतिहास

    भारतीय इतिहास की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस आज अपना 133वां स्थापना दिवस मना रही है। कांग्रेस अध्यक्ष के रुप में राहुल गांधी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। इससे पहले वो उपाध्यक्ष के रुप में पिछले वर्ष पार्टी का झंडा फहरा चुके हैं। ये पहली बार हुआ था जब पार्टी उपाध्यक्ष ने झंड़ा फरहाया था। ख़ैर, आइये...

  • मिर्ज़ा ग़ालिब के दस सबसे बेहतरीन शेर

    उर्दू अदब मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी के बग़ैर अधूरी है। ग़ालिब की शायरी ने उर्दू अदब को नए पंख और नया आसमान दिया। कम लोग जानते हैं कि ग़ालिब की शायरी का बड़ा हिस्सा फारसी में है, उर्दू में उन्होंने बहुत कम लिखा है, लेकिन जितना लिखा है वो ही आने वाले कई ज़मानों तक लोगों को सोचने पर मजबूर करने के लिए...

  • वीडियो, जिसमें शाहरुख भी हैं और अटल जी भी

    अटल जी की शख़्सियत हमेशा से प्रभावशाली रही है। सक्रिय राजनीति में उनके जैसा शांत चित्त, संवेदनशील और बेबाक वक्ता शायद ही कोई रहा हो। इस सब के अलावा उनके कलम में भी दम था। एक कवि के तौर पर उनकी रचनाएं भी बहुत पसंद की गईं।उन्हीं कविताओं को लेकर साल 1999 में एक एल्बम रीलीज़ की गई, जिसकी भूमिका लिखी थी...

  • खु़मार बाराबंकवी - वो नाम जो मुशायरा हिट होने की गारंटी था

    उर्दू अदब के शायरों में खुमार बाराबंकवी का नाम हमेशा एक उस्ताद शायर के तौर पर लिया जाता है। ख़ुमार का असली नाम मुहम्मद हैदर खान था लेकिन उन्होंने अपना तख़ल्लुस 'ख़ुमार' रखा जिसके हिंदी मायने 'नशा' होता है। 20 सितंबर 1919 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में पैदा हुए ख़ुमार के घर का माहौल भी लिखने-पढ़ने...

  • वीडियो: “फैज़ साहब, आप लिखते ख़ूबसूरत हैं, पढ़ते बहुत ख़राब हैं” 

    फ़ैज़ अहमद फैज़ साहब के बारे में एक बात दीगर किताबों और हवालों से आती है कि वो जितना बेहतरीन लिखते थे उतना ही ख़राब पढ़ते थे। बताया जाता है कि अपनी कीमती से कीमती नज़्म और ग़ज़ल को वो यूं पढ़ते थे जैसे अख़बार पढ़ रहे हों। इस बारे में एक वाक्या भी अक्सर मुशायरों में याद किया जाता है।फैज़ अहमद फैज़...

  • क़िस्सा मुख़्तसर : जब नेहरू की बात का बुरा मान गए खां साहब 

    बड़े गुलाम अली खां साहब हिंदुस्तान की सबसे करिश्माई आवाज़ों में से एक थे, उनके हर कॉनसर्ट में हज़ारों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। क़िस्सा उन दिनों का है जब बड़े ग़ुलाम अली खां साहब एक कार्यक्रम के सिलसिले में कोलकाता आए हुए थे। उस वक्त देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु थे। नेहरु ख़ुद भी खां साहब...

  • पत्रकार महात्मा गांधी , जिन्होंने अख़बार के लिए कभी विज्ञापन नहीं लिया 

    बीसवीं सदी की शुरुआत में, एक दौर था जब गांधी जी को भारत में कोई नहीं जानता था। वो उस वक्त अफ़्रीका में वकालत करते थे। ये वही दौर था जब अफ़ीका में भी अश्वेत लोगों के खिलाफ ज़ुल्म की कहानियां पूरी दुनिया सुन रही थी। गांधी जी ने ऐसे में अपनी वकालत के ज़रिये उन्हे उनका हक़ दिलाने की कोशिश की। इसी...

  • वो फिल्मी हस्तियां जिनकी ज़िंदगी की Happy Ending नहीं हुई

    कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलताये शेर कहने को तो महज़ चंद अल्फाज़ हैं लेकिन देखा जाए तो ये इस कायनात की सबसे बड़ी हकीकत है। औऱ ये हक़ीकत सिर्फ आम लोगों के लिए नहीं खास लोगों के लिए भी है। फ़िल्मी दुनिया के हर जगमगाते सितारे के लिए भी ज़िंदगी फूलों की सेज नहीं...

  • मैं उनकी अधबुझी सिगरेट संभाल कर रख लेती थी - अमृता प्रीतम

    बात 1944 की है। अमृता प्रीतम एक मुशायरे में शिरकत कर रही थीं। वहां उर्दू-पंजाबी के नामवर शायर भी थे। कहा जाता है कि साहिर लुधियानवी पर अमृता की पहली नज़र भी इसी मुशायरे में पड़ी थी। अमृता, साहिर की शख्सियत के बारे में जानकर दिल को उस ओर झुकने से रोक ना सकीं। अमृता का दीवाना इश्क़ उस महफिल से ही...

  • “उधर के सैनिक चाय के लिए बुला सकते हैं, जाइएगा नहीं” 

    विष्णु प्रभाकर हिंदी साहित्य के उन चंद लेखकों में से एक थे जिन्होंने कहानी, बाल कथा, उपन्यास, आत्मकथा, जीवनी, नाटक संस्मरण, कविता और यात्रा वृतांन्त जैसी तकरीबन सभी विधाओं में रचनाएं की। 21 जून 1912 को उत्तरप्रदेश के मुज़फ्फरनगर ज़िले के गांव मीरापुर में जन्में विष्णु जी की सबसे मशहूर रचनाओं में...

  • सरकार किसे मानती है ‘शहीद’? 

    छत्तीसगढ़ के सुकमा में सोमवार को हुए नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 25 जवान शहीद होने के बाद एक बार फिर से ये बहस तेज़ हो गई है कि केंद्र सरकार 'शहीद' को किस तरह परिभाषित करती है। कहा जाता है कि शहीद की परिभाषा क्या है इसके लिए कहीं कोई तय तहरीर नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुकमा में हुए हमले...

  • बड़े ग़ुलाम अली खां, नेहरू से लेकर जिन्ना तक सब जिनके फैन थे

    बात उस दौर की है जब के. आसिफ मुगल ए आज़म बना रहे थे। फिल्म के एक गाने में उन्हें अक्बर के नवरत्नों में से एक तानसेन को भी गाते दिखाना था। एक्टर तो उन्होंने ढूंढ लिया था लेकिन 'तानसेन की आवाज़' की तलाश जारी थी। क्लासिकल गायकों में उस वक्त, सबसे बड़ा नाम उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खां का था। के. आसिफ के...

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