महफ़िल

क़िस्सा मुख़्तसर : जॉन एलिया ने बताए अपने ख़ास दोस्त के क़िस्से

उबैदुल्लाह अलीम का नाम शायरी के चंद उन उस्तादों में शुमार होता है जिन्होंने उर्दू शायरी की नफ़्स में कई इंकलाबी तब्दीलियां की। शेर कहने का नया अंदाज़ रखने वाले उबैदुल्लाह अलीम की पैदाइश साल 1939 में भोपाल में हुई थी। तक्सीम के बाद पाकिस्तान के सियालकोट आने के बाद उन्होंने कराची यूनिवर्सिटी से उर्दू में एमए किया। उनका एक शेर काफी मशहूर हुआ,

अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी संभल जाए
अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए
उबैदुल्लाह अलीम

पाकिस्तान में उनकी मुलाकात 1960 के आसपास मशहूर शायर जॉन एलिया से हुई। जो बाद में गहरी दोस्ती में तब्दील हुई और ज़िंदगी की आखिरी सांस तक चली। अलीम साहब ने साल 1967 तक पाकिस्तान रेडियो और टीवी के लिए प्रोड्यूसर के तौर पर काम किया। साल 1974 में उन्हें उनकी पहली ही किताब 'चांद चेहरा-सितारा आंखे' के लिए सम्मानित किया गया। उनकी कुछ और किताबें भी बाद में शाया हुईं जिनमें - 'वीरान सराय का दिया', 'मैं खुली हुई सच्चाई' भी हैं। उनके खास दोस्त और मशहूर शायर जॉन एलिया ने उनके बारे में बयान किया है कि वो काफी खुली ज़बान वाले शख्स थे, घुमाकर बात करना उन्हें आता नहीं था। जो कहना होता था साफ कहते थे। इसी सिलसिले से जॉन, उबैदुल्लाह अलीम का एक क़िस्सा बयान करते हैं।

क़िस्सा मुख़्तसर

माइक पर जॉन एलिया, पीछे सिगरेट का कश लगाते हुए उबैद उल्लाह अलीम

क़िस्सा साल 1959 का है। कराची के आर्ट एंड कल्चर कॉलेज के ऑडिटोरियम में एक मुशायरा चल रहा था। स्टेज पर जॉन एलिया समेत तमाम बड़े शोहरा बैठे हुए थे। सुनने वालों का मजमा ऑडिटोरियम के दरवाज़े के बाहर तक था, जिन्हें बैठने की जगह नहीं मिली थी वो किनारों पर खड़े थे। इस वक्त तक जॉन और उबैदुल्लाह अलीम एक दूसरे को नहीं जानते थे।

तो हुआ यूं कि उस मुशायरे एक शायर साहब जो उसी इलाके के कारोबारी थे, शिरकत कर रहे थे। वो दाइस पर आए और उन्होंने गला खंखार कर शेर पढ़ना शुरु किया। शेर में कई ख़म थे, बहर बराबर नहीं थी। तमाम शोहरा एक दूसरे को तिरछी नज़रों से देखकर इशारे करने लगे कि ये किस तरह की शायरी है, मुशायरे का माहौल ख़राब हो रहा है, लेकिन किसी ने उन्हें रोकना मुनासिब नहीं समझा। वो शेर पढ़ते रहे और उनके कुछ खास लोग जो भीड़ में थे, वाह-वाह करते रहे। उबैदुल्लाह अलीम और जॉन एलिया भी उन साहब को ग़ौर से देखते रहे। जब उनकी शायरी खत्म हुई और वो वापस आकर बाकी शायरों के साथ बैठे तो अलीम साहब ने उनसे कहा, सुनिये... वो पलट कर बोले.. जी अलीम साहब... जॉन एलिया को लगा कि अलीम साहब शायद तंज़ करते हुए उनकी तारीफ करेंगे कि भई आपने तो बहुत कमाल के शेर पढ़े। सभी शायर उबैदुल्लाह अलीम की तरफ देखने लगे कि वो क्या फर्माने वाले हैं। अलीम साहब ने उन शायर साहब से सीधे कहा, मैं सोच रहा था कि आप शेर सुनाने के बजाय पकौड़े क्यों नहीं बेचते हैं? स्टेज पर बैठे लोगों के बीच कहकहे गूंज गए।

जॉन ने कई जगह लिखा है कि मैं और उबैदुल्लाह खास दोस्त होने के अलावा एक दूसरे के पूरक भी थे। एक जगह वो फर्माते हैं

दो मुख़्तलिफ़ चीज़ें ही एक दूसरे की तक्मील करती हैं। मर्द औरत की तक्मील करती है, शौहर और बीवी एक-दूसरे की तक्मील करते हैं.. इसी तरह मैं और अलीम एक-दूसरे की तक्मील करते हैं लेकिन ये तय नहीं हो पाया कि हम में से शौहर कौन है और बीवी कौन है
जॉन एलिया

चलते-चलते

सुनते हैं उबैदुल्लाह अलीम साहब की गज़ल - “जिसका दिल टूटने की बातें थी, आज वो आदमी भी टूट गया” उनकी चंद सबसे मशहूर गज़लों में से एक है। चलते-चलते आइये सुनते हैं उबैदुल्लाह अलीम साहब की गज़ल - रब्ते ग़म और खुशी भी टूट गया...।